– उमेश त्रिवेदी
इन दिनों, जबकि सुप्रीम कोर्ट अपनी अवमानना के मामले में प्रशांत भूषण से जूझ रहा है, उसने फिल्म स्टार सुशांत राजपूत के प्रकरण की जांच महाराष्ट्र पुलिस के बजाय सीबीआई से कराने का निर्णय भी सुना दिया है। सीबीआई जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की दलील है कि सुशांत प्रकरण में निष्पक्ष, स्वतंत्र और सक्षम जांच समय की जरूरत है (हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई पुलिस की अब तक की जांच को बहुत ही प्रोफेशनल करार देते हुए कहा है कि उसमे कोई दोष नहीं है)। फैसले के बाद लोगों के किलक उठने के कारण स्वाभाविक हैं। फैसले में कानूनी पहलुओं के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने दिवंगत आत्मा की चिंता भी की है कि अब मृतक भी चैन की नींद सो सकेगा…। पैंतीस पेजी फैसले की अंतिम पंक्ति में लिखा है कि अब दिवंगत भी चैन की नींद सो सकेगा…सच सामने आने से दिवंगत आत्मा को भी शांति मिलेगी, सत्यमेव जयते…। कानून की इस्पाती शब्दावली में लिखे न्यायशास्त्र में आत्माओं की शांति की आवधारणाओं के अदभुत अवतरण का यह न्यायिक दर्शन रिझाने वाला है। यहां यह सवाल पूछना घातक हो सकता है कि मौजूदा व्यवस्था में सुशांत जैसे न्यायिक श्रद्धा के फूल अर्जित करने के लिए दिवंगत की आत्मा का राजनीतिक रंग कौन सा होना चाहिए…।
राजपूत की दिवंगत आत्मा की चिंता करने वाला यह फैसला बरबस जस्टिस बीएच लोया की मौत के मामले की याद को तरोताजा कर देता है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जज ब्रजमोहन हरिमोहन लोया की कथित रहस्यमय हालात में मौत की एसआईटी के जरिए स्वतंत्र जांच की मांग को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि चार जजों के बयानों पर संदेह करने का कोई कारण नही हैं। चारों जज लोया के साथ थे। इसलिए लोया केस की एसआईटी जांच नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सन 2018 में अप्रैल के तीसरे हफ्ते मे सुनाया था। जस्टिस लोया के प्रकरण में भी यही आरोप लगे थे कि स्थानीय पुलिस की जांच में तथ्यों के साथ खिलवाड़ हुआ है। इसलिए इसकी एसआईटी से जांच कराई जाना चाहिए। लोया की मौत 1 दिसम्बर 2014 में हुई थी। मौत का कारण हार्ट अटैक माना गया था। सुशांत राजपूत और जस्टिस बीएच लोया, दोनों की मौत के मातम में राजनीति का दावानल सुलगने लगा था। फर्क इतना है कि फिलवक्त भाजपा सुशांत राजपूत के साथ खड़ी है, जबकि जस्टिस बीएच लोया की मौत के समय वह नहीं चाहती थी की एसआईटी जांच हो।
हत्या, आत्म-ह्त्या और स्वाभाविक मौतों में आत्माओं की बेचैनी नापने का कोई बैरोमीटर नही हैं। धारणा है कि तांत्रिक अनुभूतियां आत्माओं की बेचैनी पहचान सकती है। कहानी, उपन्यासों या फिल्मों में आत्मा की शांति के लिए तांत्रिक अनुष्ठान अक्सर देखने को मिलते हैं। आत्माओं को रिझाने या मनाने के लिए तंत्र-मंत्र रहस्य-रोमांच की आभासी दुनिया के उपकरण हैं। इनके परिणाम भी आभासी होते हैं। लेकिन आत्माओं के उपचार के लिए राजनीतिक मंत्रोच्चार में तांत्रिक उपायों से ज्यादा ताकत होती है। राजनीतिक-मंत्रोच्चार आत्माओं को बेचैन कर सकता है, भटका सकता है, अजर-अमर बना सकता है। सुशांत राजपूत की बेचैन आत्मा को करार भी इसी राजनीति के कारण मिला है, लोया की आत्मा को भटकने का श्राप भी इसी राजनीति का सबब है।
न्यायिक-इतिहास में सुशांत राजपूत की आत्मा की अभूतपूर्व चिंताओं के रूबरू खड़े देश की सुप्रीम कोर्ट न्यायिक व्यवस्था की अवमानना को लेकर भी ऊहापोह में है। न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा, बीआर गवई और कृष्ण मुरारी की बैंच ने 14 अगस्त 2020 को जाने-माने वकील प्रशांत भूषण को कोर्ट की अवमानना का दोषी माना है। बैंच ने प्रशांत भूषण के दो ट्वीट पर स्वतः संज्ञान लेते हुए अवमानना का नोटिस जारी किया था। देश के करीब डेढ़ हजार वकीलों ने प्रशांत भूषण को दोषी ठहराए जाने का विरोध किया है कि अवमानना का भय दिखाकर वकीलों को चुप कराने की कोशिशों से कोर्ट की ताकत और स्वतंत्रता प्रभावित होगी। वकीलो ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि वह सुधारात्मक कदम उठाकर न्याय की विफलता को रोके। स्वतंत्र न्यायपालिका का ये मतलब कतई नहीं है कि जज टिप्पणियों और जांच से अछूते रह सकते हैं। वकीलों की जिम्मेदारी है कि वो किसी भी कमी को बार, बैंच और जनता के सामने लाएं। एक अन्य बयान में सुप्रीम कोर्ट और हायकोर्ट के 12 पूर्व जजों समेत तीन हजार से ज्यादा बुद्धिजीवियों ने कोर्ट के फैसले की आलोचना की है।
न्याय पालिका में उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार की कलंक-कथाओं का सिलसिला किसी से छिपा नही हैं। मौजूदा दौर में न्याय-पालिका के सामने विश्वसनीयता का संकट सबसे बड़ी चुनौती है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई के राज्यसभा में नामित होने के बाद उनके वो सभी फैसले सवालो की जद में आ गए हैं, जो उनके कार्यकाल में लिए गए थे। मोदी-सरकार के पक्ष में रफाल का फैसला, धारा 370 से सम्बद्धक मामला, सीबीआई के निदेशक के पद से आलोक वर्मा को हटाए जाने जैसे कई मामले विश्वास की जंग जीतने में सफल महसूस नहीं हो रहे हैं। न्यायपालिका की फिसलन सिर्फ जस्टिस गोगोई तक ही सीमित नहीं है। प्रशांत भूषण से नाराजी का सबब एक वह ट्वीट भी है, जो भारत के न्यायाधिपति के उस चित्र के बारे में है, जिसमें सीजेआई एसए बोबड़े नागपुर में एक भाजपा कार्यकर्ता की 50 लाख की मोटर सायकल पर सवारी करते हुए दिख रहे हैं। इसी तारतम्य में 22 फरवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट में आयोजित न्यायिक सम्मेलन 2020 के उदघाटन समारोह में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ में न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा का भाषण भी उल्लेखनीय है। न्यायिक हलकों में उनके भाषण को हैरत और प्रतिक्रियाओं के साथ सुना गया था। न्यायपालिका का यह रूख संविधान की आत्मा पर खरोंच लगाता महसूस होता है।
