O संजीव वर्मा
कांग्रेस की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा को दो सप्ताह पूरे हो गए। राहुल गांधी के नेतृत्व में हो रही इस यात्रा के दौरान जिस तरह से लोगों का हुजुम उमड़ रहा है, उससे कांग्रेस को जरूर उम्मीद बंध रही होगी। हालांकि 150 दिन और 3570 कि.मी. की यह लंबी यात्रा अभी शुरूआती दौर में है। ऐसे में इस बारे में अभी से कुछ कहना गैरवाजिब होगा। लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जब कोई प्रयोग होता है तो उसका परिणाम किसी को मालूम नहीं होता। हालांकि इसमें नाकामी भी छिपी होती है। लेकिन उनके बीच से ही किसी ना किसी प्रकार का अविष्कार का जन्म भी होता है। इसलिए किसी प्रयास को यूं ही खारिज करना बुद्धिमानी नहीं है। दरअसल, पिछले कुछ दशकों से यह देखने को मिल रहा है कि राजनेता अपने आपको जनता से काटकर शानदार वातानुकूलित संस्कृति में कैद कर लेते हैं । राजनेताओं पर राजनीति इस कदर हावी हो गई है कि वे भूल गए हैं कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि है। जनता जब चाहे तब उन्हें सत्ता से बेदखल कर सकती है और यही सच है। जनता की क्या राय है। वह क्या सोचती है। यह बात राजनेताओं के लिए आज कोई मायने नहीं रखती। यही वजह है कि अब आम जनता की नजर में भी राजनेताओं और उनकी पार्टियों की हैसियत लगातार घट रही है। ऐसे में राहुल गांधी का जनता के बीच जाना बेहद महत्वपूर्ण है। कन्या कुमारी से शुरू हुई उनकी यात्रा 12 राज्यों और दो केन्द्रशासित प्रदेशों से गुजरकर जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में खत्म होगी। खैर, राहुल की यात्रा को भले ही कांग्रेस गैर-राजनीतिक बता रही है। लेकिन इसका सियासी मकसद जगजाहिर है। कांग्रेसी इसकी तुलना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 12 मार्च 1930 की दांडी यात्रा से कर रहे हैं। जबकि भाजपा इस पर सवाल उठा रही है। हमारा मानना है कि यात्रा के अपने मायने होते हैं और इससे इंकार नहीं किया जा सकता। समय-समय पर पद यात्राएं अपना असर भी दिखाती रही हैं। हालांकि इस समय देश में कांग्रेस की स्थिति क्या है? यह किसी से छिपी नहीं है। राहुल गांधी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के जरिए कार्यकर्ताओं में एक नया जोश भरने के साथ संगठन को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहे हैं। यह दिख भी रहा है। ऐसे में क्या इस पदयात्रा के जरिए कांग्रेस अपने खोए सियासी जनाधार को वापस ला पाएगी? यह बड़ा सवाल है। वैसे इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो देश में जब-जब पद यात्राएं हुई है, तो उसका असर भी हुआ है। महात्मा गांधी की दांडी यात्रा सबसे महत्वपूर्ण है। यह यात्रा अंग्रेजों के खिलाफ थी, जो स्वतंत्रता आंदोलन में अहम भूमिका निभाई। उसे छोड़ दे तो सियासी तौर पर लालकृष्ण आडवानी की रथयात्रा से लेकर दिग्विजय सिंह की नर्मदा यात्रा के अपने मायने हैं। चंद्रशेखर की ‘भारत एकता यात्रा’, तेलंगाना के केसीआर और आंध्रप्रदेश के राजशेखर रेड्डी और जगन मोहन रेड्डी ने भी पदयात्रा की और खुद को सियासत में स्थापित किया। मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने 2018 में नर्मदा यात्रा निकाली, जिसका सियासी असर दिखा और विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को अपेक्षित सफलता भी मिली। बहरहाल, कांग्रेस की इस ‘भारत जोड़ो यात्रा’ भी इसी का एक रूप है। राहुल गांधी ने इसे तपस्या कहा है। तपस्या का फल कब मिलेगा? यह भविष्य के गर्भ में है। लेकिन अगर कांग्रेस यात्रा के दौरान जनता की बात सुन ले और उसके अनुसार अपनी नीतियों को मूर्तरूप दे तो संभव है वह जिस सोच और इरादे के साथ यात्रा निकाली हैं, उसमें कामयाब हो।
