केरल में चुनाव आयोग के पत्र पर भाजपा की सील से सियासी विवाद खड़ा हो गया है। सीपीआई-एम और कांग्रेस ने इस पर सवाल उठाए हैं। वहीं, राज्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने स्पष्टीकरण जारी किया है। दरअसल, मामला 2019 की उस गाइडलाइंस से जुड़ा है, जिसमें उम्मीदवारों के आपराधिक रिकार्ड के प्रकाशन के नियम हैं। आयोग ने बताया है कि लिपिक की मानवीय भूल से भाजपा की सील वाली कॉपी स्कैन होकर राजनीतिक दलों को भेज दी गई। लेकिन आयोग के यह कह देने से वह अपनी गलतियों से पिंड नहीं छुड़ा सकता। सीपीआई-एम ने कहा है कि इससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या चुनाव आयोग के दस्तावेजों में बाहरी हस्तक्षेप हुआ है? जबकि चुनाव आयोग ने सफाई दी है कि यह गलती अनजाने में हुई और इसे तुरंत ठीक कर लिया गया है। उसने यह भी कहा कि भविष्य में ऐसी गलती ना हो इसके लिए सावधानी बढ़ती जाएगी। आयोग ने साफ किया कि यह सिर्फ एक तकनीकी गलती थी और इससे चुनाव प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उसकी व्यवस्था पूरी तरह मजबूत और निष्पक्ष है। निश्चित रूप से यह मामला सतही तौर पर एक प्रशासनिक गलती है, लेकिन राजनीति में घटनाएं अपने वास्तविक आकार से कहीं बड़ी बन जाती है। यह विवाद भी उसी श्रेणी में आता है, जहां तथ्य से अधिक “संदेह” अहम हो जाते हैं। विपक्ष पहले से ही ही चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाते रहे हैं। ऐसे में यह घटना उनके लिए ठोस उदाहरण बन गई है। वह इस मुद्दे को आयोग के पक्षपातपूर्ण रवैए से जोड़कर जनता के बीच यह संदेश देना चाहता है कि चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष नहीं है। इन सबके बीच भाजपा के लिए मामला असहज जरूर है लेकिन सीधे तौर पर उसके लिए नुकसानदेह नहीं है, क्योंकि चुनाव आयोग ने इसे स्पष्ट रूप से “लिपिकीय त्रुटि” बताया है। किसी प्रकार की राजनीतिक संलिपिता का प्रमाण भी सामने नहीं आया है। हालांकि इससे चुनाव आयोग की साख पर असर लाजमी है। आयोग की ताकत इसकी निष्पक्ष छवि है, लेकिन ऐसी घटनाएं विपक्ष के आरोपों को हवा देने का काम करती है।
लोकतंत्र में चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता सिर्फ वास्तविक ही नहीं, बल्कि दिखनी भी चाहिए। यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू है।
विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया को केवल “राजनीतिक अवसरवाद” कहकर खारिज करना भी उचित नहीं होगा, क्योंकि चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता जनता के भरोसे पर टिकी होती है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि पिछले कुछ वर्षों में चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में इस तरह की घटनाएं उस धारणा को और बल देती हैं कि कहीं न कहीं संस्थागत सतर्कता में कमी आई है। भले ही वास्तविकता कुछ भी हो, लेकिन “परसेप्शन” यानी जनधारणा का महत्व राजनीति में अत्यधिक होता है। इस पूरे प्रकरण से दो महत्वपूर्ण सबक सामने आते हैं। पहला, चुनाव आयोग को अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं को और अधिक मजबूत करना होगा ताकि इस तरह की त्रुटियों की कोई गुंजाइश ही न बचे। दूसरा, आयोग को पारदर्शिता बढ़ाने के लिए सक्रिय संचार रणनीति अपनानी चाहिए, ताकि किसी भी विवाद की स्थिति में तथ्य तुरंत और स्पष्ट रूप से सामने आ सकें।बहरहाल, यह मामला सिर्फ एक सील का नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के “विश्वास” का है। चुनाव आयोग को यह समझना होगा कि उसकी साख ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है। छोटी-छोटी चूकें भी बड़े संदेह पैदा करती हैं, और इन संदेहों को दूर करना ही सबसे बड़ी चुनौती है। राजनीति में अक्सर वास्तविकता से ज्यादा धारण काम करती है और इस मामले में भी असली लड़ाई “सच” की नहीं बल्कि “विश्वास” की है।
“विश्वास” की लड़ाई
