सरकार बनाने के दावे से कदम दर कदम दूर खिसकती कांग्रेस

0अरुण पटेल
ज्योतिरादित्य सिंधिया की अगुवाई में 22 कांग्रेस विधायकों के पार्टी और विधानसभा से  त्यागपत्र देने के कारण अल्पमत में आई कमलनाथ सरकार की विदाई बेला में प्रदेश कांग्रेस के ट्विटर हैंडल से ट्वीट करते हुए यह दावा किया गया था कि 15 अगस्त को भोपाल के लाल परेड ग्राउंड पर राष्ट्रीय ध्वज कमलनाथ ही फहराएंगे। कांग्रेस को यह भरोसा था कि उपचुनाव में दल बदलुओं को प्रदेश की जनता नकार देगी और फिर से उसकी सरकार बन जाएगी। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ की आंखों में भी यही सपना था कि फिर से एक बार उन्हें सरकार की कमान मिलेगी। उनके इस सतरंगी सपने को पहले तो कोरोना महामारी का  ग्रहण लग गया और विधानसभा के उपचुनाव हुए नहीं और कब होंगे यह भी साफ नहीं।
अब एक के बाद एक यानी कांग्रेस के 2 विधायकों ने विधानसभा से त्यागपत्र देकर भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। यह सिलसिला और कितने दिन चलेगा यह भी निश्‍चित तौर से नहीं कहा जा सकता किंतु ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि कांग्रेस के चार और विधायक भाजपा की सदस्यता ले सकते हैं। पूर्व कांग्रेसी और अब भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री बने ऐंदल सिंह कंसाना का दावा था कि कांग्रेस के लगभग 10 विधायक और त्यागपत्र देंगे। कितने विधायक उसका साथ छोड़ेंगे यह निश्‍चित तौर पर नहीं कहा जा सकता लेकिन कुछ के और पाला बदलने की संभावना है। जितने और विधायक पाला बदलेंगे उतने ही कदम प्रदेश की सत्ता से कांग्रेस दूर होती जाएगी। वैसे पहले भी कांग्रेस का दोबारा सत्ता में आना आसान नहीं था, लेकिनआस पर ही आसमान टिका है और राजनीति में हमेशा चमत्कारों की गुंजाइश रहती है शायद इसी भरोसे कांग्रेस भी इस उम्मीद में है कि उसकी सरकार फिर बनेगी। वैसे सपने देखने का सबको अधिकार है। कमलनाथ के सपने को पूरा होने में अधिक बाधक उनके ही संगी-साथी बने। कांग्रेस की पीठ यदि लहूलुहान हुई है तो उसे यह घाव उसके अपनों ने दिए। जैसे-जैसे कुछ और कांग्रेस विधायक भाजपा के पाले में जायेंगे वैसे-वैसे कांग्रेसी सपना दिवास्वप्न बनता जाएगा।
प्रद्युम्न सिंह लोधी और सुमित्रा देवी कास्डेकर के पार्टी छोड़ने के बाद कमलनाथ अब डैमेज कंट्रोल में लग गए हैं। रविवार को शाम को उन्होंने कांग्रेस विधायक दल की बैठक बुलाकर विधायकों के मनोभाव समझने की कोशिश की। कितना समझ पाए कितना समझने की कोशिश की यह इस बात से ही पता चलेगा कि एक के बाद एक विधायकों के पाला बदलने का सिलसिला थमता है या नहीं। जैसे-जैसे विधायक कांग्रेस छोड़ रहे हैं वैसे वैसे पार्टी के भीतर यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या यह सभी केवल नेतृत्व की उपेक्षा के कारण दल बदल रहे हैं या फिर विधायकों के बीच कोई ऐसा मनोविज्ञान घर कर गया है कि पार्टी में उन्हें अपना भविष्य नजर नहीं आ रहा। एक सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि क्या सत्ता में आने के 19 माह के भीतर पार्टी अंदर ही अंदर बिखरने लगी है।  कांग्रेस आलाकमान ने प्रदेश के आला नेताओं से कह दिया है कि जिसकी सिफारिश पर टिकट मिले हैं वह अपने समर्थकों को संभाले। कांग्रेस हमेशा गुटों  में बटी रही है और यही उसकी ताकत भी है तो कमजोरी भी। किसके कितने समर्थक हैं उसको लेकर केवल अनुमान लगाए जा सकते हैं क्योंकि कुछ विधायक एक से अधिक नेता के विश्‍वास पात्र हैं, फिर भी माना जाता है कि जिन 24 विधायकों ने अब तक कांग्रेस का दामन छोड़ा है उनमें सर्वाधिक 19 सिंधिया समर्थक हैं,  वह खुद भाजपा में चले गए । पार्टी छोड़ने वाले बिसाहूलाल सिंह और ऐंदल सिंह कंसाना पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह तथा हरदीप सिंह डंग कांग्रेस नेत्री मीनाक्षी नटराजन और सुमित्रा कास्डेकर पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव की समर्थक रही हैं। सुरेश पचौरी और अजय सिंह की सिफारिश पर जिन्हें टिकट मिली उनमें से अभी किसी ने भी दल नहीं बदला है।
प्रदुम्न सिंह लोधी  को कमलनाथ ने टिकिट दिलाई थी। कांग्रेस की समस्या यह है कि उसके पास फिलहाल ऐसी कोई टीम नजर नहीं आ रही जो दल बदलने वाले विधायकों को रोक सके क्या भाजपा में सेंधमारी कर सके। गृहमंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा जैसा फिलहाल तो कोई पूर्व मंत्री कांग्रेस में नजर नहीं आता जो अपने विधायकों को थाम कर रख सके और भाजपा में सेंध लगा पाए। इसके अलावा सहकारिता मंत्री अरविंद सिंह भदौरिया और चिकित्सा शिक्षा मंत्री विश्‍वास सारंग जैसा भी फ्रंट फुट पर आकर खेलने वाला पूर्व मंत्री या विधायक ऐसा नहीं है जो अपनों को साध सके तथा सामने वाले कैंप में सेंध लगा सके। पहले कांग्रेस को इस प्रकार के लोगों की पहचान कर उन्हें मोर्चे पर लगाना होगा। अभी जिन दो विधायकों ने पाला बदला है उसमें भदौरिया व सारंग की अहम भूमिका थी। भाजपा की नजर कांग्रेस की जिन कमजोर कड़ियों पर है उनमें पहली बार के निर्वाचित विधायक और दलित तथा आदिवासी विधायक अधिक हैं। भाजपा की रणनीति प्रदेश में कांग्रेस को अनाथ करने की है और देखने वाली बात यही होगी कि नाथ की अगुवाई होते हुए वह कांग्रेस को अनाथ कर पाती है या नहीं।
और अंत में ………..!
विधानसभा उपचुनाव के मूड में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही हैं और एक दूसरे पर मनोवैज्ञानिक बढ़त पाने के उद्देश्य से दलबदल का तड़का पहले लगाया जाता था तो अब दलबदल की ही डिश तैयार हो रही है। कांग्रेस को भरोसा है कि दलबदल की डिस को प्रदेश के जागरूक मतदाता नकार देंगे। विधायकों के इस्तीफे पर कमलनाथ की अजीबोगरीब प्रतिक्रिया थी कि जिनको जाना है वह चला जाए मुझे पहले ही पता था कि दो विधायक जाने वाले हैं। अब तो बस बोली लगाओ और राजनीति करो। इनसे कांग्रेस नहीं जनता निपटेगी। जनता को भाजपा क्या मूर्ख समझती है?  भाजपा विधायकों को तोड़ रही है तो कांग्रेस की नजर भी भाजपा में सेंधमारी करने की है। वह कुछ  बड़े भाजपा नेताओं पर डोरे डाल रही है खासकर उन लोगों पर जो सिंधिया समर्थकों से चुनाव हारे हैं या टिकट से वंचित हो गए थे। भाजपा के जिन नेताओं पर कांग्रेस की नजर है उनमें  ग्वालियर के जयसिंह कुशवाहा, दीपक जोशी, पारुल साहू, मंजू दादू, कन्हैया लाल अग्रवाल आदि लगभग एक दर्जन से अधिक नेता शामिल है। अब यह तो समय ही बताएगा कि कौन-कौन कांग्रेस में  शामिल होते हैं। देखने वाली बात यही होगी कि कांग्रेस में जो आएंगे उनमें से कितने फ्यूज बल्व होंगे और कितने उसके आशियाने को जगमागा देने वाले ।

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