O संजीव वर्मा
छत्तीसगढ़ में 5 लाख से अधिक शासकीय कर्मचारियों और अधिकारियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल 12 दिनों तक चली। कर्मचारी-अधिकारी फेडरेशन के बैनर तले यह हड़ताल केंद्र सरकार के कर्मचारियों के बराबर 34 प्रतिशत महंगाई भत्ता और गृह भाड़ा भत्ते को लेकर की गई थी। इस बारह दिवसीय हड़ताल से अधिकारियों और कर्मचारियों के मन की मुराद पूरी हुई या नहीं यह तो हम नहीं जानते, लेकिन आम जनता का जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई नहीं हो सकती। जनता में भी इसकी अच्छी प्रतिक्रिया नहीं है। वे हड़ताल के लिए कर्मचारियों और अधिकारियों को दोषी ठहरा रहे हैं। उनका कहना है कि जब राज्य सरकार ने पहले ही 6 प्रतिशत डीए बढ़ाने की घोषणा कर दी थी और आगे आश्वासन भी दिया गया था तो फिर इस हड़ताल का क्या औचित्य? वैसे हड़ताल स्थगित करने को लेकर जो सहमति बनी है उसके अनुसार राज्य सरकार बाकी 6 प्रतिशत महंगाई भत्ता दीवाली या राज्योत्सव के आसपास कर्मचारियों को देगी, ऐसा फेडरेशन का दावा है। वह यह भी दावा कर रहा है कि एरियर्स के अलावा एचआरए यानी गृहभाड़ा भत्ते को लेकर भी सहमति बनी है और इसी वायदे पर कर्मचारियों ने अपनी हड़ताल स्थगित की है। लेकिन यह आश्वासन लिखित में या मौखिक मिला है यह स्पष्ट नहीं है। ऐसे में यह सवाल उमड़-घुमड़ रहा है कि आखिर कर्मचारियों को इस हड़ताल से क्या हासिल हुआ? 12 दिन तक हड़ताल को लेकर प्रदेश की सियासत गर्म रही। ‘थोथा चना बाजे घना’ की तरह विपक्षी दल और उनके तमाम नेता सियासत करते रहे। सारा ठींकरा राज्य सरकार के मत्थे डाला गया। कहा गया कि महंगाई भत्ता कर्मचारियों का हक है और राज्य सरकार उनका हक मार रही है। लेकिन एक बार भी सियासत के ये तमाम खिलाड़ी जनता के हक की बात नहीं कर सके। हड़ताल में चपरासी, बाबू से लेकर पटवारी तक और तहसीलदार से लेकर जनपद सीईओ के साथ न्यायालयीन कर्मचारी भी शामिल थे। लिहाजा, जनता हड़ताल के दौरान हलाकान रही। छोटे-छोटे कामों के लिए लोग भटकते रहे। अधिक अच्छा होता यदि विपक्ष जनता का साथ देता। लेकिन वह सिर्फ सियासत करता रहा। नतीजा सिफर रहा और हड़ताल ‘ढॉक के तीन पात’ साबित हुआ। ‘माया मिली ना राम’ की तर्ज पर सिर्फ आश्वासन का झुनझुना ही मिला। अब हड़ताली कर्मचारियों को लोगों के आक्रोश का सामना करना पड़ रहा है। बीते शनिवार को बिलाईगढ़ में हड़ताली शिक्षकों के स्कूल आने पर पालकों ने हंगामा किया और शिक्षकों को स्कूल के अंदर जाने से रोक दिया। यह बताता है कि आम लोग कितने परेशान थे। फेडरेशन के अध्यक्ष ने माफी मांगकर अपने कर्तव्यों से इतिश्री कर ली। लेकिन जनता इससे खुश नहीं है। ऐसे में इन कर्मचारी संगठनों को नए सिरे से सोचने की जरूरत है। सिर्फ सरकार पर दबाव डालने के लिए हड़ताल करना उचित नहीं है। हड़ताल से सरकार कम जनता ज्यादा परेशान होती है। यह सच है कि शासन-प्रशासन में शासकीय कर्मचारियों की अहम् भूमिका होती है। वे शासन के अंग होते हैं। उनकी अहमियत सरकार भी अच्छी तरह जानती-समझती है। यही वजह है कि सरकार हमेशा उनका ध्यान रखती है। लेकिन ‘ब्लैकमेल’ नहीं होना चाहिए। न सरकार की तरफ से न कर्मचारियों की तरफ से। ताली दोनों हाथों से बजती है। ऐसे में दोनों को मिल जुलकर काम करना होगा। इसी में सबका हित है।
