प्रधानमंत्री की अपील के मायने?

देश में पांच राज्यों के चुनाव खत्म होते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पेट्रोल-डीजल, सोना, विदेश यात्रा और फ़र्टिलाइजऱ के बारे में दिए गए बयान के बाद देशभर में हड़कंप मच गया है और तेल की कीमतों में वृद्धि की अटकलें लगाई जाने लगी है। शेयरबाजार पर भी इसका असर दिखने लगा है। दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका-ईरान युद्ध और भारत के गिरते विदेशी मुद्रा (डॉलर) भंडार को देखते हुए पिछले दो दिनों में दूसरी बार पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने और सोना खरीदने जैसी गैर जरूरी खर्च वाली चीजों को नहीं खरीदने की अपील की है। यह सच है कि भारत का गिरता विदेशी मुद्रा (डॉलर) भंडार देश के लिए चिंता का सबब बना हुआ है। एक अनुमान के मुताबिक अमेरिका-ईरान युद्ध शुरू होने के बाद भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में करीब 38 अरब डॉलर की कमी आ चुकी है। ऐसे में प्रधानमंत्री की अपील जायज है, लेकिन विपक्ष के सवाल भी मौजूं हैं। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा है कि प्रधानमंत्री का बयान सरकार की नाकामी का सबूत है। पिछले 12 साल में सरकार को इस मुकाम पर ला दिया है कि जनता को यह बताना पड़ रहा है कि वह क्या खरीदें, क्या न खरीदें, कहां जाए और कहां ना जाए? हर बार जिम्मेदारी जनता पर डाल दी जाती है ताकि खुद जवाबदेही से बचा जा सके। वहीं, सपा और आम आदमी पार्टी ने भी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि चुनाव खत्म होते ही संकट की बात दिमाग में आ गई। निश्चित रूप से विपक्ष के सवाल तीखे हैं, लेकिन सच के करीब हैं। पश्चिम एशिया में संकट को 2 महीने से ज्यादा हो गया है और सरकार चुप बैठी थी। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सरकार हर काम चुनाव को देखकर करती है। यही नहीं आम जनता में भी इसे लेकर घबराहट जैसी स्थिति बन रही है। हालांकि केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि प्रधानमंत्री के बयान को ऊर्जा संरक्षण और देश पर आर्थिक बोझ कम करने के प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए ना कि किसी आपूर्ति की कमी के रूप में। सरकार ने साफ किया कि सोने के आयात का बिक्री पर रोक जैसी कोई योजना नहीं है। लेकिन भारत जैसे उपभोक्ता-प्रधान देश में जब प्रधानमंत्री स्वयं सार्वजनिक रूप से ऐसे बयान देते हैं, तो उसके संकेत दूर तक जाते हैं। देश की अर्थव्यवस्था आज भी तेल आयात पर अत्यधिक निर्भर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में थोड़ी बढ़ोतरी भी देश के आयात बिल, महंगाई और रुपये की स्थिति पर सीधा असर डालती है। दूसरी ओर भारतीय समाज में सोना केवल गहना नहीं, बल्कि निवेश और सामाजिक सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि भारत हर वर्ष भारी मात्रा में सोना आयात करता है। परिणामस्वरूप विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता है। सरकार शायद यह संदेश देना चाहती है कि आने वाला समय वैश्विक अस्थिरता का हो सकता है। जिससे भारत भी अछूता नहीं रह सकता। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो प्रधानमंत्री की अपील ‘आर्थिक राष्ट्रवाद’ की नई व्याख्या भी है। पहले ‘स्वदेशी अपनाओ’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ जैसे नारों के जरिए आत्मनिर्भरता का संदेश दिया गया, अब ‘कम खर्च करो, कम आयात करो’ की मानसिकता तैयार की जा रही है। हालांकि विपक्ष इसे अलग नजरिए से देख रहा है। वह सवाल उठा रहा है कि यदि अर्थव्यवस्था मजबूत है, तो फिर जनता से ईंधन और सोना बचाने की अपील क्यों की जा रही है? यह भी कहा जा रहा है कि लगातार बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी के बीच जनता पहले ही सीमित खर्च कर रही है, ऐसे में मितव्ययता की अपील वास्तविक आर्थिक चिंताओं को छिपाने का प्रयास है। लेकिन राजनीति से अलग हटकर देखें तो यह भी सच है कि ऊर्जा संरक्षण और अनुत्पादक आयात कम करना किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक कदम हैं। सवाल केवल इतना है कि क्या सरकार इसके साथ ऐसी आर्थिक नीतियां भी लाएगी जो आम नागरिक को राहत दें और वैकल्पिक निवेश तथा सार्वजनिक परिवहन जैसी सुविधाओं को मजबूत करें। असल में प्रधानमंत्री की यह अपील केवल पेट्रोल बचाने या सोना न खरीदने तक सीमित नहीं है। यह आने वाले आर्थिक दौर की चेतावनी भी है। अब यह सरकार पर निर्भर करेगा कि वह इस अपील को केवल भाषण तक सीमित रखती है या इसे ठोस आर्थिक सुधारों में बदल पाती है।