प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केरल, पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु सहित पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों के बीच समान नागरिक संहिता (यूसीसी) और एक राष्ट्र-एक चुनाव की बात कर विपक्ष की दुखती रग पर हाथ रख दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और जम्मू कश्मीर में धारा 370 खत्म करने के बाद अब यूसीसी और एक राष्ट्र-एक चुनाव भाजपा का अगला मिशन है। प्रधानमंत्री ने भाजपा के 47 वें स्थापना दिवस पर पार्टी के अधूरे एजेंडे को पूरा करने पर जोर देते हुए कहा कि इन पर गंभीर और सकारात्मक विमर्श चल रहा है।दरअसल, यूसीसी और एक राष्ट्र-एक चुनाव दोनों ऐसे मुद्दे हैं जो केवल प्रशासनिक सुधार या कानूनी बदलाव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक निहितार्थ हैं। सत्तारूढ़ भाजपा जहां इसे देश में सुशासन और राष्ट्रीय एकता के रूप में स्वीकार करती है। वहीं विपक्षी दल इन्हें संघीय ढांचे और धार्मिक विविधता पर हस्तक्षेप के रूप में देखते हैं। वैसे यूसीसी का मुद्दा संवेदनशील है। भारतीय संविधान की धारा 44 राज्य को एक समान नागरिक कानून की दिशा में प्रयास करने का मार्गदर्शन देता है। यह विचार सामान और न्याय के सिद्धांत पर आधारित है, विशेषकर महिलाओं के अधिकारों के संदर्भ में इसे एक महत्वपूर्ण सुधार के रूप में देखा जाता है। हालांकि हमारे देश की सामाजिक संरचना केवल कानूनों से नहीं बल्कि परंपराओं और विविधताओं से चलती है। भारतीय संविधान की धारा 25 के तहत नागरिकों को अपने धर्म और रिति-रिवाजों का पालन करने की स्वतंत्रता प्राप्त है। ऐसे में यूसीसी को लेकर यह चिंता स्वाभाविक है कि कहीं यह विविधता पर एकरूपता थोपने का प्रयास न बन जाए। वहीं, एक देश-एक चुनाव का मूल उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को सरल, कम खर्चीला और प्रशासनिक दृष्टि से सरल बनाना है। यह तर्क जायज भी है कि बार-बार चुनाव होने से शासन की गति प्रभावित होती है और नीतिगत निर्णय रुक से जाते हैं। यदि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएं, तो इससे न केवल संसाधनों की बचत होगी बल्कि सरकारें भी बिना रूकावटों के काम कर सकेंगी। हालांकि एक साथ चुनाव की व्यवस्था में यह खतरा भी है कि राष्ट्रीय मुद्दे स्थानीय सरोकारों पर हावी हो जाएं। भारत जैसे संघीय ढांचे वाले देश में राज्यों की अपनी राजनीतिक और सामाजिक प्राथमिकताएं हैं। ऐसे में ये शंकाएं निराधार नहीं है कि क्षेत्रीय आवाजें दब सकती हैं। इसके अलावा यदि किसी सरकार का कार्यकाल बीच में समाप्त हो जाए या सरकार किसी कारणवश गिर जाए, तो चुनावी चक्र को बनाए रखना एक कठिन संवैधानिक प्रश्न बन जाएगा। ऐसे में इन प्रस्तावों के लिए देश में व्यापक सहमति की जरूरत है। इन पर खुला संवाद हो, जिसमें सभी पक्षों की समान भागीदारी सुनिश्चित हो। केवल विधायी प्रक्रिया ही पर्याप्त नहीं है। जिन उद्देश्यों को लेकर सुधार की कोशिशें की जा रही है वह अपने उद्देश्यों से ना भटके इस पर ध्यान देने की भी जरूरत है। बहरहाल, विधानसभा चुनावों के बीच प्रधानमंत्री के इस मुद्दे को उठाने से कांग्रेस सहित पूरा विपक्ष असहज महसूस कर रहा है। हालांकि यह शुरू से ही भाजपा का मुद्दा रहा है। ऐसे में विपक्ष को इससे घबराने की जरूरत नहीं है। वैसे भी ये राष्ट्रीय मुद्दे हैं। विधानसभा चुनावों में इसका कोई असर होगा ऐसा नहीं लगता।
दुखती रग पर हाथ!
