आपकी बात: किसानों पर कांग्रेस के अटूट विश्वास को तोड़ने भाजपा का ब्रह्मास्त्र ?

0 संजीव वर्मा
छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव की सरगर्मी धीरे-धीरे बढ़ने लगी है। भले ही अभी आचार संहिता लागू नहीं हुआ हो, लेकिन दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। साथ ही आम जनता खासकर, किसानों के बीच अपनी किसान हितैषी छवि गढ़ने में जुट गए हैं। इसी कड़ी में एक ओर जहां कांग्रेस ने अपने अगले कार्यकाल में 3600 रुपए तक प्रति क्विंटल की दर से धान  खरीदे जाने का दावा किया तो भाजपा ने इस पर कटाक्ष करते हुए कहा कि वह अपने दम पर 2800 रु. क्विंटल में धान खरीदकर दिखाए। दरअसल छत्तीसगढ़ में गांव-गरीब और किसान शुरू से ही मुख्य मुद्दा रहा है। इसमें कांग्रेस फिलहाल भाजपा से काफी आगे निकल चुकी है। वह न केवल किसानों से कर्ज माफ का अपना वादा पूरा किया है बल्कि 2500 रु. क्विंटल में धान खरीदकर किसानों का दिल जीत लिया है। उपर से अगले कार्यकाल में 3600 रुपये प्रति क्विंटल में धान खरीदे जाने का दांव चल दिया है। राज्य सरकार के प्रवक्ता और कृषि मंत्री रविन्द्र चौबे ने  कहा है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की दोबारा सरकार बनी तो किसानों को दोहरा फायदा होगा। उन्होंने कहा कि धान का समर्थन मूल्य हर साल बढ़ने के हिसाब से किसानों को बढ़ी हुई कीमतें मिलती जाएंगी। आगामी सरकार के कार्यकाल तक धान की कीमत 3600 रु. तक पहुंच जाएगी। उन्होंने कहा कि प्रदेश के किसानों का शुरू से कांग्रेस को समर्थन रहा है, आगे भी किसानों का समर्थन मिलता रहेगा। उन्होंने कहा कि धान की समर्थन मूल्य पर होने वाली खरीदी की सबसे ज्यादा कीमत कांग्रेस का बड़ा चुनावी मुद्दा भी है। वहीं, भाजपा इस मुद्दे पर बैकफुट पर दिखाई दे रही है। उसे कुछ कहते नहीं बन रहा है। वह केंद्र सरकार के भरोसे अपनी नैया पार लगाना चाहती है। प्रदेश में जहां भी भाजपा नेता जा रहे हैं, किसान उससे पिछले 15 साल का हिसाब मांग रहे हैं। दरअसल किसानों को बोनस नहीं देकर तत्कालीन भाजपा सरकार ने अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार ली थी। उसका असर आज भी देखने को मिल रहा है। उपर से राज्य में नेतृत्व को लेकर भी उहा-पोह की स्थिति बनी हुई है। कहा जा रहा है कि इस बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा कोई स्थानीय नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी है। भाजपा मोदी के चेहरे को भुनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है। वह पिछले चुनाव की कड़वी यादों को भुला देना चाहती है, जब डॉ. रमन सिंह के चेहरे पर चुनाव लड़ी थी और उसे करारी हार का सामना करना पड़ा था। यही वजह है कि वह इस बार प्रधानमंत्री का चेहरा सामने रखा है। साथ ही वह नई रणनीति के साथ चुनावी समर में उतरने का मन बनाया है। वह दिख भी रहा है। केंद्रीय नेतृत्व ही सारे फैसले ले रहा है। हालांकि आज भी पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की फ्रंटफुट पर दिख रहे हैं। उनसे ही सलाह मशविरा लिए जा रहे हैं। भाजपा ने 21 प्रत्याशियों की सूची भी जारी कर दी है। इसमें भी केंद्रीय नेतृत्व का फैसला साफ दिख रहा है। वह राज्य के नेताओं के भरोसे चुनाव नहीं लड़ना चाहती है। वह केंद्र  की नरेन्द्र मोदी सरकार के कामकाज और उसकी योजनाओं के जरिए प्रचार-प्रसार की रणनीति पर भी काम करना शुरू कर दिया है। धान की खरीदी में केंद्र का योगदान, किसान सम्मान निधि, पीएम कौशल योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, खाद पर सब्सिडी और सौभाग्य योजना जैसी योजनाओं को केंद्र में रखकर लोगों के बीच जाकर उनका दिल जीतने की कोशिश करेगी। लेकिन वह इसमें कितनी सफल होगी यह तो भविष्य तय करेगा। इसके विपरीत कांग्रेस भले ही सामूहिक नेतृत्व पर चुनाव लड़ने की बात कह रही है, लेकिन सब जानते हैं कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ही उसका चेहरा है। उनकी किसानों और युवाओं के बीच पकड़ ने भाजपा को परेशान कर रखा है। ‘भूपेश है तो भरोसा है’ और ‘कका अभी जिंदा है’ के नारे प्रदेश में अच्छे खासे लोकप्रिय है। वहीं, 1 नवंबर से धान खरीदी और प्रति एकड़ 20 क्विंटल धान की खरीदी ने किसानों को खासा आकर्षित कर रखा है। पिछले 5 साल तक जिस तरह से भूपेश सरकार ने किसानों का ख्याल रखा है। उससे किसानों का उस पर अटूट विश्वास दिख रहा है। इस विश्वास को तोड़ने के लिए भाजपा को ‘ब्रह्मास्त्र’ की जरूरत पड़ेगी। लेकिन यह ‘ब्रह्मास्त्र’ वह कहां से लाएगी, यह बड़़ा सवाल है। फिलहाल तो यह दूर की कौड़ी दिखाई दे रही है। फिर भी कांग्रेस को अति आत्मविश्वास से बचना चाहिए, क्योंकि चुनाव में साम-दाम दंड सभी भेद आजमाए जाते हैं और इससे जो पार पा लेगा वही विजेता बनकर उभरेगा। फिलहाल चुनाव को अभी करीब तीन महीने शेष है। तब तक कितने कसमें और वादे किए जाएंगे। साथ ही नई-नई चालें चली जाएंगी। लेकिन पूरा दारोमदार आम जनता पर ही होगा, क्योंकि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि है।