ममता की ‘अग्नि परीक्षा’

पश्चिम बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद पार्टी में संकट लगातार गहराता जा रहा है। विधानसभा में 58 विधायकों की बगावत से जूझ रही टीएमसी को अब संसद में भी बड़ा झटका लगा है। एक ओर पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी इंडिया ब्लॉक की बैठक में हिस्सा ले रही थीं, तो दूसरी ओर पार्टी की सांसद काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में टीएमसी के 28 में से 20 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र भेजकर एनडीए का समर्थन करने की बात कही है। बागी सांसदों ने केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर बैठक भी की। यही नहीं, राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने भी राज्यसभा सांसद के पद से इस्तीफा देने के साथ ही पार्टी की प्राथमिक सदस्यता छोड़ने का ऐलान कर दिया। दूसरी ओर टीएमसी ने बागियों के दावे को लेकर 20 मई का वह पत्र जारी किया, जिसमें ममता बनर्जी ने कल्याण बनर्जी को मुख्य सचेतक नियुक्त करने की सूचना लोकसभा अध्यक्ष को दी थी। पार्टी ने 29 मई को रिसिविंग सार्वजनिक की है। साथ ही कहा है कि दल-बदल कानून में अब अलग गुट का प्रावधान नहीं है। इस बीच, काकोली घोष ने दावा किया कि वह लोकसभा में पार्टी की मुख्य सचेतक बनी हुई है। उन्होंने कहा कि यह फैसला साथी सांसदों के साथ विचार-विमर्श के बाद लिया गया है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर बगावत और विधायकों तथा सांसदों के अलग गुट बनाने की घटनाओं ने पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी के नेतृत्व के सामने अब तक की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। बागी गुट ने विधानसभा और संसद में अलग पहचान बनाने की कोशिश की है। तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से ममता बनर्जी के व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द केंद्रित रही है। लेकिन पार्टी के भीतर दूसरी पंक्ति के नेतृत्व, विशेषकर अभिषेक बनर्जी की बढ़ती भूमिका को लेकर पार्टी के भीतर असंतोष की खबरें लगातार सामने आती रही हैं। हमारा मानना है कि यह संकट केवल वैचारिक नहीं, बल्कि नेतृत्व को लेकर भी है। वैसे भी किसी भी दल के सत्ता से बाहर होने के बाद आंतरिक मतभेद खुलकर सामने आने लगते हैं। पश्चिम बंगाल में चुनावी झटके के बाद टीएमसी में संगठनात्मक कमजोरी और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को बल मिला है। यह सच है कि अधिकांश क्षेत्रीय दल करिश्माई नेतृत्व पर आधारित होते हैं। जब नेतृत्व परिवर्तन या उत्तराधिकार का प्रश्न उठता है, तब टूट की संभावना बढ़ जाती है। महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ यही हुआ है। अब टीएमसी में भी हो रहा है। यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि टीएमसी संकट का सबसे बड़ा फायदा भाजपा को मिल सकता है। बंगाल में भाजपा लंबे समय से मुख्य विपक्ष की भूमिका में रही है। टीएमसी के कमजोर होने पर भाजपा अपने जनाधार और संगठन को मजबूत करने की कोशिश करेगी। साथ ही संसद में उसकी स्थिति और मजबूत होगी। बहरहाल, यह संकट ममता बनर्जी के नेतृत्व कौशल की भी परीक्षा है। यदि वे बागियों को साधने और संगठन को पुनर्गठित करने में सफल रहती हैं, तो उनका राजनीतिक कद और मजबूत हो सकता है। लेकिन यदि टूट बढ़ती है, तो यह टीएमसी के भविष्य के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। हालांकि अभी ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। पश्चिम बंगाल में टीएमसी का अभी भी मजबूत कैडर नेटवर्क और सामाजिक आधार मौजूद है। ममता बनर्जी की व्यक्तिगत लोकप्रियता भी पार्टी की बड़ी ताकत है। हालांकि यह भी सच है कि यह टूट पार्टी के “अजेय” होने की धारणा को कमजोर करती है।