जेन-जी की जिद 

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने वह कर दिखाया जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। खासकर सरकार में बैठे नुमाइंदों ने तो यहां तक कह डाला था कि हमारी सरकार में इस्तीफे की परंपरा नहीं है। लेकिन उसे (सरकार) जेन-जी की जिद के आगे झुकना पड़ा और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की छुट्टी हो गई। इससे साबित हो गया कि जब युवा किसी विषय या मुद्दे को लेकर एक जुट हो जाएं तो उसे दरकिनार नहीं किया जा सकता। दरअसल कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन देशवासियों का ध्यान खींचने में सफल रहा है। संसद मार्च के दौरान बड़े पैमानों पर छात्रों पर दमन ने उसके एजेंडे के लिए समर्थन में इजाफा किया। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर जगह-जगह स्व:स्फूर्त विरोध से यह साफ हो गया था कि देश की जनता इस मुद्दे पर केंद्र की भाजपा सरकार के खिलाफ हो गई है। ऐसे में विपक्षी दलों को इसमें अपनी राजनीतिक रोटी सेकने का मौका भी मिला और लगभग सभी विपक्षी दलों ने इस आंदोलन को अपना समर्थन ही नहीं दिया बल्कि इस मुद्दे को लेकर प्रधानमंत्री आवास का घेराव भी किया। यही नहीं देश के अलग-अलग राज्यों के छोटे-बड़े शहरों में भी छात्रों पर हुए लाठीचार्ज के खिलाफ स्व:स्फूर्त विरोध-प्रदर्शनों से अंदाजा लग गया था कि यह मुद्दा दूर-दराज तक पहुंच गया है। साथ ही इस आंदोलन ने शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना दिया। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की कॉकरोच संबंधी टिप्पणी से प्रेरित होकर बनी कॉकरोच जनता पार्टी ने शिक्षा व्यवस्था पर सुधार को लेकर जिस तरह से सफल आंदोलन किया वह पूरी दुनिया में एक मिसाल बन गया। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद सीजेपी प्रमुख अभिजीत दीपके ने कहा है कि हम कॉकरोच हैं, एक बार घुस जाएं तो निकलते नहीं। प्रधान का इस्तीफा इस बात का सबूत है कि अगर आप डरे नहीं, तो जीत सकते हैं। उन्होंने कहा कि मैं चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया का शुक्रिया अदा करता हूं कि उन्होंने हमें कॉकरोच कहा। अगर आपने हमें कॉकरोच नहीं कहा होता तो प्रधान इस्तीफा नहीं देते। हालांकि मुख्य न्यायाधीश ने तब सफाई भी दी थी। उन्होंने कहा था कि इस मुद्दे को भावनात्मक ढंग से ना लें। उनके कथन के आशय को गलत समझा गया है। लेकिन वर्तमान घटनाक्रम बताता है कि सार्वजनिक जीवन में प्रयुक्त शब्द कभी-कभी अप्रत्याशित राजनीतिक प्रभाव पैदा कर सकते हैं। एक ओर आलोचकों ने इसे युवाओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली टिप्पणी माना, तो दूसरी ओर युवाओं ने इसे अपनी पहचान और प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया। बहरहाल, काकरोच पार्टी का आंदोलन भारतीय लोकतंत्र में यह संदेश देता है कि जनता, विशेषकर युवा वर्ग, नई राजनीतिक भाषा और नए नेतृत्व को अवसर देने के लिए तैयार है। हालांकि किसी भी आंदोलन की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह जनभावनाओं को ठोस नीतियों और स्थायी संगठन में कितना बदल पाता है? लेकिन इस आंदोलन ने एक ओर जहां सरकार को रक्षात्मक मुद्रा में लाकर खड़ा कर दिया है। वहीं, विपक्ष में नई जान फूंक दी है। वैसे धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा केवल एक मंत्री का जाना नहीं है बल्कि यह देश की पूरी परीक्षा और नीतिगत व्यवस्था की पारदर्शिता पर उठे गंभीर सवालों का नतीजा है। अब देश के लाखों प्रभावित छात्रों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या संसद में पेश नया एंटी-पेपर लीक बिल और केंद्रीय एजेंसियों की चल रही जांच उनकी खोई हुई मानसिक शांति और परीक्षा प्रणाली में उनके भरोसे को बहाल कर पाएगी?