भाटापारा से संतोष अग्रवाल की रिपोर्ट
भाटापारा । सुआ नाचा की परंपरा शहरों से गांव तक अब निरंतर कम होती चली जा रही है। पहले दशहरा पर्व के बाद से ही घरों में सुबह नर्तक दलों की दस्तक शुरू हो जाया करती थी, जो अब बहुत ही कम दिखाई पड़ती है। या यूं कहें कि नहीं के बराबर ही दिखाई पड़ती है। पहले सुआ नृत्य करने आने वाले समूहों का स्वागत घर वाले दुकानदार लोग भी खुशी खुशी किया करते थे,किंतु अब यह परंपरा भी धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। यह परंपरा छत्तीसगढ़ एक महत्वपूर्ण परंपरा रही है। ऐसे तो सुआ नृत्य का प्रारंभ दशहरे के बाद से हो जाता है जो दीपावली तक और उसके बाद भी चलता रहता है। किंतु इस बार यह दिखाई नहीं दे रहा है। जबकि दशहरे को बीते लगभग 10 दिन होने को है। प्रदेश की पहचान छत्तीसगढ़ी पारंपरिक व सांस्कृतिक सुआ नृत्य गीत की परंपरा जबरदस्त रही है। इसे लोग बड़े सम्मान के साथ देखा करते थे, हालांकि पुरानी परंपरा और सभ्यता के अनुसार बड़ों की जगह बच्चों को सुआ नृत्य के लिए घर-घर, दुकान-दुकान में घूमते देखा जाता है। अब बड़ी महिलाओं का समूह बहुत ही कम दिखाई पड़ता है। शहरों में इसकी संख्या निरंतर घटती चली जा रही है, किंतु गांव में यह परंपरा अभी भी चल रही है। हालांकि गांव में भी पहले की तुलना में इसमें कमी आ गई है। यही कारण है कि नगर एवं गांव में लगभग सभी स्थानों पर अब सुआ नृत्य गीत को लेकर लोग इतने उत्साहित नहीं हैं, जितने पहले के लोग हुआ करते थे। एक प्रकार से देखा जाए तो सुबह नृत्य के लिए बच्चों में रुचि साल दर साल कम होती ही जा रही है। छत्तीसगढ़ की पारंपरिक सुआ नृत्य को जीवित रखने व परंपरा का निर्वहन करने टोकरी में तोता और उसके चारों और नृत्य करती महिलाएं और छोटी-छोटी कन्याओं का नजारा दिवाली के नजदीक आने पर ही देखा जा सकता है। फिलहाल अभी ऐसा कोई नजारा दिखाई नहीं पड़ रहा है। दीपावली आगमन का संदेश सुआ गीत व नृत्य से ही होने लगता है। बच्चों की एक टोली ने बताया कि अब इस परंपरा को शहर में महत्व नहीं मिलता है। कई बार सुआ नृत्य करने के बाद शगुन देने में भी लोग कतराने लगते हैं, जिससे हम लोगों को अच्छा नहीं लगता है। इसलिए इस परंपरा में कमी आती जा रही है। देश की इस परंपरा को बनाए रखने के लिए हम लोग प्रतिवर्ष नृत्य-गान करते आ रहे हैं।
