“मुसवा बदनाम हुआ डार्लिंग तेरे लिए…”

प्रदेश में इन दिनों मुसवा यानी चूहे की जमकर चर्चा है। जबसे धान खरीदी में भ्रष्टाचार की खबरें आई है, मुसवा पर शामत आ गई है। वह शासन-प्रशासन के निशाने पर आ गया है। दरअसल, राज्य में इस समय समर्थन मूल्य पर धान खरीदी चरम पर है। किसान धान बेचने के लिए लाइन में खड़े हैं। टोकन को लेकर मारा-मारी है। धान खरीदी को अब मात्र 10-12 दिन शेष हैं। ऐसे में जिन किसानों के धान नहीं बिके हैं, वे गुस्से में हैं। उन्हें लग रहा है कि टोकन मिलेगा या नहीं। टोकन मिला तो धान बिकेगा। नहीं मिला तो फिर इंतजार..! कहीं इस इंतजार के चक्कर में समय ही ना निकल जाए। इस सोच से किसान परेशान हैं। हालांकि, सरकार घोषणा कर चुकी है कि वह किसानों का एक-एक दाना धान खरीदेगी। इससे किसानों को थोड़ी राहत जरूर है, लेकिन जब तक सरकार का इस पर रुख स्पष्ट नहीं होगा किसान हैरान-परेशान ही रहेंगे। वहीं, धान खरीदी केंद्रों में धान के सड़ने, खराब होने और करोड़ों रुपए के धान चूहों द्वारा चट कर जाने की खबरें पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है। प्रशासन का दावा है कि चूहे करोड़ों के धान खा गए हैं। जबकि विपक्ष धान खरीदी केंद्रों में चूहा ढूंढ रहा है, लेकिन उसे मिल नहीं रहा है। विपक्ष के नेता खाद्य मंत्री को चूहा पकड़ने की जाली तक सौंपने गए थे। यह अलग बात है कि वे सौंप पाएं या नहीं। लेकिन इससे शासन-प्रशासन के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। वैसे एक बारगी यह मामला भ्रष्टाचार का मालूम पड़ता है। लेकिन इसमें कितनी सच्चाई है वह जांच के बाद ही पता चल सकेगा। फिलहाल पक्ष-विपक्ष इस मुद्दे पर खो-खो खेल रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि चूहे के धान चट कर जाने की खबरें केवल लापरवाही नहीं बल्कि संगठित भ्रष्टाचार का संकेत है। उसका कहना है कि या तो धान का समय पर उठाव नहीं हुआ या फिर कागजों में धान दिखाकर उसे पहले ही बेच दिया गया और अब “चूहे खा गए” के बहाने गढ़े जा रहे हैं। विपक्ष इसे किसानों के हक पर डाका बता रहा है। जबकि सत्ता पक्ष इसे तकनीकी और कुप्रबंधन की चूक बताकर बचाव में जुटा है। उसका कहना है कि धान भंडारण के दौरान नमी में कमी के कारण वजन में आंशिक गिरावट (सूखत) एक स्वाभाविक और तकनीकी प्रक्रिया है, जो वर्षों से चली आ रही है और देश के सभी धान उत्पादक राज्यों में देखी जा रही है। सूखत और चूहा आदि कीटों के द्वारा धान के नुकसान को लेकर विपक्ष केवल भ्रम फैला रहा है। सरकार तर्क दे रही है कि नुकसान सीमित है। कुछ जगहों पर इसकी जांच भी कराई जा रही है। इसलिए इसे राजनीतिक रंग देना उचित नहीं है। लेकिन हमारा मानना है कि यह विवाद राज्य की धान खरीदी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर रहा है। धान खरीदी राज्य की राजनीति का अहम हिस्सा है। किसानों से जुड़ा यह मुद्दा भावनात्मक भी है और चुनाव की दृष्टि से संवेदनशील भी। इसलिए इसकी सत्यता की जांच जरूरी है। फिलहाल इस सब में जिस पर सारा आरोप थोपा गया है वह बेचारा मुसवा है! उसने ना कभी चुनाव लड़ा। ना गोदाम की चाबी उसके पास थी। ना ही धान खरीदी का टेंडर भरा। फिर भी धान घोटाले का सबसे बड़ा आरोपी बना दिया गया। लगता है अब चूहों को भी पता होना चाहिए कि लोकतंत्र में सबसे सुरक्षित चीज दोष है, क्योंकि हमेशा सबसे कमजोर के कंधे पर दोष थोप दिया जाता है। मामला सीधा-सपाट है। धान खरीदी केंद्रों से धान गायब हुआ। सवाल उठे तो जवाब मिला धान तो “चूहे खा गए”। बस! ना अधिकारी जिम्मेदार, ना सिस्टम फेल, गोदाम चाहे सरकारी हो, ताले चाहे प्रशासन के हो, लेकिन अंदर घुसने की छूट सिर्फ “मुसवा” को है। मतलब यह कि घोटाला छोटा हो या बड़ा, उसे मुसवा के मुंह में डाल दो मामला अपने आप हल्का हो जाएगा। इसलिए लोग गुनगुनाने लगे हैं कि… “मुसवा बदनाम हुआ डार्लिंग तेरे लिए…”! यह भले ही फिल्मी गाने की पंक्ति हो, लेकिन इस सिस्टम पर यह सटीक बैठता है। यहां नीतियां इंसान बनाता है, गलती सिस्टम करता है और बदनाम बेचारा “मुसवा” हो जाता है…!