छत्तीसगढ़ में लोकतंत्र के महायज्ञ में मतदाताओं ने आहुति डाल दी है। अब सभी को नतीजे का इंतजार है। इससे पहले आकलन, अनुमान और संभावनाओं का दौर शुरू हो गया है। कोई कांग्रेस तो कोई भाजपा पर अपनी मुहर लगा रहा है, लेकिन अंतिम परिणाम बताने की स्थिति में कोई भी नहीं है। दरअसल इस बार के चुनाव में मतदाताओं के मन को टटोलने में बड़े-बड़े राजनीतिक दल और राजनीतिक विश्लेषक भी असफल रहे हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों में बेचैनी स्पष्ट दिख रही है। हालांकि भाजपा की अपेक्षा कांग्रेस ज्यादा आश्वस्त नजर आ रही है, लेकिन वह भी ज्यादा कुछ कहने की स्थिति में नहीं है। इसके अपने कारण भी हैं। इस बार का चुनाव पिछली बार की अपेक्षा अलग रहा। मुद्दे तो जैसे गायब ही रहे। पूरा चुनाव खेती-किसानी और महिलाओं पर ही केंद्रित रहा। गरीबी, महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दे गायब हो गए। कर्ज माफी, मुफ्त बिजली, गैस सब्सिडी और महिलाओं को हर साल 12 से 15 हजार रुपए देने का वादा हावी रहा। इन सब के बावजूद मतदाताओं की खामोशी से सहमे राजनीतिक दल और उनके नेताओं में ऊहापोह की स्थिति नजर आ रही है। बहरहाल, इस बार भी पिछली बार यानी 2018 की तरह 75 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ। यह मतदान किस तरह का संकेत दे रहा है। इसको लेकर भी कयास लगने शुरू हो गए हैं। भाजपा इसे सत्ता पक्ष के खिलाफ बता रही है, तो कांग्रेस राज्य सरकार की सफलता से प्रेरित करार दे रही है। कांग्रेस का कहना है कि पिछले 5 सालों में भूपेश सरकार ने जिस तरह से किसानों का कर्ज माफ सहित अपने घोषणा पत्र में किए गए वादों को पूरा किया है उससे जनता में सरकार के प्रति विश्वास बढ़ा है। यही वजह है कि इस बार भी उसके घोषणा पत्र से प्रभावित होकर मतदाताओं ने बड़ी संख्या में वोट डाले। हालांकि भाजपा इससे ऐतबार नहीं रखती। उसका कहना है कि कांग्रेस ने जनता के साथ धोखा किया। कई वादे पूरे नहीं किए। ऐसे में जनता की नाराजगी का लाभ उसे मिलेगा। हालांकि भाजपा ने इस बार जनता को लुभाने के लिए वह हर जतन किया, जिसे वह रेवड़ी मानती है। पिछले 15 सालों की अपनी सरकार के दौरान किसानों को बोनस देने का वादा करने के बावजूद नहीं दिए जाने से नाराज किसानों से इस बार प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान 3100 रूपए प्रति क्विंटल की दर से खरीदने का वादा किया है। हालांकि उसने कर्ज माफी से किनारा कर लिया। लेकिन 2 साल का बकाया बोनस एक साथ देने की बात कह कर वह किसानों को अपने पक्ष में करने का दांव चला। साथ ही महिलाओं 12000 रुपया हर साल देने की बात कही। वह इसे तुरूप का इक्का समझ रही है। लेकिन कांग्रेस ने दीपावली के दिन महिलाओं को ‘गृह लक्ष्मी योजना’ के तहत हर साल 15000 रुपए देने की घोषणा कर नहले पर दहला जड़ दिया। यानी सभी पार्टियां आम जनता को रिझाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि किसका दांव चला और कौन फेल हुआ। हमारा मानना है कि इस चुनाव में महिलाओं के खाते में सीधे पैसा डालने का मुद्दा सब पर भारी रहा। जिस तरह से महिलाओं ने मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, वह निर्णायक साबित होगा। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की लंबी-लंबी कतारें देखी गई हैं । वे अलग-अलग नहीं बल्कि सात-आठ की संख्या में एक साथ ग्रुप में मतदान करने पहुंची,जो इस बात का संकेत है कि जिसके भी पक्ष में यह मत जाएगा वह निश्चित रूप से बढ़त हासिल करेगा। हालांकि भाजपा-कांग्रेस के अपने-अपने दावे हैं और वे दावे को साबित करने का प्रयास भी कर रहे हैं। लेकिन इन दावों की सच्चाई 3 दिसंबर को सामने आएगी। तब तक अटकलबाजियों और कयासों का दौर चलता रहेगा। वहीं , लोगों में यह उत्सुकता भी बनी हुई है कि इस बार मोदी की गारंटी चली या भूपेश का भरोसा बरकरार रहा।
आपकी बात: मोदी की गारंटी या भूपेश का भरोसा?
