भाटापारा। श्री 1008 भगवान आदिनाथ नवग्रह पंचबालयति दिगंबर जैन मंदिर में दस लक्षण पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है पर्युषण पर्व का पांचवा दिन उत्तम सत्य धर्म है । प्रातः 7:00 बजे मंगलाष्टक से पूजा प्रारंभ की गई ।सर्वप्रथम श्री 1008 भगवान पुष्पदंत नाथ जी की प्रतिमा को मस्तक पर विराजमान कर अभिषेक मोदी ने पंडुक शिला पर विराजमान किया और सभी भक्तों ने प्रभु के भजन पर खूब भक्ति करी। आज देवाधिदेव 1008 श्री पुष्पदंतनाथ भगवान का निर्वाण कल्याणक का शुभ मंगल दिवस है। आज सम्मेद शिखर जी, मधुबन झारखंड के पर्वतों से सुप्रभ कूट से श्री पुष्पदंत भगवान जी मोक्ष निर्वाण को प्राप्त किया था। आज भाद्रपद शुक्ल अष्टमी के पावन दिवस पर 11 किलो का निर्वाण लाडू चढ़ाया गया ।सभी भक्तो ने निर्वाण लाडू चढ़ाकर बहुत भक्ति की ।
आज की शांति धारा का सौभाग्य श्री अभिषेक मोदी एवं श्री सचिन गदिया को प्राप्त हुआ। शांति धारा के पश्चात भगवान की मंगलमय आरती की गई , आरती में सभी भक्त, माता बहनों ने धूमधाम से प्रभु की भक्ति संपन्न करी ।आज आरती के पश्चात श्री देव शास्त्र गुरु पूजा, समुच्चय पूजा, भगवान पुष्पदंत जी की पूजन ,
दसलक्षण पर्व की पूजन, सोलहकारण, पंचमेरू, आचार्य विद्यासागर जी, राष्ट्रसंत मुनि श्री 108 चिन्मय सागर जी महाराज “जंगल वाले बाबा” की पूजा संपन्न हुई ।
आज अभिषेक मोदी ने शास्त्र वाचन में कहा कि धर्म का पांचवा लक्षण हैं उत्तम सत्य धर्म , जब अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ और दर्शन मोह का अभाव हो जाता है ,तब उत्तम सत्य अर्थात सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है ।
लोग वेद उपनिषद में सत्य को ढूंढते हैं, पर सत्य तो अपने अंदर ही है ।
सत्य जिसे प्राप्त हो जाता है ,वह चुप हो जाता है।
वह संसार में रहकर भी उस से विरक्त हो जाता है।
सत्य तो हमारी आत्मा का स्वभाव है, आत्मानुभूति ,है जिसे हम पर पदार्थों में ढूंढ रहे हैं, इसलिए आज तक हमें यह सत्य प्राप्त नहीं हुआ है। मोह रूपी जो मीठा जहर है वह किसी को नहीं छोड़ता, कितने महापुरुष भी इस मोह रूपी बंधन में रहे ,जब उन्हें ज्ञान हुआ तब उन्हें आत्म तत्व की प्राप्ति हुई।
बारह भावनाओं में लिखा है कि
” आप अकेला अवतरे, मरे अकेला होय, यू कब तो इस जीव को साथी सगा न कोय”
आप अकेले उत्पन्न हुए हैं और अकेले ही संसार को छोड़ेंगे यदि आत्म कल्याण करना है तो वह भी अकेले ही करना होगा । आपके कर्मों का फल आपको ही भोगना है आपके कुटुम्बीजनों को नहीं, जिससे यह सत्य समझ में आ जाएगा उसे वैराग्य उत्पन्न हो जाएगा। जिस व्यक्ति को अपने अज्ञान जनित भूल का पता चल गया, समझो वह संभल गया – किसी ने सफेद बाल देखकर, किसी ने मुर्दे की अर्थी देखकर, किसी ने वृद्ध को देखकर, वैराग्य धारण कर लिया ।
शरीर और आत्मा को एक मानना सबसे बड़ा असत्य है ।और यही संसार भ्रमण व दुख का मूल कारण है। पर मोह के कारण यह संसारी प्राणी अपनी चैतन्य आत्मा को नहीं पहचानता और इस पुद्गल शरीर को ही मैं मानता है।
ल इसी कारण उसका वर्तमान और भविष्य का जीवन भी दुखी रहता है। सिद्धत्व को प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम मोह कर्म को जीतना है ,शेष कर्म अपने आप थोड़े समय में क्षय हो जाते हैं ।
आचार्य श्री कहते हैं कि जैसे जल में कमल जल से सर्वथा भिन्न रहता है उसी प्रकार आत्मा भी स्वभाव से शरीर से भिन्न रहती हुई भी शरीर में रहती है।
आत्मा को सही-सही पहचानना ही परम सत्य है
मुनिश्री 108 चिन्मय सागर जी महाराज’ जंगल वाले बाबा’ ने अपने प्रवचन में कहा था कि जैसा सुना, जैसा देखा, जैसा कह देना लौकिक सत्य हो सकता है ,पर यहां उत्तम सत्य की बात है। स्व-पर हितकारी, परिमित तथा मिष्ठ वचन ही सत्य हैं और दूसरों का अहित करने वाले सभी वचन असत्य हैं,। भले ही वह सच क्यों ना बोल रहा हो। आचार्य ने कहा है यदि झूठ भी प्रिय है, तो मत बोलो और सच भी अप्रिय है, तो मत बोलो । दुनिया में सबसे ज्यादा झगड़ा सिर्फ और सिर्फ जिह्वा अर्थात आपके बोलने से होता है जिसका उदाहरण महाभारत है।
कहा गया है कि प्राणी रक्षा के लिए कहा गया असत्य भी सत्य के बराबर होता है।सत्य हमेशा अपना और पर का भला करने वाला हो। अनावश्यक कड़वा न हो अथवा हित मित प्रिय हो। अगर आपको लगे सत्य बोलने से मामला बिगड़ जाएगा, हिंसा हो जाएगी, तो चुप हो जाओ।
मुख्य रूप से व्यक्ति 3 कारणों से झूठ बोलता है
पहला स्नेह
दूसरा लोभ
और तीसरा भय के कारण
इतिहास में कई उदाहरण उपरोक्त लिखित बातों को प्रमाणित करते हैं। अतः सत्यवादी को स्नेह , लोभ और भय जन्य स्थिति में बड़ी दृढ़ता के साथ अपना धर्म का पालन करना चाहिए। बोली हुई बातें कभी वापस नहीं आती अतः बोलने से पहले विचार कर लो जिससे उस पर पुनर्विचार नहीं करना पड़े। जैन दर्शन का प्रमुख सिद्धांत है कर्मवाद जो कहता है किसी का बुरा सोचना नहीं और किसी का बुरा करना नहीं। दूसरों के लिए बुरा सोचने और करने वाला स्वयं ही उस गड्ढे में गिर पड़ता है ।
गुरुदेव कहते हैं कि मनुष्य जन्म बड़ा दुर्लभ है, इस जन्म को हमने गँवा दिया तो समझो हमने कौवे को भगाने के लिए मणि फेंक दिया, पाद प्रक्षालन के लिए अमृत नष्ट कर दिया और लकड़ी धोने के लिए हाथी का दुरुपयोग किया।
इस जन्म में हमें रत्नत्रय की प्राप्ति में लगना चाहिए, इसी में हमारा कल्याण है ।।अतः कभी असत्य नहीं बोलना चाहिए और ना ही असत्य का पक्ष लेना चाहिए यदि हम महान बनना चाहते हैं तो सदा प्रमाणिक व प्रिय वचन ही बोलना चाहिए ।
आज के कार्यक्रम में नवीन कुमार नितिन कुमार सचिन कुमार अंजू भावना पंकज गदिया आदि शामिल थे ।साथ ही साथ श्रीमती सुमन लता मोदी रजनी मोदी नेहा मोदी सुरभि अंशु, सुमन मोदी भी उपस्थित थे। श्री प्रकाश आलोक अनिल अभिषेक अभिनव अभिनंदन अक्षत अरिंजय आरनव आदि, संजय शील चंद जैन सुभाष सिंघाई शोभा लाल जैन कल्पना सिंघाई ,चंदा देवी जैन, लाला जैन, रवि जैन इत्यादि उपस्थित थे।
दुनिया में सबसे ज्यादा झगड़ा जिह्वा अर्थात बोलने से होता है: अभिषेक मोदी
