भूपेश V/s साव….मुद्दों पर बहस हो 

प्रदेश में इन दिनों पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा बिलासपुर के एक गांव में एक दृष्टांत के जरिए उपमुख्यमंत्री अरुण साव पर की गई टिप्पणियों को लेकर बवाल मचा हुआ है। मामला साहू समाज तक पहुंच गया है। दरअसल, भूपेश बघेल ने छत्तीसगढ़ी में टिप्पणी करते हुए कहा था कि ‘बेंदरा ल राजा बना दिस।’ उन्होंने आरोप लगाया था कि अरुण साव के अधीन नगरीय निकाय, पीडब्ल्यूडी और जल जीवन मिशन जैसे किसी भी विभाग में काम नहीं चल रहा है। बघेल ने एक कहानी का उदाहरण देते हुए कहा कि जंगल के जानवरों ने बंदर को राजा बना दिया क्योंकि वह सबसे सक्रिय था। लेकिन जब बघवा हिरण के बच्चे को ले गया, तो बंदर सिर्फ एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर कूदता रहा और बोला कि बच्चा बचे या न बचे, उसके प्रयास में कोई कमी नहीं होनी चाहिए। बघेल ने कहा कि अरुण साव की स्थिति भी ऐसी ही है। उनकी यह बातें राजनीतिक कार्य शैली पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी थी, जिसे भाजपा ने सीधे समाज पर अपमान से जोड़कर भूपेश बघेल से माफी की मांग कर डाली। भाजपा का मानना है कि यह बयान सिर्फ अरुण साव पर नहीं बल्कि पूरे सामाजिक वर्ग और जनप्रतिनिधियों की गरिमा पर चोट है। वहीं, कांग्रेस का कहना है कि यह एक राजनीतिक व्यंग्य की स्वतंत्रता है। भाजपा पूर्व मुख्यमंत्री और प्रभावशाली ओबीसी नेता भूपेश बघेल को निशाना बनाकर विपक्ष की आवाज को अवैध और असभ्य साबित करने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस का कहना है कि देश की राजनीति में इससे कहीं अधिक तीखे और व्यक्तिगत हमले पहले भी होते रहे हैं, जिन्हें अक्सर राजनीतिक भाषा कहकर स्वीकार कर लिया जाता था। ऐसे में इस बयान को असामान्य रूप से बड़ा मुद्दा बनाना सत्ता पक्ष की असहजता को दर्शाता है।
निश्चित रूप से देश की राजनीति में ऐसी भाषा कोई नई नहीं है। अक्सर ऐसे बयानों को मुद्दों से ध्यान भटकाने या राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए भी उछाला जाता है। अरुण साव भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं और अभी प्रभावशाली मंत्री हैं। इसलिए भाजपा का आक्रामक विरोध राजनीतिक रूप से अपेक्षित था। इस दृष्टि से देखा जाए तो बवाल का एक हिस्सा राजनीतिक लाभ के लिए भी बढ़ाया गया लगता है। बयान पर इतना शोर हुआ कि नीतिगत मुद्दे पीछे छूट गए। मामला सिर्फ मर्यादा या भाषा का नहीं बल्कि राजनीतिक अवसर का भी है। यह विवाद केवल एक बयान तक सीमित नहीं है बल्कि इसके पीछे राजनीतिक रणनीति, नैतिकता की प्रतिस्पर्धा और मुद्दों से ध्यान भटकाने की प्रवृत्ति भी साफ दिखाई देती है। यह विवाद दोनों दलों के लिए अवसर भी है। कांग्रेस जहां इसे सरकार की विफलताओं से ध्यान भटकाने की कोशिश बताकर पलटवार कर रही है। वहीं, भाजपा इस मुद्दे के सहारे नैतिक ऊंचाई लेने और विपक्ष को रक्षात्मक स्थिति में लाने का प्रयास कर रही है। बयान पर जितना शोर बढ़ेगा उतना ही मूल सवाल, शासन, विकास और जनहित के मुद्दे पृष्ठभूमि पर चले जाएंगे। बहरहाल, विचारधारा और नीतियों पर टकराव लोकतंत्र की ताकत है। लेकिन व्यक्ति पर कटाक्ष और उपमा उस ताकत को कमजोर करती है। राजनीतिक दलों में अपने नेता के बयान को व्यंग्य और विरोधी के बयान को अपमान करना अब सामान्य हो गया है। यदि राजनीतिक दल वास्तव में संवाद का स्तर उठाना चाहते हैं, तो उन्हें बयानबाजी से आगे बढ़कर मुद्दों पर बहस करनी होगी। आज महंगाई, बेरोजगारी, कानून व्यवस्था और किसानों की समस्याओं जैसे मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत है। ऐसे मामलों को तूल देना उचित नहीं है।