आपकी बात: बैठने लगे चुनावी समीकरण

O संजीव वर्मा

देश में लोकसभा और प्रदेश में विधानसभा चुनाव डेढ़ से दो साल दूर हैं। लेकिन अभी से ही सियासी समीकरण बैठने शुरू हो गए हैं। इसमें भाजपा ज्यादा सक्रिय है। उसने लोकसभा चुनाव में 350 सीटों का लक्ष्य रखा है। जबकि विधानसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ पर उसकी नजर है। पिछले हफ्ते मिशन 2024 के मद्देनजर भाजपा ने 15 राज्यों के अपने ‘सेनापति’ यानी प्रभारी और सहप्रभारी को बदलकर इस बात के संकेत दे दिए हैं कि वह चुनावी किला फतह करने कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहती। छत्तीसगढ़ भी इससे अछूता नहीं रहा। प्रदेश प्रभारी डी. पुरंदेश्वरी की छुट्टी कर दी गई। उनके स्थान पर ओम माथुर को प्रभारी बनाया गया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि जब प्रभारी बदलने की खबर दिल्ली से आई तो उस समय पुरंदेश्वरी राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी.नड्डा के साथ रायपुर के प्रदेश भाजपा कार्यालय में बैठक कर रही थीं। इसका सीधा अर्थ है कि इसकी भनक किसी को नहीं लगी और आनन-फानन में पुरंदेश्वरी को हटा दिया गया। इससे पहले भाजपा ने अपने प्रदेश अध्यक्ष विष्णु देव साय और नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक को भी बदला है। इसके बाद अब प्रदेश प्रभारी का नाम सामने आया है। कुल मिलाकर भाजपा प्रदेश में ‘सब कुछ बदल डालूंगा’ की तर्ज पर काम कर सत्ता की सीढ़ी तक पहुंचना चाह रही है। ओम माथुर उनमें एक बड़ा नाम है। कहा जाता है कि माथुर कूटनीति के माहिर खिलाड़ी हैं। उन्हें राजनीति का लंबा अनुभव है। वे संघ की पृष्ठभूमि से आते हैं। गुजरात, उत्तरप्रदेश, मध्य प्रदेश , जैसे राज्यों का प्रभार संभाल चुके हैं। वे प्रधानमंत्री के करीबी लोगों में शुमार है। शायद यही वजह है कि अब छत्तीसगढ़ फतह की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई है। देखना होगा कि वे इस पर कितना खरा उतरते हैं। इसी तरह लोकसभा चुनाव के लिए भी भाजपा ने नई रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। पिछले दिनों पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की हुई बैठक में 2019 के चुनाव में हारी हुई 144 सीटों पर खास फोकस करने का निर्णय लिया गया है। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने इन सीटों पर योजना को लेकर मंत्रियों के साथ समीक्षा बैठक की। माना जा रहा है कि भाजपा आगामी आम चुनाव में ऐसी सीटों पर ध्यान लगा रही है, जहां वह दूसरे या तीसरे नंबर पर रही थी। अब इन सीटों पर मजबूती के लिए पार्टी ने हर मंत्री को करीब 2 से 3 सीटें आबंटित कर मैदान में उतारा है। यहां यह बताना लाजिमी है कि पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 10 राज्यों की सभी सीटें अपने नाम कर ली थी। इसमें राजस्थान और गुजरात शामिल हैं। जबकि केरल और तमिलनाडु जैसे 11 राज्यों में पार्टी खाता भी नहीं खोल सकी थी। इसके अलावा महाराष्ट्र और बिहार ऐसे राज्य हैं, जहां भाजपा के अच्छे प्रदर्शन में उसके सहयोगी दलों की अहम भूमिका थी। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना में फूट, बिहार में जनता दल (यू) और पंजाब में अकाली दल का गठबंधन से बाहर जाना भाजपा के लिए खतरे की घंटी है। उपर से सत्ता विरोधी लहर से भी भाजपा को नुकसान हो सकता है। यही वजह है कि पार्टी ऐन-केन प्रकारेण इसकी भरपाई करना चाहती है और इसी के मद्देनजर वह हारी हुई सीटों पर दांव लगाने की तैयारी में लगी है। उधर, कांग्रेस ने भी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के बहाने चुनावी तैयारी शुरू कर दी है। भले ही कांग्रेस के नेता इस बात से इंकार करें लेकिन यह चुनावी रणनीति का ही हिस्सा है। इसमें राहुल गांधी कितने कामयाब होंगे यह तो भविष्य में पता लगेगा लेकिन जिस तरह से उन्होंने यात्रा शुरू की है उससे भाजपा में ‘हड़कंप’ जरूर मच गया है। संभवत: राहुल गांधी की यह पहली लंबी ‘पद यात्रा’ है, जिसके जरिए वे अपनी मंशा सीधे लोगों तक पहुंचा रहे हैं। राहुल कहते हैं कि यह पद यात्रा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को संदेश देने के लिए नहीं है बल्कि यह समझने की कोशिश है कि जमीनी स्तर पर क्या हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि वे पद यात्रा का नेतृत्व नहीं कर रहे हैं बल्कि कांग्रेस के एक सदस्य के रूप में इस यात्रा का हिस्सा बने हैं। बहरहाल, भाजपा-कांग्रेस ने चुनावी ताल ठोंकना शुरू कर दिया है। इसी के मद्देनजर वे अपनी -अपनी रणनीति पर काम भी कर रहे हैं। सम्मेलन, रोड शो, सभा और पदयात्रा के जरिए जनता तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश में लगे हैं। जनता बड़े ध्यान से दोनों दलों की बातों को देख व समझ रही है। लेकिन वे चुप हैं। उसकी चुप्पी क्या रंग लाएगी यह चुनाव के बाद ही पता चलेगा।