0 संजीव वर्मा
वाह-वाह राम जी, जोड़ी क्या बनाई।
मोदी और शाह को, बधाई हो बधाई।
सब रस्मों से बड़ी है,सत्ता की मलाई।।
जी हॉ। फिल्म ‘हम आपके है कौन’ के गाने का यह रीमिक्स इन दिनों मोदी-शाह की जोड़ी पर खूब जम रहा है। एक बार फिर इस जोड़ी ने एक और राज्य पर फतह हासिल कर ली है। गोवा से शुरू हुई उनकी यात्रा बदस्तूर जारी है। यह कब और कहाँ थमेगी कहा नहीं जा सकता? फिलहाल यह जोड़ी महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य को फतह करने की खुशियाँ मना रही है और मनाए भी क्यों नहीं। उन्होंने वह कारनामा कर दिखाया है, जो किसी ने नहीं किया। लेकिन इस कारनामे को अंजाम तक पहुंचाने वाले उनकी अपनी पार्टी भाजपा के कद्दावर नेता देवेन्द्र फडणवीस बुझे-बुझे से नजर आ रहे हैं। उनके हाव-भाव सब कुछ बयां कर रहा है। दरअसल, पिछले ढाई साल से उन्होंने उद्धव सरकार को ‘निपटाने’ के लिए क्या-क्या नहीं किया। एक सप्ताह तक चली फिल्म उन्हीं की लिखी गई पटकथा पर चल रही थी। लेकिन इस कथित फिल्म का अंत उनके लिए सुखद नहीं रहा और एकनाथ महाराष्ट्र के ‘नाथ’ साबित हुए। फडणवीस को मन मसोस कर चुपचाप उप-मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी। हालांकि राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि यह देवेन्द्र फडणवीस की योजना का हिस्सा है। वे ‘सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे’ की तर्ज पर काम कर रहे हैं। वे यह दांव चलकर उद्धव ठाकरे से 2019 के धोखे का बदला ले लिया। 2019 में भाजपा और शिवसेना ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। उन्हें बहुमत भी मिला। लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर दोनों आपस में लड़ पड़े और शिवसेना ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बना ली। फडणवीस ने एनसीपी के अजित पवार को तोड़कर मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ली, लेकिन बहुमत साबित नहीं कर पाने की वजह से उन्हें 24 घंटे में ही कुर्सी से उतरना पड़ा। अब फडणवीस ठाकरे का तख्ता पलट करने अपना हिसाब चुकता कर लिया। लेकिन इस तख्ता पलट के बाद फडणवीस को मुख्यमंत्री नहीं बनाकर भाजपा ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह सत्ता के लालच में उद्धव की सरकार नहीं गिराई है, बल्कि कथित तौर पर हिन्दुत्व के एजेंडे से हट चुके उद्धव गुट को हटाकर बाला साहेब ठाकरे के नक्शे कदम पर चलने वाली शिवसेना को सत्ता में आने में मदद की है। माना जा रहा है कि अगले चुनाव में भाजपा को इसका लाभ मिलेगा। लेकिन यह भी सच है कि आम जनता समय के साथ सब कुछ भुला देती है और तत्कालीन मुद्दों पर अपना मत देती है। खैर, महाराष्ट्र की राजनीति में जो भी घटनाक्रम हुआ उसके अपने मायने हैं। शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे भी इसके लिए दोषी है। वह अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बच सकते। उन्होंने अपनी ढाई साल पुरानी सरकार खोई, मंत्री खोए और यहां तक कि विधायक खोए, जो शिवसेना के इतिहास की सबसे बड़ी घटना कहीं जा सकती है। शिवसेना में पहले भी बगावत हुए हैं। लेकिन अभी जो हुआ उसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। बाला साहेब के जमाने में उनके सामने सबकी घिग्घी बंध जाती थी। लेकिन उद्धव के सामने उनके अपने मुंह खोलने लग गए थे। उसके पीछे उद्धव के साफ्ट हिन्दुत्व को सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है। वहीं,उद्धव अपने राजनीतिक फैसलों के लिए शरद पवार को गुरू के रूप में देखने लगे थे। सभी जानते हैं कि शरद पवार और बाला साहेब ठाकरे में गाढ़ी दोस्ती थी। मगर बाला साहेब की प्रवृत्ति शरद पवार से अलग थी और उनकी अपनी बुद्धि भी थी। उद्धव ने 2019 में भाजपा के बजाए एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई। लेकिन एक बात वह समझ नहीं पाए कि शिवसेना का चाल, चरित्र और चेहरा तीनों हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद की विचारधारा से आता है और यही उनके लिए सबसे बड़ी भूल साबित हुई और उनके अपने भाजपा के जाल में फंसते चले गए। भाजपा ‘हिन्दुत्व’ के मुद्दे पर शिवसेना के विधायकों को इतना उकसाया कि अपने ही नेता के खिलाफ हो गए। वैसे, राज्यसभा और विधान परिषद के चुनाव में क्रॉस वोटिंग से ही उद्धव को सजग हो जाना चाहिए था। मान लेना चाहिए था कि पार्टी में सेंध लग गई है। यह जो फूट पड़ी है यह कतई अचानक नहीं है। एक बात और समझनी चाहिए कि एकनाथ शिंदे ने जिस सियासी हथियार को इस्तेमाल किया वह हिन्दुत्व शिवसेना की ही मूल विचारधारा थी। भाजपा शिंदे का सहारा बनी और अपने मकसद में कामयाबी हो गई। अब लोग चाहे जितना चींखे, चिल्लाएं और लोकतंत्र की दुहाई दें, लेकिन भाजपा को जो चाहिए था वह मिल गया। एक मोर्चा तो भाजपा के सहारे एकनाथ शिंदे ने जीत लिया पर आखिरकार शिवसेना किसकी होगी यह मोर्चा कौन जीता है यह देखने वाली बात होगी ।
