मौसम बड़ा बेईमान है..!

पुरानी हिंदी फिल्म “लोफर” का एक मशहूर गीत है- “आज मौसम बड़ा बेईमान है…”। गीतकार ने शायद प्रेमी-प्रेमिका के मनोभावों को व्यक्त करने के लिए यह पंक्ति लिखी होगी, लेकिन आज अगर यह गीत किसी के दिल की बात सबसे सटीक ढंग से कहता है, तो वह किसान है। फर्क सिर्फ इतना है कि उसके लिए यह कोई रोमांटिक गीत नहीं, बल्कि एक कड़वी हकीकत बन गया है। जी हां… प्रदेश में इन दिनों जिस तरह से मौसम की बेरुखी चल रही है उससे किसान चिंतित हैं। मानसून के 9 दिन देर से आने के बाद भी उसकी रफ्तार सुस्त पड़ गई है। यही वजह है कि खरीफ सीजन की शुरुआत अब तक नहीं हो पाई है। अमूमन प्रदेश में धान की बुवाई जून के आखिरी सप्ताह तक शुरू हो जाती है लेकिन इस बार अच्छी बारिश के इंतजार में किसानों की आंखें पथरा गई हैं। चूंकि देश में कृषि आज भी काफी हद तक मानसून पर निर्भर है। ऐसे में जब मानसून रुठ जाता है या अपेक्षा से कम बारिश होती है, तब इसका सबसे बड़ा असर खेती-किसानी पर पड़ता है। धान, सोयाबीन, मक्का, दलहन और तिलहन जैसी खरीफ फसलें वर्षा पर निर्भर रहती हैं। बारिश में देरी होने से बुवाई प्रभावित होती है, बीजों का अंकुरण कमजोर पड़ता है और उत्पादन घटने का खतरा बढ़ जाता है। जिन किसानों के पास सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, वे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। परिणामस्वरूप कृषि लागत बढ़ती है और किसानों की आय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। मानसून की बेरुखी का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता। ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी इससे प्रभावित होती है। कृषि आधारित व्यापार, कृषि मजदूरों का रोजगार, पशुपालन और स्थानीय बाजारों की गतिविधियां धीमी पड़ जाती हैं। उत्पादन घटने पर खाद्यान्नों की कीमतों में वृद्धि की संभावना रहती है, जिससे महंगाई बढ़ सकती है और आम उपभोक्ता भी प्रभावित होता है। किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे पहले ही बीज, खाद और अन्य कृषि आदानों पर खर्च कर चुके होते हैं। यदि बारिश समय पर नहीं होती, तो उनकी लागत और जोखिम दोनों बढ़ जाते हैं।विशेष चिंता उन छोटे और सीमांत किसानों को लेकर है, जिनके पास सिंचाई के पर्याप्त साधन नहीं हैं। ऐसे किसान मानसून की अनिश्चितता के सामने लगभग असहाय हो जाते हैं। ऐसे समय में सरकारों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। किसानों को मौसम आधारित सलाह, गुणवत्तापूर्ण बीज, फसल बीमा और सिंचाई सुविधाओं का लाभ समय पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए। जब तक खेती को मानसून की अनिश्चितताओं से सुरक्षित नहीं किया जाएगा, तब तक किसानों की चिंता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की अस्थिरता बनी रहेगी। बहरहाल, मानसून की देरी ने किसानों को ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है जैसे शादी में बारात आ गई हो, बैंड बज रहा हो, मेहमान खाना खाने बैठ गए हों, लेकिन दूल्हा रास्ते में कहीं फंस गया हो। खेत तैयार हैं, बीज तैयार हैं, किसान तैयार हैं, लेकिन बारिश महोदय का अभी तक कोई निश्चित कार्यक्रम नहीं है। गांवों में इन दिनों सबसे लोकप्रिय सवाल है- “बारिश कब होगी?” इसका जवाब देने वाले भी कम नहीं हैं। मौसम वैज्ञानिक अपने आंकड़े बताते हैं, स्थानीय बुजुर्ग हवा का रुख देखकर भविष्यवाणी करते हैं और सोशल मीडिया के विशेषज्ञ ग्रह-नक्षत्रों का हवाला देते हैं। लेकिन बादल इन सबकी सलाह को नजरअंदाज करते हुए अपनी ही मर्जी से घूम रहे हैं और किसानों को फिर वहीं गीत याद आने लगता है कि…आज मौसम बड़ा बेईमान है….!