क्या इसे शिक्षक दिवस कहेंगे ?

 0   डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

कोरोना वायरस एक ऐसी महामारी जिसने मार्च 2020 से आगे के सारे व्रत – त्योहारों के साथ हर प्रकार के आयोजनों को अपनी जद में लेते हुए ऐसा इतिहास लिख दिया जो आने वाले समय में एक भयानक सच्चाई के रूप में सदियों याद रखा जाएगा । समाज का कोई भी वर्ग इस महामारी काल में अग्नि- परीक्षा से होकर न गुजरा हो ऐसा नहीं कहा जा सकता है । जीवन की हर दिनचर्या को एक राक्षस की तरह निगल जाने वाली इस महामारी ने सबसे ज्यादा बच्चों की स्वतंत्रता को प्रभावित किया है । उन्हें घर के अंदर कैद करते हुए उनकी उछल- कूद पर ग्रहण ही लगा दिया । महामारी से निपटने जहाँ डॉक्टर्स, पुलिस, समाज सेवी संस्थाएँ , प्रशासनिक अधिकारी और मीडिया जगत के लोगों ने अपनी छुट्टियां कुर्बान कर दीं ,वहीं समाज को शिक्षित करने वाले शिक्षकों का दायित्व दोहरे रूप में सामने आया है । एक ओर शिक्षकों को क्वारेंटिंन सेंटर्स में ड्यूटी का जिम्मा दिया गया तो दूसरी ओर उन्होंने लम्बे समय से बंद शिक्षा  संस्थानों के द्वार को ऑन लाइन शिक्षा के माध्यम से खोल दिखाया। बावजूद इसके समाज के कुछ लोगों ने शिक्षकों के योगदान को सीधे- सीधे व्यवसाय से जुड़ा बताते हुए राष्ट्र निर्माता का अपमान करने में भी संकोच नहीं किया । शासकीय शिक्षकों का कोरोना वारियर्स बनकर संक्रमण से लड़ने का जज्बा वास्तव में उनकी देश सेवा का बड़ा प्रमाण है । इसी तरह निजी शैक्षणिक संस्थाओं में शिक्षकीय कार्य करने वाले भविष्य निर्माताओं ने बिना किसी वेतन के शिक्षा की मशाल को प्रज्ज्वलित रखने का जो संकल्प ले रखा है वह इस शिक्षक दिवस का समाज को बड़ा तोहफा कहा जा सकता है ।

कोरोना महामारी के इस दौर में निजी शैक्षणिक संस्थाओं में राष्ट्र निर्माण का जिम्मा उठा रहे शिक्षक , उनका कोई दमदार संगठन न होने के कारण उपेक्षित और शोषित जीवन बिता रहे हैं । इस संकट के दौर में जहाँ डॉक्टर्स, पुलिस कर्मी तथा सफाई कर्मी कोरोना वारियर्स के रूप में सम्मानित किये जा रहे हैं ,वहीं एक शिक्षक के योगदान को ताक पर रख दिया गया है ।इस महामारी के विकट समय में शिक्षकों ने एक ऐसी विधा को आत्मसात कर राष्ट्र के भविष्य को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया ,जिसकी उन्हें समुचित जानकारी नहीं थी । आज ऑन लाइन कक्षा की चर्चा चारों तरफ गुंजायमान है । इसी कक्षा के चलते बच्चे अपने घरों की चहारदीवारी के भीतर सुरक्षित रहते हुए अपनी शिक्षा को अबाध गति से जारी रख पाने में सक्षम हो पा रहे हैं । इसी ऑन लाइन शिक्षा को जारी रखने में शिक्षक वर्ग की कड़ी मेहनत और वेतन के अभाव में पैदा होने वाली वेदना शायद समाज के किसी भी वर्ग द्वारा महसूस नहीं की जा रही है ।शिक्षकों ने बड़े ही अल्प समय में मोबाइल के माध्यम से पढ़ाने की तकनीकी विधियों को खोज निकाला ,जिसके द्वारा आज बच्चे अपनी शिक्षा से वंचित होने से बचा लिए गए । वरिष्ठ शिक्षक जिन्हें मोबाइल और कम्प्यूटर का ज्ञान बिल्कुल ही नहीं था उन्होंने भी बिना किसी बहानेबाजी के ऑन लाइन क्लास में प्रवीणता प्राप्त कर अपना योगदान निर्बाध गति से जारी रखा है । कल्पना करें कि लॉक डाउन समय में ऑन लाइन क्लासेज नहीं चलती तो बच्चोंकी स्थिति कैसी होती ? मैं तो निः संकोच यह कहने से पीछे नहीं रह पा रहा हूँ कि इसके बिना उनका जीवन कोरी स्लेट की तरह ही काला और अंधकारमय रह जाता ।
पढ़ाई की सतत प्रक्रिया टूट जाने से समाज और राष्ट्र की बड़ी क्षति होगी । इसी क्षति को दूर करने और भारत के भविष्य को दी जाने वाली दिशा जारी रखते हुए शिक्षकों ने जिस ऑन लाइन शिक्षा का बीड़ा उठाया , उसने वास्तव में उन्हें राष्ट्र निर्माता का सच्चा हकदार होने का गौरव दिला दिया । शिक्षकों ने जिस तकनीकी का उपयोग करते हुए बच्चों तक शिक्षा की अलख जगायी उसके चलते प्रत्येक घर शिक्षा का मंदिर बन गया । इतना ही नहीं शिक्षकों ने बच्चों को इसी माध्यम से जोड़े रखकर सांस्कृतिक गतिविधियाँ तथा उनकी पढ़ायी को परखने परीक्षा भी ले डाली । बावजूद इन बहुमूल्य योगदान के शिक्षकों को क्या मिला ? उन पर ताने मारते हुए लाँछन ही लगाए जा रहे हैं । सरकारों ने भी शिक्षकों की आजीविका को दरकिनार कर उनके लिए कुछ भी नहीं सोचा । निजी संस्थाओं को शिक्षा का अधिकार कानून में सहयोगी होने के बावजूद उन्हें पिछले तीन वर्षों की राशि उपलब्ध नहीं करायी गयी । यदि सरकारें अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करतीं तो निजी संस्थाओं के शिक्षकों को आर्थिक परेशानी से नहीं गुजरना पड़ता । पूरे भारतवर्ष में कोई ऐसा स्कूल नहीं जिसने अपने शिक्षकों को इस कठिन दौर में पूरा वेतन दिया हो । ऐसे स्कूलों की भी कमी नहीं जिन्होंने कोरोना संक्रमण प्रारंभ होने के वाद से अब तक अपने शिक्षकों को फूटी कौड़ी भी नहीं दी । बावजूद इसके शिक्षकों द्वारा पूरी लगन के साथ अपने कर्तव्य की पूर्ति करना यह सिद्ध करता है कि गुरु का स्थान भगवान से भी ऊपर है । इस संदर्भ ने महिला शिक्षिकाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जानी चाहिए । घर जे सारे कार्य करने के बाद ऑन लाइन क्लासेस की तैयारी और ऑडियो- वीडियो द्वारा अपना अध्यापन कार्य पूर्ण करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है ।
 सवाल यह उठता है कि मार्च से लेकर अगस्त तक का 6 माह का लंबा सफर कठिनाइयों के दौर में गुजर गया । क्या समाज या सरकार ने यह सोचा कि कोरोना संकट समाप्त होने के बाद निजी स्कूल्स जा औचित्य बच पायेगा या नहीं ? उस संस्था में कार्यरत शिक्षक की नौकरी रह पाएगी या नहीं ? अपने अस्थिर भविष्य या मैं कहूँ अंधकारमय भविष्य की परवाह किये बगैर प्रण-प्राण से अपनी जिम्मेदार का निर्वहन कर रहे ऐसे शिक्षकों को विशाल भारतवर्ष के अरबपति उद्योगपतियों या सरकार द्वारा विपरीत परिस्थितियों में कोई अन्य रोजगार उपलब्ध कराया जा सकेगा ? आज शिक्षक उस कार्य को अपनी ड्यूटी मानकर कर रहा है , जिसके लिए उसे प्रशिक्षित नहीं किया गया था । देश के किसी भी राष्ट्रनिर्माता ने यह बहाना नही बनाया कि मुझे तो अपने शिक्षा काल में या बीएड पाठ्यक्रम में या किसी अन्य स्तर पर ऑन लाइन शिक्षा का प्रशिक्षण नहीं दिया गया या मेरी नियुक्ति घर वैठे मोबाइल अथवा कम्प्यूटर पर शिक्षा देने हेतु नहीं कि गयी । क्या यह सरकार का दायित्व नहीं कि जिस तरह कोरोना काल में सरकार बे समाज के लगभग सभी जरूरत मंदों को राशन और अन्य सामग्री उपलब्ध करायी , उसी तरह शिक्षकों के वेतन की व्यवस्था की जवाबदारी भी उठायी जाती ? आज की कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए जिस तरह शिक्षकों ने अपने शिक्षक होने के गौरव को बरकरार रखते हुए हर तकलीफ का सामना किया है ,उससे यह स्वमेव सिद्ध हो चुका है कि मानवीय समाज में शिक्षक से बड़ी भूमिका किसी और की नहीं हो सकती । मैं पूछना चाहता हूँ हर जिम्मेदार शख्स से धैर्य ,संतोष और साहस के साथ काम करने वाला शिक्षक अथवा शिक्षिका क्या एक सच्चा योद्धा और वेतन पाने का हकदार नहीं है ? क्या उसका घर परिवार नहीं है ?

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