* समाज में विकृति आ जाए तो उसे पटरी पर लाने का काम करती है सनातन संस्कृति*
रायपुर। आज भी सर्वश्रेष्ठ है सनातन संस्कृति। यह सनातन संस्कृति हमारे भारतवर्ष का गौरव है। पूरे विश्व में जितने राष्ट्र है उनमें सभ्यता तो है लेकिन संस्कृति नहीं है और संस्कृति केवल एक है और वह है सनातन। प्रकृति में विकृति का आना स्वाभाविक है लेकिन इस विकृतिरुपी समाज को फिर से पटरी पर लाने का काम संस्कृति करती है। समाज की मुख्य धारा से जोड़ देती है। रामचरित मानस हम सुन रहे है लेकिन उसका उद्देश्य क्या है, उसका उद्देश्य है चरित्र निर्माण। इसका बोध उसे कहां से हुआ, ज्ञान से हुआ और अगर आपके पास चरित्र ही नहीं है तो आपको बोध कहां से होगा। ये सारी कडिय़ां एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।
सिंधु पैलेस शंकरनगर में आयोजित श्रीराम कथा ज्ञान यज्ञ में मानस मर्मज्ञ दीदी मां मंदाकिनी ने बताया कि आज कथाएं इतनी हो रही है और चारों ओर चर्चा भी है लेकिन लोगों को इन कथाओं से क्या उनके सही – सही प्रश्नों का जवाब मिल पा रहा है। सनातन की चर्चा भी कुछ ज्यादा ही हो रही है क्योंकि अभी विशेष काल भी चल रहा है। हमारी सनातन संस्कृति का तात्पर्य क्या है एवं उसका वैशिष्ट क्या है ? किसी भी राष्ट्र में वह साहस नहीं है कि जो सर्वोच्च शक्ति है उसे नीचे उतार सके उनको भाई, पिता, मित्र, पुत्र एक संबंध के रुप में उनके साथ जी सके। उनका दुख-सुख बांट सकें। एक मात्र सनातन संस्कृति है जो सबको नीचे उतार सकती है वह पूरे लोक में नहीं है और वह हमारे बीच में है। सर्वस्त्र ब्रम्ह है तो अब बात यह उठती है कि हमें ब्रम्ह दिखाई क्यों नहीं दे रहा है। देखने का दृष्टिकोण लोगों के पास नहीं हैं। ब्रम्ह को पहचाने की दृष्टि ज्ञान के पास है, तो ज्ञान की दृष्टि हमारे पास होना जरूरी है। अब ज्ञान और विज्ञान के साथ जुड़ करके, देखिए, जहां पर दूसरा पक्ष यह दिखाई दे रहा है कि कम्प्यूटर आ गया, उसके ऊपर सुपर कम्प्यूटर आ गया, एआई आ गया और अब हमारी भारत सरकार ने भी बना दिया आईकेएस इसका मतलब होता है इंडियन नॉलेज सिस्टम। अब क्या कम्प्यूटर और सूचना के माध्यम से हमें ज्ञान मिलेगा। इतना हाइटेक बना दिया और गूगल में सब कुछ डाल दिया और आप सोचेंगे कि उससे हमें ज्ञान प्राप्त हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं है, हमारा ज्ञान जो है वह परम चैतन्य प्रभु और ईश्वर अनंत से जुड़ा है तो वह कोई डाटा बेस पर आधारित हो ही नहीं सकता। हमारी सनातन संस्कृति में मनाते है कि समय-समय पर ईश्वर अवतार जरुर लेते है इसे गीता, मानस ने भी माना है। अवतार होता है तो अवतार होने के बाद क्या हम उन्हें पहचान पाते है। हमारे पास दो गुण होते है एक निर्गुण और दूसरा सगुण, निगुण में हम कहते है कि यह हमारे समझ से परे है और जब वह सगुण बनता है तो सगुण बनकर वह हमारे सामने खड़ा हो जाता है लेकिन क्या हम उन्हें ईश्वर के रुप में पहचान सकें। माया मोह में फंसे लोग प्रभु को पहचान ही नहीं पाते हैं। जिसने अपना खेल अच्छे से खेला वह सगुण हो गया और जिसने ईश्वर को पाने के बाद भी नहीं पहचाना वह निगुण है।
भक्ति शास्त्र का परम उद्देश्य क्या है,जैसे सभी लोग राम नहीं है, जिस दिन ज्ञान की दृष्टि में यह आत्मबोध हो जाएगा तब आत्मा की दृष्टि में हमें शरणागति मिल जाएगी। जो यह मनुष्यरुपी शरीर मिला है उसे प्राप्त करके हमें यह जानना चाहिए कि हमारे चारो ओर प्रभु है लेकिन उसे पहचाने की जरुरत है। प्रभु को पहचाने की दृष्टि हमें कैसे प्राप्त हो ये लक्षण श्रीराम कथा में बतायी जायेगी। श्रीरामकिंकर आध्यात्मिक मिशन के श्रोता यहां सुनने आए हैं उन्हें यह पता है कि यहां मनोरंजन और नाच गाना नहीं होगा, यहां विशुद्ध रुप से सिर्फ उन्हें आत्ममंथन करने को मिलेगा। क्योंकि शरीर से जीव छूटने के बाद हमारी गति क्या होगी यह किसी को पता नहीं होता है, ये तो हमें इसी जीवन में प्राप्त करना है और ये हमारे सनातन धर्म की विशिष्टता है क्योंकि ज्ञान मार्ग बहुत कठिन है लेकिन भक्ति मार्ग बहुत ही आसान है।
