0 संजीव वर्मा
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रविवार को रिकॉर्ड 9वीं बार आम बजट पेश किया। वर्ष 2026-27 के इस बजट में वित्त मंत्री ने शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल और रक्षा जैसे क्षेत्रों में कई अहम घोषणाएं की हैं। साथ ही महिलाओं और किसानों का भी ध्यान रखा गया है। लेकिन हकीकत में यह बजट सपने की तरह है। आम आदमी को सिर्फ आश्वासन का झुनझुना थमा दिया गया है। वैसे भी आजकल बजट को लेकर लोगों की उत्सुकता में कमी आ गई है, क्योंकि अब ना तो पेट्रोल की कीमतों के लिए बजट का इंतजार होता है और ना ही रसोई गैस की कीमतों के लिए। बजट में अगर किसी बात का इंतजार होता है तो यह कि आयकर की नई देनदारी क्या होगी? मकान बनाने में कोई छूट मिलेगी या नहीं, बच्चों की पढ़ाई के लिए बड़े खर्चों की पूर्ति के लिए कोई योजना है या नहीं, उत्पादन कर और अन्य करों का संबंधित सामानों की कीमतों पर क्या असर होगा? लेकिन इस बार बजट में कोई खास परिवर्तन देखने को नहीं मिला। आयकर की दरों में भी कोई बदलाव नहीं किया गया है। स्वास्थ्य, शिक्षा के साथ खेती-किसानी का ख्याल रखते हुए बजट आवंटन में बढ़ोतरी की गई है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की बढ़ती भूमिका को लेकर बड़ा कदम उठाया गया है और इसके लिए एक सुपर कमेटी बनाने का निर्णय लिया गया है। वैसे आम बजट ऐसे समय में प्रस्तुत हुआ है जब भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत स्थिर विकास दर, अनियंत्रित महंगाई और वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर से गुजर रही है। यह बजट सरकार की दीर्घकालिक सोच, विशेषकर “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य की निरंतरता को दर्शाता है। बजट का सबसे प्रमुख पहलू पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) पर सरकार का जोर है। बुनियादी ढांचे-सड़क, रेल, लॉजिस्टिक्स, ऊर्जा और शहरी विकास में निवेश को आर्थिक वृद्धि का इंजन माना गया है। इसका उद्देश्य न केवल मांग सृजन करना है, बल्कि दीर्घकाल में उत्पादन लागत घटाकर भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूत बनाना भी है। यह रणनीति रोजगार सृजन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, हालांकि इसके परिणाम मध्यम और दीर्घ अवधि में ही स्पष्ट होंगे। विनिर्माण और आत्मनिर्भरता बजट का दूसरा मजबूत स्तंभ है। ‘मेक इन इंडिया’ जैसी पहलों की निरंतरता से संकेत मिलता है कि सरकार भारत को वैश्विक सप्लाई चेन का अहम केंद्र बनाना चाहती है। साथ ही सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा और ग्रीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों पर ध्यान देना बताता है कि नीति अब परंपरागत उद्योगों से आगे बढ़कर भविष्य की तकनीकों की ओर उन्मुख है। एमएसएमई क्षेत्र को बजट में रीढ़ की हड्डी मानते हुए ऋण, गारंटी और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने की कोशिश की गई है। यह क्षेत्र रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन जमीनी स्तर पर इन योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर ही वास्तविक सफलता निर्भर करेगी। छत्तीसगढ़ में माइनिंग कॉरिडोर बनाने का ऐलान किया गया है। लेकिन
घोषणाओं से अधिक जरूरी है कि छोटे उद्यमों तक सस्ती और आसान वित्तीय पहुंच सुनिश्चित हो। कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के संदर्भ में बजट अपेक्षाकृत संतुलित नजर आता है। कृषि उत्पादकता, वैल्यू एडिशन और सहायक क्षेत्रों पर जोर है, लेकिन किसानों की आय बढ़ाने के लिए किसी बड़े संरचनात्मक सुधार की कमी स्पष्ट दिख रही है। ग्रामीण मांग को मजबूत करने के लिए प्रत्यक्ष आय समर्थन या व्यापक राहत की अपेक्षा रखने वाले वर्गों के लिए बजट निराशाजनक है। कर नीति के मोर्चे पर बजट ने स्थिरता को प्राथमिकता दी है। बड़े कर सुधार या आयकर में व्यापक राहत नहीं दी गई, जिससे मध्यम वर्ग में निराशा है। बढ़ती महंगाई को रोकने का कोई उपाय नहीं बताया गया है। बहरहाल, सरकार बजट को विकास का रोडमैप बता रही है, जबकि विपक्ष का आरोप है कि यह आम आदमी की अपेक्षा के अनुरूप नहीं है। बाजार में भी उथल-पुथल मचा हुआ है। कुल मिलाकर इस बजट से जो उम्मीदें थी वह पूरी नहीं हो सकी हैं। महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से निपटने के मामले में सरकार का रवैया ढुलमुल ही नजर आया। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि बजट में विकास के लिए जो धनराशि मुहैया कराई जाती है उसका एक बड़ा भाग भ्रष्ट राजनेताओं, नौकरशाहों, ठेकेदारों और दलालों के पास पहुंच जाता है। इसके लिए कड़े उपाय करने की जरूरत थी। लेकिन इस बजट में ऐसा नहीं लगा कि आम आदमी इससे खुश होगा।
