“2029” की पटकथा की तैयारी!

पश्चिम बंगाल सहित देश के पांच राज्यों में हुए चुनाव में भाजपा ने शानदार सफलता अर्जित कर एक बार फिर इतिहास रच डाला है। उसने न केवल पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी के 15 वर्षों के मजबूत किले को ढहाया बल्कि असम में हैट्रिक लगाकर साबित कर दिया कि उसकी नीतियों, विचारों और विजन का फिलहाल कोई काट नहीं है। चुनावी नतीजे की झलक बता रही है की राजनीति के बड़े-बड़े सूरमाओं के समीकरण कैसे चारों खाने चित्त हुए हैं। जनता ने यह साफ तौर पर बता दिया कि खामोशी के साथ दबाया गया ईवीएम के बटन का शोर बड़ी से बड़ी सत्ता को हिला सकता है। पश्चिम बंगाल में बात जब “खेला” करने की हो तो वहां की जनता ने दिखा दिया की असली “खेला”क्या होता है। असम में भाजपा की हैट्रिक सबूत है कि कैसे एक चेहरा दिल्ली तक धूम मचा सकता है। केरल में सत्ता विरोधी लहर ने वामपंथी के एकमात्र बचे गढ़ को ध्वस्त कर दिया और तमिलनाडु के चुनावी नतीजे इस बात के गवाह है कि सिल्वर स्क्रीन का जादू आज भी किस हद तक बड़ी आबादी के दिलों की धड़कन है। वैसे इन नतीजों ने भारतीय राजनीति को कई स्पष्ट संदेश दिए हैं। सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि मतदाता परंपरागत राजनीतिक ध्रुवीकरण से आगे बढ़कर प्रदर्शन, नेतृत्व और वैकल्पिक राजनीतिक प्रयोगों को महत्व दे रहे हैं। ये केवल क्षेत्रीय सत्ता समीकरणों का उतार-चढ़ाव नहीं हैं। भारतीय लोकतंत्र के बदलते चरित्र का आईना हैं। पश्चिम बंगाल में टीएमसी के मजबूत किले में आई दरार यह संकेत देती है कि लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले दलों के लिए जनसमर्थन स्वाभाविक नहीं रह गया है। नतीजों ने यह स्पष्ट किया है कि संगठित प्रयास और वैकल्पिक नैरेटिव किसी भी स्थापित सत्ता को चुनौती दे सकते हैं। यह केवल एक राज्य की कहानी नहीं, बल्कि उस व्यापक राजनीतिक बदलाव का हिस्सा है जिसमें मतदाता “एकाधिकार” को अस्वीकार कर रहा है। मतदाता अब “लाभार्थी” ही नहीं, बल्कि “मूल्यांकनकर्ता” भी बन चुका है। वह योजनाओं के वादे से अधिक उनके प्रभाव को देखता है। राजनीतिक दलों के लिए मजबूत संगठन और जमीनी उपस्थिति अपरिहार्य हो गई है। भारतीय राजनीति अब स्पष्ट रूप से प्रतिस्पर्धी और बहुध्रुवीय हो रही है, जहां राष्ट्रीय और क्षेत्रीय ताकतों के बीच संतुलन लगातार बदल रहा है। वैसे भी लोकतंत्र में कोई भी सत्ता स्थायी नहीं होती। जनता हर चुनाव में सत्ता को नए सिरे से परखती है। जो दल इस बदलते जनादेश को समझेंगे, वही भविष्य की राजनीति में प्रासंगिक बने रहेंगे। जहां तक भाजपा का सवाल है तो इस चुनावी फतह के बाद देश के 17 राज्यों में उसकी सरकारें हो गई हैं। यही नहीं उसके गठबंधन यानी एनडीए का दबदबा 21 राज्यों में कायम हो गया है। जबकि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के नेतृत्व में इंडिया गठबंधन सिकुड़कर सिर्फ 6 राज्यों तक की सीमित रह गया है। ऐसे में इंडिया गठबंधन के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं। इस नतीजे ने देश के सियासी नक्शे को पूरी तरह बदल दिया है। बहरहाल, इन परिणामों को केवल जीत-हार के रूप में देखना सतही होगा। इनके भीतर भविष्य की राजनीति के संकेत छिपे हैं। अब भाजपा का अगला मिशन पंजाब है, जहां 2027 में विधानसभा के चुनाव होने हैं। लेकिन यह कहे कि इस चुनाव परिणाम से 2029 की राष्ट्रीय राजनीति की पटकथा लिखने की शुरुआत हो गई है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।