छत्तीसगढ़ के दक्षिण में स्थित बस्तर अत्यंत सुरम्य और वनों से ढका हुआ क्षेत्र हैं । वातावरण भी शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक है। छत्तीसगढ़ के अन्दर जब भी बस्तर की चर्चा होती है उसके साथ ही अलग प्रकार की छवि मानस पटल पर उभकर आतीहै । वनों से अच्छादित धरती ऊंचे – ऊंचे पहाड़ों की चोटियां और साल , सागौन के पेड़ दिखाई देते है । जिधर जाएंगें छोटी- बड़ी नदी – नालों की कलकल की ध्वनि सुनाई देती है । जिसके कारण मन आकर्षित हुए बिना नहीं रहती है । यहांनिवास करने वाले जनजाति सामाज के बन्धु अत्यंत सरल , सज्जन और सत्कार करने वाले सहृदय हैं । इनके स्वस्थ एवंश्रेष्ठ परम्परा तथा धार्मिक केन्द्र भी अनोखा है ।
गांव में गुड़ीघर जहां पर ग्राम के देवता का स्थान होता है । गांव में निवासरत सभी वहां कोई भी नई फसल अथवा वनोपजको देवता को समर्पित करके ही उपयोग करते है । चाहे महुआ , डोरी , चार , ईमली , साल के बीज , आदि वनोपज तथाकृषि का भी धान मड़िया , कोदों – कुटकी , सावा , उड़द इन सभी अनाज को भी समर्पित किये बिना उपयोग में नहीं लाते ।यहां के बुजुर्ग – सियान लोग भोजन के थाली से भी अपने देवता को अर्पित करते है । बस्तर के जनजाति कृषक चापड़ाचटनी , मड़िया , पेज पीकर परिश्रम कर कमाते हैं । गांव में निंदा – चारी , चुगली से दूर अत्यंत आत्मीयता से औरसहकारिता से एक – दूसरे का साथ देकर जीवन – यापन करते हैं । इनके आय का एक बड़ा भाग वनों से प्राप्त होता है यहभी कहां जा सकता है कि इनके जीवन का आधार वन है ।
वर्तमान में बस्तर को देखने से एक बात स्पष्ट दिखाई देती है कि यहां के सरल , सज्जन , भोला – भाला जनजाति समाजकी प्रसन्नता , आनंद , मस्ती कही खो गयी है। इनके प्रिय संगी – साथी जंगल है, जिस पर किसकी कुदृष्टि पड़ी है कि वनोंका अन्दर – अन्दर सफाया होते जा रहा है । जनजाति वनों की रक्षा की बात करें तो आवाज कौन सुने ? आवाज दबकर रहजाती हैं । इनके गांव की कुलदेवी माता शीतला , क्षेत्र की कुलदेवी माता दंतेश्वरी के आराधना में भी व्यवधान आने लगी है।
परलकोट क्षेत्र प्रतापपुर में जो शहीद गेंदसिंह का गांव है , वहां पिछले दो वर्षों से माता दंतेश्वरी की पालकी यात्रा तथाएक प्राचीन कार्यक्रम महिषासूर मर्दन पर विघ्न डाला जा रहा है । अभी – अभी कोयली बेड़ा क्षेत्र में ग्राम मदलेगांव मेंदेवपूजा के समय उपस्थित 40 गांव के 500 जनजातियों के सामने उस 40 गांव के गायता ( जनजाति देव पुजारी ) गस्सूराम उसेंडी की हत्या क्यों कर दी जाती है, हत्यारे इस हत्या से क्या संदेश देना चाहते हैं ? क्या उद्देश्य जनजात-आदिवासी समाज में दहशत फैलाना है? क्या जनजाति समाज का सामाजिक धार्मिक नेतृत्व को समाप्त करना है? क्याइनकी मंशा है कि जनजाति समाज विकास के नये अवसरों को न छुये ? क्या आदिवासी समाज के आवाज को दबानाचाहते है ?
वास्तव में हर चिन्तनशील व्यक्ति के मन को यह बात कचोटती हैं । जनजाति समाज की संस्कृति ही उनकी विशेषता है , परम्परा उनकी ताकत है , श्रद्धा केन्द्र , गुड़ीघर , सरना , देवरास , देवालय आदि उनके मन की शक्ति है , उनका मनोबल है, जो किसी भी परिस्थिति से उबरने में सहायक है । इसलिए जनजाति समाज के संस्कृति , रीति , परम्परा , श्रद्धा केन्द्रों काबिना छेड़छाड़ व परिवर्तन किये संरक्षण करना चाहिए । यह दायित्व केवल आदिवासी समाज का ही नहीं अपितु सम्पूर्णसमाज के साथ सरकार का भी है । समाज के बुद्धजीवी वर्ग का विशेष दायित्व है , बस्तर को उसकी संस्कृति व परंपराओंकी दृष्टि से समझने की आवश्यकता हैं , नहीं तो बस्तर अपनी विशेषता खोता जाएंगा ।
प्रेमशंकर सिदार
सामाजिक कार्यकर्ता, रायपुर
बस्तर को उसकी संस्कृति-परंपरा से समझने की आवश्यकता
