O संजीव वर्मा
कांंग्रेस के वफादार और समर्पित नेताओं में शुमार गुलाम नबी आजाद ने आखिरकार पार्टी को अलविदा कह दिया। यह कोई सामान्य बात नहीं है। यह सच है कि लोग पार्टी में आते-जाते रहते हैं, लेकिन गुलाम नबी आजाद जैसे लोगों का इस तरह जाना पार्टी के लिए गहरे आघात से कम नहीं है। वह भी ऐसे समय में जब पार्टी को आजाद जैसे नेताओं की जरूरत है। वैसे आजाद ने इस्तीफा भले ही अभी दिया हो, लेकिन सच यह है कि इसकी स्क्रिप्ट काफी पहले लिखी जा चुकी थी। 2020 से ही आजाद और उनके जैसे असंतुष्ट नेताओं के जी-23 गुट ने नेतृत्व की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाकर सांगठनिक चुनाव कराने की मांग करते हुए सोनिया गांधी को पत्र लिखा था। अब वहीं लोग एक-एक कर पार्टी छोड़ रहे हैं। आजाद भी उसी कड़ी में शामिल हैं। कांग्रेस ने उन्हें क्या कुछ नहीं दिया। पहले 5 दशकों में उन्हें युवा कांग्रेस अध्यक्ष, कांग्रेस महासचिव, सांसद, केन्द्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री से लेकर राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी। लेकिन एक झटके में उन्होंने कांग्रेस को छोड़ दिया। यही नहीं नेतृत्व पर सवाल उठाकर उन्होंने यह बताने का प्रयास किया कि वे मजबूरी में पार्टी छोड़ रहे हैं। वैसे, गुलाम नबी आजाद कांग्रेस के उस जी-23 गुट के सबसे प्रमुख चेहरे थे, जिन्होंने राहुल गांधी के नेतृत्व शैली को लेकर सोनिया गांधी से शिकायत की थी। उस गुट में आजाद के अलावा कपिल सिब्बल, शशि थरूर, मनीष तिवारी, आनंद शर्मा, पीजे कुरियन, रेणुका चौधरी, मिलिंद देवड़ा, मुकुल वासनिक, जितिन प्रसाद, भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, संदीप दीक्षित, राजिंदर कौर भट्टल जैसे नेता शामिल थे। इनमें से कई नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। पिछले दो साल के रिकॉर्ड को देखें तो ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, कपिल सिब्बल और हार्दिक पटेल जैसे दिग्गज नेता कांग्रेस का दामन छोड़ दूसरी पार्टियों में शामिल हो चुके हैं। आजाद से दो दिन पहले पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने भी पार्टी छोड़ी है। कई ऐसे भी हैं, जो पार्टी के बड़े पदों पर नहीं बैठना चाहते हैं। इनमें आनंद शर्मा जैसे नेता शामिल हैं। उन्हें पिछले दिनों हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव संचालन समिति (स्टीयरिंग कमेटी) का अध्यक्ष बनाया गया था, लेकिन उन्होंने इस्तीफा दे दिया। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर कांग्रेस के दिग्गज नेता पार्टी क्यों छोड़ रहे हैं। क्यों कोई बड़ा नेता बड़े पदों को नहीं संभालना चाहता। नेतृत्व को इसका हल ढूंढना होगा। कांग्रेस देश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी है। विरोधी भले ही यह कहे कि कांग्रेस देश से जल्द ही खत्म हो जाएगी, लेकिन यह सिर्फ ख्याली पुलाव है। कांग्रेस की जड़ मजबूत है। उसे कोई खत्म नहीं कर सकता। देश के सभी राज्यों में गांव-गांव तक उसका प्रभाव है। हाल-फिलहाल जो स्थितियां बन रही है वह भले ही कांग्रेस के अनुकूल न हो लेकिन देर-सबेर वह फिर मजबूत होकर उभरेगी। हालांकि यह इतना आसान भी नहीं है। इसके लिए कड़ी मेहनत की जरूरत है। फिलहाल आजाद के इस्तीफे के साथ ही कांग्रेस के लिए कई चुनौतियां सामने खड़ी हो गई है। इसमें बड़ी चुनौती नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए होने वाली है। कांग्रेस के ही कई वरिष्ठ नेता इस बात को स्वीकार करते हैं कि पार्टी में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि पार्टी का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष अंदरूनी कलह को दूर करेगा या संगठन को आने वाले चुनावों के लिए मजबूत करेगा। वैसे, आजाद के जाने से पार्टी को कितना फर्क पड़ेगा यह तो भविष्य में पता चलेगा। लेकिन उनके अपने जी-23 के कई नेता भी इस फैसले से खुश नहीं है। संदीप दीक्षित ने उन्हें पत्र लिखकर कहा है कि हमने पार्टी के अंदर सुधार का बैनर उठाया था, विद्रोह का नहीं। कांग्रेस प्रवक्ता ने तो प्रधानमंत्री के साथ नजदीकियां गिनाकर उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया है। जयराम रमेश ने कहा कि पहले संसद में मोदी के आंसू, फिर पद्मभूषण फिर मकान का एक्सटेंशन यह संयोग नहीं सहयोग है। अब यह जनता तय करेगी कि आजाद के फैसले उनके अपने हैं या फिर ‘सहयोग’ के बदले की मजबूरी। वैसे आजाद का कांग्रेस से जाना कांग्रेस के लिए भी अच्छा है। चूंकि पार्टी के अंदर रहकर पार्टी विरोधी काम करना ज्यादा घातक होता है। ऐसे में कांग्रेस को इसके लिए अफसोस नहीं करना चाहिए। बता दें कि अर्जुन सिंह, नारायण दत्त तिवारी, प्रणव मुखर्जी, माधवराव सिंधिया, पी. चिदंबरम, शरद पवार, ममता बेनर्जी, विद्याचरण शुक्ल और अजीत जोगी जैसे कई बड़े-बड़े नेता कांग्रेस छोड़कर गए, लेकिन कांग्रेस की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा। ऐसे में कांग्रेस अफसोस करने की बजाए उस वजह की तलाश करे जिसके चलते पार्टी में ऐसी स्थितियां निर्मित हो रही है। बहरहाल, पार्टी इस वक्त कई झंझावतों से जूझ रही है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व और वरिष्ठ नेताओं के बीच तालमेल के साथ संयुक्त मोर्चा बनाने की जरूरत है, ताकि अंदरूनी और बाहरी मुश्किलों का सामना किया जा सके।
