जहां कभी नक्सल का साया था, वहां अब किताबों की रोशनी; बीजापुर में 53 बच्चे गढ़ रहे नई राह

*शिक्षक दिवस पर विशेष: बस्तर के दुर्गम गांवों में सरकारी शिक्षक बच्चों की प्रतिभा को दे रहे दिशा, छह स्कूलों के विद्यार्थी नवोदय की तैयारी में जुटे*

बीजापुर। बस्तर के दुर्गम गांवों में स्कूल की घंटी बजने से पहले ही बच्चों की पढ़ाई शुरू हो जाती है। किताबें और कॉपियां लेकर पहुंचने वाले इन विद्यार्थियों के चेहरे पर एक ही उत्सुकता है—आगे पढ़ना और अपनी पसंद की मंजिल तक पहुंचना। बीजापुर के एक सरकारी स्कूल में लगने वाली इस अतिरिक्त कक्षा में छह स्कूलों के करीब 53 बच्चे शामिल हो रहे हैं।

कक्षा पांच में पढ़ने वाला एक बच्चा कहता है, “मैं यहां नवोदय की तैयारी करता हूं। मैं आगे भी खूब पढ़ना चाहता हूं और कुछ बनना चाहता हूं।” उसके लिए नवोदय सिर्फ एक परीक्षा नहीं, बल्कि बेहतर पढ़ाई की ओर बढ़ने का एक मौका है। एक अन्य बच्चा कहता है, “मैं यहां पढ़कर आगे बढ़ना चाहता हूं। मैं बड़ा होकर शिक्षक बनना चाहता हूं।”

इन बच्चों की बातें बताती हैं कि बस्तर के गांवों में सपनों की कोई कमी नहीं है। उन्हें जरूरत है तो ऐसे अवसर की, जहां वे अपनी क्षमता को पहचान सकें और उसे आगे ले जा सकें।

बच्चों की इसी रुचि को देखते हुए सहायक शिक्षक गजेंद्र प्रधान और शिक्षक प्रीतम कुमार बैगा ने स्कूल के नियमित समय से पहले अतिरिक्त कक्षा शुरू की। यहां नवोदय विद्यालय की प्रवेश परीक्षा की तैयारी के साथ बच्चों की बुनियादी समझ और पढ़ाई को मजबूत करने पर ध्यान दिया जाता है। इसके लिए बच्चों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता। शिक्षक अपने नियमित कार्य के अतिरिक्त समय देकर यह कक्षा संचालित करते हैं।

पिछले करीब दो वर्षों में यह पहल छह स्कूलों के विद्यार्थियों तक पहुंची है। दूरदराज के गांवों से बच्चे यहां आते हैं और नियमित रूप से तैयारी करते हैं। शिक्षकों का प्रयास है कि ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्र के बच्चों को भी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए वह शैक्षणिक सहयोग मिले, जिसकी सुविधा आमतौर पर बड़े शहरों में आसानी से उपलब्ध होती है।

क्लस्टर समन्वयक सत्यजीत राणा बताते हैं कि यहां आने पर उन्होंने बच्चों में पढ़ाई को लेकर गहरी रुचि देखी। शिक्षक पहले से ही अपने समय का उपयोग विद्यार्थियों को तैयार करने में कर रहे थे। बच्चों की लगन और शिक्षकों की मेहनत को देखते हुए इस प्रयास को जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

इस पहल का महत्व केवल नवोदय प्रवेश परीक्षा तक सीमित नहीं है। यह बच्चों को अपनी क्षमताओं पर भरोसा करने और आगे की शिक्षा के विकल्पों के बारे में सोचने का अवसर दे रही है। आज जो बच्चा शिक्षक बनने की बात कर रहा है, वह कल अपने ही गांव के दूसरे बच्चों को पढ़ाने वाला शिक्षक बन सकता है। कोई उच्च शिक्षा लेकर स्वास्थ्य, विज्ञान, तकनीक, प्रशासन या दूसरे क्षेत्रों में जा सकता है।

बस्तर जैसे आदिवासी और लंबे समय तक नक्सल हिंसा से प्रभावित क्षेत्र में शिक्षा के जरिए बन रही यह तस्वीर महत्वपूर्ण है। यहां बदलाव का अर्थ केवल बेहतर सुविधाएं नहीं, बल्कि बच्चों की सोच में पैदा हो रही नई आकांक्षाएं भी हैं। स्कूल की एक अतिरिक्त कक्षा उन्हें यह एहसास करा रही है कि उनकी राह उनके गांव तक सीमित नहीं है।

देश की विकास यात्रा में ऐसी प्रतिभाओं को आगे लाना जरूरी है। भारत को विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन और कौशल के हर क्षेत्र में नई प्रतिभाओं की जरूरत है। बस्तर के ये बच्चे भी अवसर मिलने पर इस यात्रा का हिस्सा बन सकते हैं और आगे चलकर अपने क्षेत्र के विकास में योगदान दे सकते हैं। शिक्षक दिवस पर बीजापुर की यह पहल इसी भरोसे की तस्वीर है।