भाजपा और दलबदलुओं को हराने की भूमिका में दिग्विजय

– अरुण पटेल

मध्यप्रदेश में होने वाले 28 विधानसभा उपचुनावों में अब भाजपा के निशाने पर कमलनाथ और कांग्रेस के निशाने पर शिवराज सिंह चौहान सीधे-सीधे आ गए हैं तथा दोनों दल इन दोनों नेताओं पर ही तीखे हमले बोल रहे हैं। ग्वालियर-चम्बल संभाग में कांग्रेस के निशाने पर भाजपा सरकार के कथित घपले-घोटालों के साथ ही दलबदलू तथा ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं तो वहीं सिंधिया के निशाने पर कमलनाथ के साथ दिग्विजय सिंह भी हैं। दिग्विजय सिंह की इस चुनाव में क्या भूमिका रहेगी, यह मीडिया और भाजपा की दिलचस्पी का विषय रहा है। दिग्विजय सिंह ने स्वयं उपचुनावों में उनकी भूमिका के संबंध में पूछे जाने पर कहा कि मेरी भूमिका भाजपा हराओ, दलबदलू हराओ और मध्यप्रदेश में फिर से जय-जय कमलनाथ करते हुए उन्हें मुख्यमंत्री बनाओ की होगी। इस प्रकार दिग्विजय सिंह अपनी उस पुरानी भूमिका में आ गए हैं जिसका निर्वहन करते हुए उन्होंने डेढ़ दशक बाद 2018 के चुनाव में कांग्रेस की सफलता के लिए पार्टीजनों को एकजुट किया और जिसके फलस्वरुप कमलनाथ सरकार बनी थी। इन उपचुनावों में जहां एक ओर शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के भविष्य का फैसला होगा तो वहीं दूसरी ओर कांग्रेस की भावी दिशा और दशा तय होगी तथा इस बात का फैसला भी होगा कि क्या फिर से कमलनाथ प्रदेश के मुख्यमंत्री होंगे। लेकिन जहां तक ग्वालियर-चम्बल संभाग का सवाल है वहां पर ज्योतिरादित्य सिंधिया की प्रतिष्ठा दांव पर होगी क्योंकि वहां से 16 भाजपा प्रत्याशियों में से कितनों को वे जीत दिला पायेंगे उससे ही उनका राजनीतिक कद और हैसियत कुछ सालों के लिए तय होगी।

भाजपा की रणनीति में एक बदलाव यह देखने में आया है कि वह अब सिंधिया को प्रचार में कुछ पीछे रखेगी और अपने पुराने नेताओं को आगे रखने की रणनीति पर चलेगी। जैसे-जैसे चुनाव प्रचार अभियान जोर पकड़ेगा और उस अभियान में सिंधिया व शिवराज की जोड़ी, जैसा कि पहले कहा गया था वैसी सक्रिय रहती है या नहीं यह देखने की बात होगी। फिलहाल भाजपा दिग्विजय सिंह को छोड़कर कमलनाथ पर हमलावर हो गयी है और उनकी चौतरफा घेराबंदी कर रही है। 37 साल में लगातार केंद्र की कांग्रेस राजनीति में छाये रहने वाले और विपक्ष की आलोचना से बचे रहने वाले कमलनाथ को चक्रव्यूह में घेरने का भाजपा हरसंभव प्रयार कर रही है। कहीं उन पर कारपोरेट की तरह सियासत करने तो कहीं उन्हें 15 महीने के कार्यकाल के दौरान छिंदवाड़ा तक सीमित रहने के आरोपों का सामना करना पड़ रहा है। भाजपा के हमले कमलनाथ पर बढ़ते जा रहे हैं लेकिन कमलनाथ इससे विचलित हुए बिना अपनी राजनीति अपने ढंग से कर रहे हैं और गजब का आत्मविश्‍वास यह कहते हुए दिखा रहे हैं कि कांग्रेस की सरकार फिर से प्रदेश में बनेगी और वह मुख्यमंत्री होंगे। कांग्रेस ने आज शनिवार को अपने निवास पर वचनपत्र जारी करते हुए फिर ऐसा ही आत्मविश्‍वास प्रदर्शित किया।
कमलनाथ को फिर मुख्यमंत्री बनाने भिड़े दिग्विजय
दिग्विजय सिंह परदे के पीछे रहकर संगठनात्मक जमावट करने और रुठों को मनाने की भूमिका अदा कर रहे हैं। जिन लोगों को टिकट नहीं मिली या अन्य कारणों से नाराज हैं उन्हें वे सक्रिय कर रहे हैं। इसके साथ ही भारत निर्वाचन आयोग में सत्ता के दुरुपयोग की शिकायत करने व उसे निर्णायक परिणति तक पहुंचाने का काम वे कर रहे हैं और इसके लिए दिल्ली से लेकर भोपाल तक स्वयं आयोग के कार्यालय जाकर उसके सामने स्थिति स्पष्ट कर कार्रवाई करने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को डर है कि पार्टी कार्यकर्ता दलबदलू उम्मीदवार के लिए काम नहीं करेंगे इसलिए प्रचार का जिम्मा अधिकारियों-कर्मचारियों एवं खासकर पुलिस कर्मचारियों को सौंप दिया गया है। दिग्विजय सिंह ने बीते रोज मप्र मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी वीरा राणा से शिकायत की और कहा कि पुलिस अधिकारियों की लगातार शिकायतें हो रही हैं लेकिन उन पर कार्रवाई नहीं की जा रही। उसके बाद मीडिया से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि हमें उम्मीद है कि जिस प्रकार से कांग्रेस के कुछ विधायकों ने लोकतंत्र को बेच दिया है लेकिन मध्यप्रदेश का प्रशासकीय तंत्र मुख्य सचिव से लेकर चपरासी तक और पुलिस महानिदेशक से लेकर सिपाही तक अपने आपको नहीं बेचेगा।
आरोप-प्रत्यारोपों में तार-तार होती मर्यादा
इन उपचुनावों में सत्ता संतुलन डांवाडोल होने की संभावनाएं छिपी हुई हैं क्योंकि अंतत: तय तो मतदाताओं को ही करना है कि वह सत्ता की चाबी किसको सौंपना चाहता है। लेकिन प्रचार अभियान के दौरान भाषाई स्तर इतने निचले पायदान पर जा पहुंचा है कि उससे मर्यादा ही तार-तार हो रही है। विकास या सरकारों की विफलता का मुद्दा गौण हो गया है, ऐसा लगता है कि मानों नेतागण एक-दूसरे पर व्यक्तिगत खुंदस निकालने के लिए इस मौके का उपयोग कर रहे हैं। इस प्रकार के आरोप-प्रत्यारोप में भाजपा या कांग्रेस कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहती और एक-दूसरे के नहले पर दहला जड़ने को उतावले हैं, यही कारण है कि मध्यप्रदेश में चुनाव प्रचार का स्तर संभवत: पहली बार इतने निचले स्तर तक पहुंचता नजर आ रहा है। एक-दूसरे को उपमा देने की होड़ लगी हुई है। भूखा-नंगा, चुन्नू-मून्नू, चांडाल, खलनायक, काला कौवा और रावण आदि ऐसी उपमाएं हैं जो भाजपा व कांग्रेस नेताओं पर चस्पा की जा रही हैं। इस प्रकार की बयानवाजी दोनों तरफ से हो रही है। ऐसा लगता है मानों नेतागण अपने को एक-दूसरे से तुलनात्मक रुप से पाक-साफ रखकर मतदाताओं का दिल जीतना चाहते हैं, अब यह तो मतदाताओं की पारखी नजर पर है कि वह किसको तुलनात्मक रुप से अधिक उजला मानते हुए उसे सत्तासीन करते है। फिलहाल तो भरी सभा में नेताओं के बीच इस बात की होड़ लगी है कि कौन किसके खिलाफ कितना बुरा बोल सकता है। उपचुनाव का शोर तो थम जायेगा लेकिन जो कुछ बोला गया है वह लम्बे समय तक चुनाव प्रचार के गिरते स्तर के रुप में याद किया जाता रहेगा। कांग्रेस के नेता दिनेश गुर्जर ने मुख्यमंत्री शिवराज को नंगा-भूखा कहा तो शिवराज ने उसे एक मुद्दा बना लिया और यह बात चर्चा में रही। लेकिन अन्य नेताओं के बारे में जो कुछ कहा जा रहा है उसे वे शायद ही मुद्दा बना पायें क्योंकि वह काफी निम्न स्तर की शब्दावली होती है।
और यह भी
दूसरे यदि उपमा दें तो समझ में आता है लेकिन भाजपा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने स्वयं को ही काले कौआ कह डाला। सिंधिया ने एक चुनावी सभा में कांग्रेस के पूर्व मंत्री और गीतकार स्व. विट्ठल भाई पटेल के बॉबी फिल्म के गाने को गाते हुए कहा कि झूठ बोले कौवा काटे मैं काला कौआ हूं। मतदान तो 3 नवम्बर को होना है और उसमें अभी काफी समय है, लेकिन देखने वाली बात अब यही होगी कि नेताओं के बिगड़े बोल आखिर किस सीमा पर जाकर थमेंगे।

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