0 दिवंगत मोतीलाल वोरा ने ही शहर में रखी थी गांधीजी की स्मृतियों को संजोने वाली नींव
राजनांदगांव/ डोंगरगढ़ में पहाड़ी पर विराजित विश्व प्रसिद्ध मां बम्लेश्वरी के दरबार तक भक्तों की पहुंच आसान बनाने वाला उड़नखटोला (रोप-वे) मोतीलाल वोरा की ही देन है। उन्होंने विरोधियों ही नहीं, अपने दोस्तों के भी विरोध को दरकिनार कर जिस से इसका रास्ता आसान किया। अर्जुन सिंह केबिनेट में मंत्री रहते (वर्ष 1984) में राजगामी संपदा न्यास से रोप-वे के लिए इस शर्त पर दो लाख रुपए का ऋण दिलाया था कि बाद में यह राशि ट्रस्ट द्वारा राजगामी न्यास को वापस कर दी जाएगी। इस महत्वपूर्ण आर्थिक मदद से कारण रोप-वे शुरू हो पाया। उनके निधन पर जिले के जनप्रतिनिधियों व बुद्धिजीवियों ने संवेदना व्यक्त की है। उन्होंने उनके निधन को देश के लिए बड़ी क्षति बताई है।
अविभाजित मध्यप्रदेश विधानसभा में वोरा 1980 में दूसरी बार विधायक चुने गए थे। तब मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने उन्हें मंत्री बनाया। इसी बीच उनका डोंगरगढ़ दौरा बना। बुद्धिजीवियों की तरफ से मांग आई कि मां बम्लेश्वरी के ऊपर वाले मंदिर तक भक्तों की पहुंच आसान बनाने के लिए रोप-वे बेहद जरूरी है। लेकिन उसमें खर्च होने वाली बड़ी रकम ने तो बम्लेश्वरी ट्रस्ट के पास थी न शासन स्तर पर ऐसा कोई फंड मिल पा रहा था। वोरा ने बीच का रास्ता निकाला व राजा की संपत्ति की देखरेख करने वाली धनाड्य संस्था राजगामी संपदा न्यास से मदद लेने की योजना बनाई। लेकिन उस समय के कद्दावर समाजवादी नेता व विधायक जेपीएल फ्रांसीस इस बात पर अड़ गए कि राजगामी का पैसा दूसरी जगह खर्च न की जाए। चुंकि फ्रांसीस व वोरा गहरे दोस्त थे। वोरा ने उन्हें मना लिया।
यात्रियों से मदद लेकर मंगवाई गांधी प्रतिमा
युवावस्था के दौरान वोरा राजनांदगांव रोडवेज नाम की बस संचालन करने वाली साझीदार कंपनी में प्रमुख साझेदार हुआ करते थे। तब वे टिकट काटते थे। बाकी साझेदार नसीरूद्दीन सोलंकी व अमर सिंह गरचा बाकी काम संभालते थे। गांधी को आदर्श मानने वाली वोरा के इन साझेदार साथियों की टीम ने करीब 1965 में गांधी प्रतिमा की स्थापना की योजना बनाई। इसके लिए राशि जुटाने का जिम्मा वोरा ने खुद उठाया। उन्होंने समाजसेवियों के साथ सक्षम बस यात्रियों से भी पांच पैसे से लेकर पांच-दस रुपए तक का चंदा वसूला। इसी के बूते पुराने बस् स्टैंड में अष्टधातु की आदमकद प्रतिमा स्थापित की जा सकी।
वाचनालय बनाया, डिपो की सौगात भी दी
बस संचालन से जुड़े होने के कारण वोरा के युवावस्था के कुछ अहम साल बस स्टैंड में ही बीता। इस कारण उनका इस क्षेत्र से विशेष लगाव रहा। गांधी प्रतिमा के बाद उन्होंने गांधी सांस्कृतिक समिति बनाई। जनसहयोग से बस स्टैंड पर ही एक वाचनालय के लिए भवन बनाया। उसे भी गांधी के नाम पर रखा। यह जिले का पहला वाचनालय था। बाद में जब वे राजनीतिक में आए व पारवफुल हुए तो पुरानी गंज मंडी परिसर से लगी खाली जमीन पर राज्य परिवहन निगम का डिपो खुलावाया।
हमेशा आत्मविश्वास से भरा शख्स
युवावस्था के दौरान उनकी कार्यशैली से प्रभावित होने वाले मोहन अग्रहरि (वरिष्ठ साहित्यकार) वोरा से जुड़ गए। उन्होंने पत्रकारिता उनके साथ रहकर सीखी। बाद में जब वोरा राजनीतिक में चले गए, तब भी अग्रहरि उनसे जुड़े रहे। हाल के दिनों में वे स्वास्थ्य को लेकर उनसे नियमित संपर्क में रहे। अग्रहिर ने बताया कि वोरा हमेशा आत्मविश्वास से भरे होते थे। वे अपना फैसला कभी नहीं बदलते। इतना ही नहीं जो कहते या ठान लेते, जरूर करते। उन्होंने वोरा से जुड़ी कई अविस्मरणीय कहानियां व किस्से सुनाते हुए कहा कि राजनांदगांव में उनके योगदानों को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।
