रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा में बुधवार को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राजनांदगांव जिले में 2009 में हुए मदनवाड़ा नक्सल हिंसा की न्यायिक जांच रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट में आयोग ने तत्कालीन पुलिस आईजी मुकेश गुप्ता को घटना के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए माना है कि उन्होंने लड़ाई के मैदान में अपनाए जाने वाले गाइड लाइनों तथा नियमों के विरूद्ध काम किया।
न्यायाधीश शंभुनाथ श्रीवास्तव की अध्यक्षता वाली जांच रिपोर्ट में मुठभेड़ की परिस्थितियों और रणनीतिक गलतियों का खाका पेश किया है। आयोग ने निलंबित आईपीएस मुकेश गुप्ता की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं। आईजी गुप्ता ने एसपी वीके चौबे को बगैर किसी सुरक्षा कवच के आगे बढऩे का आदेश दिया और खुद बुलेटप्रूफ वाहन में बैठे रहे।
न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि यह बहुत दु:खद स्थिति है। आईजी जोन की उपस्थिति में नक्सलियों ने एक शहादत पाए एसपी और दूसरे पुलिसकर्मियों के शवों से बुलेटप्रूफ जैकेट, जूते, हथियार और दूसरी चीजें निकाल ली या फिर लूट लिए। आयोग ने माना कि अगर कमांडर या आईजी जोन ने बुद्धिमता या साहस का परिचय दिया होता तो नतीजा बिल्कुल अलग रहता। पर्याप्त समय था कि वह सीआरपीएफ, सीएएफ सहित अन्य सुरक्षा बलों को बुलाकर उनका उपयोग कर सकता था, लेकिन नहीं किया गया। आयोग के मुताबिक मुकेश गुप्ता 12 जुलाई 2009 को घटना क्षेत्र में सुबह 9.30 बजे से शाम 5.15 बजे तक मौजूद थे। उनकी मौजूदगी में ही इतनी बड़ी जनहानि हुई है।
एसपी सहित 29 पुलिस कर्मी हुए थे शहीद
इस नक्सली हमले में एसपी विनोद चौबे सहित 29 पुलिस कर्मी शहीद हो गए थे। 25 जवान कोरकोट्टी के जंगलों में, 2 जवान मदनवाड़ा में और जवानों का शव लाते समय 2 पुलिसकर्मी नक्सली हमले में शहीद हुए थे। नक्सलियों ने जवानों के रायफल, पिस्टल सहित हथियार लूट लिए थे। नक्सलियों का तांडव दो से तीन घंटे तक चला था। मामले में मानपुर थाना में अपराध दर्ज किया गया था। यह पहला मौका था जब किसी नक्सल हमले में एसपी की शहादत हुई थी।
सूचना के बाद भी ठोस प्लानिंग नहीं की गई
जांच में यह भी सामने आया है कि खुफिया विभाग ने मानपुर-मदनवाड़ा क्षेत्र में नक्सलियों के जमावड़े की सूचना दी थी। यह सूचना आईजी जोन को दी गई थी। उसके बाद भी उस क्षेत्र में ऑपरेशन के लिए कोई खास योजना नहीं बनाई गई। आईजी मुकेश गुप्ता को यह स्पष्ट रूप से पता था कि नक्सली बड़ी संख्या में मौजूद हैं और अपनी पोजिशन ले चुके हैं। वे सब जंगल में छिपे हुए हैं। ऐसे में एसपी विनोद चौबे को नक्सलियों से मुकाबला करने के लिए अग्रिम हमले में ढकेल दिया जाना एक बड़ी चूक है।
एम्बुश में फांस जवानों पर बरसाई थी गोलियां
नक्सली मदनवाड़ा में बनाए जा रहे पुलिस के बेस कैंप से नाराज थे। कैंप के पास दो जवान को नक्सलियों ने पहले अपना निशाना बनाया था। नक्सली हमले की सूचना पर तत्कालीन राजनांदगांव पुलिस अधीक्षक विनोद चौबे भी मौके पर पहुंच थे। मदनवाड़ा जाने वाले स्टेट हाइवे से सात किमी दूर कोरकोट्टी मार्ग पर लगभग 300 नक्सलियों ने जवानों को एम्बुस में फंसाया था। जवान जैसे ही एंबुस में फंसे नक्सलियों ने ब्लास्ट के बाद अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी थी।
न्यायाधीश शंभुनाथ श्रीवास्तव की अध्यक्षता वाली जांच रिपोर्ट में मुठभेड़ की परिस्थितियों और रणनीतिक गलतियों का खाका पेश किया है। आयोग ने निलंबित आईपीएस मुकेश गुप्ता की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं। आईजी गुप्ता ने एसपी वीके चौबे को बगैर किसी सुरक्षा कवच के आगे बढऩे का आदेश दिया और खुद बुलेटप्रूफ वाहन में बैठे रहे।
न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि यह बहुत दु:खद स्थिति है। आईजी जोन की उपस्थिति में नक्सलियों ने एक शहादत पाए एसपी और दूसरे पुलिसकर्मियों के शवों से बुलेटप्रूफ जैकेट, जूते, हथियार और दूसरी चीजें निकाल ली या फिर लूट लिए। आयोग ने माना कि अगर कमांडर या आईजी जोन ने बुद्धिमता या साहस का परिचय दिया होता तो नतीजा बिल्कुल अलग रहता। पर्याप्त समय था कि वह सीआरपीएफ, सीएएफ सहित अन्य सुरक्षा बलों को बुलाकर उनका उपयोग कर सकता था, लेकिन नहीं किया गया। आयोग के मुताबिक मुकेश गुप्ता 12 जुलाई 2009 को घटना क्षेत्र में सुबह 9.30 बजे से शाम 5.15 बजे तक मौजूद थे। उनकी मौजूदगी में ही इतनी बड़ी जनहानि हुई है।
एसपी सहित 29 पुलिस कर्मी हुए थे शहीद
इस नक्सली हमले में एसपी विनोद चौबे सहित 29 पुलिस कर्मी शहीद हो गए थे। 25 जवान कोरकोट्टी के जंगलों में, 2 जवान मदनवाड़ा में और जवानों का शव लाते समय 2 पुलिसकर्मी नक्सली हमले में शहीद हुए थे। नक्सलियों ने जवानों के रायफल, पिस्टल सहित हथियार लूट लिए थे। नक्सलियों का तांडव दो से तीन घंटे तक चला था। मामले में मानपुर थाना में अपराध दर्ज किया गया था। यह पहला मौका था जब किसी नक्सल हमले में एसपी की शहादत हुई थी।
सूचना के बाद भी ठोस प्लानिंग नहीं की गई
जांच में यह भी सामने आया है कि खुफिया विभाग ने मानपुर-मदनवाड़ा क्षेत्र में नक्सलियों के जमावड़े की सूचना दी थी। यह सूचना आईजी जोन को दी गई थी। उसके बाद भी उस क्षेत्र में ऑपरेशन के लिए कोई खास योजना नहीं बनाई गई। आईजी मुकेश गुप्ता को यह स्पष्ट रूप से पता था कि नक्सली बड़ी संख्या में मौजूद हैं और अपनी पोजिशन ले चुके हैं। वे सब जंगल में छिपे हुए हैं। ऐसे में एसपी विनोद चौबे को नक्सलियों से मुकाबला करने के लिए अग्रिम हमले में ढकेल दिया जाना एक बड़ी चूक है।
एम्बुश में फांस जवानों पर बरसाई थी गोलियां
नक्सली मदनवाड़ा में बनाए जा रहे पुलिस के बेस कैंप से नाराज थे। कैंप के पास दो जवान को नक्सलियों ने पहले अपना निशाना बनाया था। नक्सली हमले की सूचना पर तत्कालीन राजनांदगांव पुलिस अधीक्षक विनोद चौबे भी मौके पर पहुंच थे। मदनवाड़ा जाने वाले स्टेट हाइवे से सात किमी दूर कोरकोट्टी मार्ग पर लगभग 300 नक्सलियों ने जवानों को एम्बुस में फंसाया था। जवान जैसे ही एंबुस में फंसे नक्सलियों ने ब्लास्ट के बाद अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी थी।
