आपकी बात: भूपेश ही चेहरा, तालमेल और समन्वय में भाजपा को पीछे छोड़ती कांग्रेस

0 संजीव वर्मा
प्रदेश में इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव के पहले प्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस और भाजपा अपने-अपने घर को व्यवस्थित करने में जुट गए हैं। कांग्रेस ने सत्ता और संगठन में तालमेल बनाए रखने की दृष्टि से महत्वपूर्ण बदलाव कर यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह सभी वर्गों और समुदायों को लेकर चलने में विश्वास करती है। इस मामले में कांग्रेस ने भाजपा को काफी पीछे छोड़ दिया है। भाजपा ने अब अपनी चुनावी गतिविधियों को गति देते हुए विभिन्न समितियों का गठन किया है। जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो उसने प्रदेश अध्यक्ष की कमान एक युवा आदिवासी नेता दीपक बैज को सौंप दी है। वहीं, प्रदेश अध्यक्ष का जिम्मा संभाल रहे मोहन मरकाम को मंत्रिमंडल में शामिल कर मजबूत  संतुलन बनाने की कोशिश की है, जबकि स्कूल शिक्षा मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम को मंत्री पद से हटाकर योजना आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया है। इसके अलावा मंत्रियों के प्रभार में भी फेरबदल किया गया है। इस बीच, भाजपा इस बदलाव को जहां कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई का नतीजा बता रही है, तो कांग्रेस इसे सामान्य बदलाव कह रही है। हमारा मानना है कि कांग्रेस ने सत्ता और संगठन में एक साथ बदलाव कर अपनी चुनावी रणनीति को धार देने का काम किया है। ऐसा माना जाता है कि प्रदेश की सत्ता की चाबी आदिवासी बहुल क्षेत्र बस्तर और सरगुजा से होकर निकलती है। यही वजह है कि दोनों पार्टियों (कांग्रेस-भाजपा) की नजर इन दोनों संभागों पर टिकी हुई है। कांग्रेस ने सत्ता और संगठन में दोनों संभाग को बराबर की हिस्सेदारी देकर संतुलन बनाने का प्रयास किया है। सरगुजा संभाग से टी.एस. सिंहदेव उपमुख्यमंत्री और अमरजीत भगत कैबिनेट मंत्री हैं। डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम को भले ही मंत्रिडल से बाहर किया गया है, लेकिन उन्हें योजना आयोग का अध्यक्ष बनाकर कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे दिया गया है। इसी तरह बस्तर से कवासी लखमा कैबिनेट मंत्री है, जबकि संतराम नेताम विधानसभा उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। अब मोहम मरकाम को कैबिनेट मंत्री बनाकर उन्हें भी उचित सम्मान दिया गया है। इन बदलावों से जाहिर है कि कांग्रेस ने एक बार फिर आदिवासी कार्ड खेला है। प्रदेश अध्यक्ष से लेकर मंत्रिमंडल में इस समुदाय को खासा महत्व दिया गया है। भाजपा के प्रदेश प्रभारी ओम माथुर का कहना है कि जब भय पैदा होता है तो फेरबदल स्वाभाविक है। उनकी यह टिप्पणी बहुत कुछ कह रही है। उसके कई निहितार्थ हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि कांग्रेस पूरे चुनावी मोड में आ चुकी है और यह उसकी रणनीति का हिस्सा है। जहां तक मोहम मरकाम को हटाने का सवाल है तो इसकी पटकथा नवा रायपुर में आयोजित कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन के समय ही लिखी जा चुकी थी। मरकाम के कामकाज और उनकी गतिविधियों से ऐसा लग रहा था कि वे सत्ता के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे थे, लिहाजा सत्ता और संगठन के बीच दूरियां बढ़ गई थीं। महामंत्रियों की एकतरफा नियुक्तियां भी उनके हक में नहीं गई। प्रदेश प्रभारी महासचिव सैलजा की बातों की अनदेखी उन्हें बहुत भारी पड़ गई। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सत्ता-संगठन में तालमेल का अभाव रहा जिसके कारण उन्हें पद से हटाया गया। पार्टी हाईकमान ने मुख्यमंत्री की पसंद को प्राथमिकता देते हुए एक युवा आदिवासी नेता को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी। अब माना जा रहा है कि दीपक बैज सत्ता के साथ समन्वय बनाकर चलेंगे और चुनावी रणनीति को अमलीजामा पहनाएंगे। इन बदलावों से एक बात साफ हो गई कि प्रदेश में अब कांग्रेस मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी और वे ही चेहरा होंगे। साथ ही पार्टी का संगठन भी उन्हीं के हिसाब से संचालित होगा, ताकि चुनावी रणनीति में कोई रूकावट न आएं। बहरहाल, कांग्रेस सत्ता और संगठन में फेरबदल के बाद अंदरूनी टकराव को टालने में सफल रही है। साथ ही उसने जातीय व क्षेत्रीय समीकरणों को भी साध लिया है। उम्मीद जताई जा रही है कि इस कवायद के बाद अब पार्टी के भीतर अंतर्विरोध खत्म हो जाएगा।  यदि ऐसा हुआ तो आगामी चुनाव में कांग्रेस की राह आसान हो जाएगी। वैसे भी चुनाव में पार्टी के भीतर बेहतर तालमेल और समन्वय पहली जरूरत होती है। इस मामले में कांग्रेस ने भाजपा को काफी पीछे छोड़ दिया है।