अमरीकी आपत्ति और व्यापार वार्ता 

भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों में गर्माहट लाने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने बड़ा ऐलान किया। उन्होंने कहा कि दोनों देश व्यापार समझौते पर चर्चा करने को तैयार हैं। यह सातवें दौर की चर्चा होगी। इससे पहले पिछले साल जुलाई को वार्ता हुई थी। नए अमेरिकी राजदूत गौर ने कार्यभार संभालने के मौके पर कहा कि अमेरिका के लिए भारत से बढ़कर कोई भी देश अहम नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच सच्ची दोस्ती है। ये दोनों देशों के बीच असहमति के मुद्दों को सुलझाने में मददगार साबित होगी। वहीं, एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में अमेरिका ने भारत को अगले महीने अमेरिका के नेतृत्व वाले पैक्ससिलिका समूह में पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है। यह कदम वैश्विक प्रौद्योगिकी और इनोवेशन इकोसिस्टम में भारत की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है। इस समूह में जापान, दक्षिण कोरिया, यूके, इजरायल, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया जैसे 9 सह संस्थापक देश हैं। यह ग्रुप वैल्यू चैन पर काम करेगा, जो सहयोगी देशों और विश्वसनीय साझेदारों के बीच आर्थिक सुरक्षा को लेकर एक नई सहमति को बढ़ावा देती है। पैक्स एक ऐतिहासिक शब्द है, जो शांति, स्थिरता और समृद्धि को दर्शाता है। यह आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता और कंप्यूटिंग की नींव पर लागू होता है। इसकी रणनीतिक अवधारणा यह है कि वह सुरक्षित, लचीले और नवाचार संचालित प्रौद्योगिकी परिस्थितिकी तंत्र के निर्माण के लिए अमेरिका के नेतृत्व वाली पहल है। इसमें दुर्लभ खनिजों, ऊर्जा, उन्नत विनिर्माण, सेमीकंडक्टर, एआई अवसंरचना, लॉजिस्टिक्स शामिल हैं। हालांकि व्यापार समझौते को लेकर अमेरिका का रवैया सहयोगात्मक नहीं है। दरअसल, दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता बदलती वैश्विक राजनीति का अहम संकेत है। दोनों देश दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं। ऐसे में यह वार्ता रणनीतिक साझेदारी, भू-राजनीतिक हितों और घरेलू राजनीतिक मजबूरियों के बीच संतुलन साधने की कोशिश बन जाती है। वैसे अमेरिका लंबे समय से भारत के साथ व्यापार घाटे को लेकर असंतोष जताता रहा है। डिजिटल टैक्स, कृषि उत्पादों पर शुल्क, मेडिकल डिवाइसेज़ की कीमतों पर नियंत्रण और आयात शुल्क जैसे मुद्दे अमेरिका की प्रमुख आपत्तियां हैं। अमरीकी राजनीति में “अमेरिका फर्स्ट” की सोच अब भी प्रभावी है, जिसके चलते भारत पर बाजार खोलने का दबाव लगातार बना रहता है। जबकि भारत के लिए यह वार्ता आत्मनिर्भर भारत, घरेलू उद्योगों की सुरक्षा और रोजगार से सीधे जुड़ी है। कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्र राजनीतिक रूप से अत्यंत नाजुक हैं। सरकार बिना पर्याप्त सुरक्षा के इन्हें वैश्विक प्रतिस्पर्धा के हवाले नहीं कर सकती। यही कारण है कि भारत मुक्त व्यापार समझौते के बजाय चरणबद्ध और संतुलित समझौते की नीति पर जोर देता है। दरअसल, चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच अमेरिका भारत को एक अहम रणनीतिक साझेदार मानता है। क्वाड, रक्षा सहयोग और इंडो-पैसिफिक रणनीति में भारत की भूमिका अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण है। इसी वजह से व्यापारिक मतभेदों के बावजूद अमेरिका पूरी तरह टकराव की नीति नहीं अपनाता। वहीं भारत भी इस साझेदारी को भुनाकर तकनीक, निवेश और सप्लाई चेन में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है।
दोनों देशों में आंतरिक राजनीति व्यापार वार्ता को प्रभावित करती है। अमेरिका में चुनावी दबाव और उद्योग लॉबी, जबकि भारत में किसान, एमएसएमई और स्वदेशी उद्योग सरकार की नीति को सीमित करते हैं।
बहरहाल, भारत–अमेरिका व्यापार वार्ता किसी जीत-हार का खेल नहीं, बल्कि रणनीतिक धैर्य और परस्पर निर्भरता की परीक्षा है। भारत जहां अपने घरेलू हितों की रक्षा करना चाहता है, वहीं अमेरिका भू-राजनीतिक मजबूरियों के कारण भारत को पूरी तरह नाराज नहीं कर सकता। फिर भी दोनों देशों को चाहिए कि वे वार्ता को प्राथमिकता दें और जल्द से जल्द व्यापार समझौते को अंतिम रूप दें। इसी में दोनों का हित निहित है।