विकसित भारत-रोजगार एवं आजीविका के लिए गारंटी मिशन (ग्रामीण) यानी वीबी-जी राम जी विधेयक 2025 राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हस्ताक्षर के साथ ही नया कानून बन गया। महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी मनरेगा की जगह लेने वाले इस नए कानून के तहत ग्रामीण परिवारों को 125 दिन की रोजगार गारंटी सुनिश्चित होगी। लेकिन इस नए कानून में महात्मा गांधी का नाम बदले जाने से मचा बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है। विपक्षी दल सदन के बाद अब सड़क पर उतर आए हैं। उनका कहना है कि नए कानून में महात्मा गांधी का नाम हटाया जाना स्वीकार्य नहीं है। पिछले 20 साल से चल रही मनरेगा का नाम बदल जाना केवल विपक्षी पार्टियों ही नहीं बल्कि आम लोगों को भी रास नहीं आ रहा है। उनका कहना है कि मनरेगा में सुधार किया जाना सरकार का अच्छा कदम हो सकता है, लेकिन महात्मा गांधी का नाम हटाना उचित नहीं है। चूंकि महात्मा गांधी किसी दल या सरकार की नहीं बल्कि पूरे देश की साझा विरासत है। यही नहीं पूरी दुनिया महात्मा गांधी के सिद्धांतों और विचारों को अंगीकार करती है। ऐसे में उनका नाम बदला जाना किसी भी रूप में जायज नहीं है। राष्ट्रीय प्रतीकों को हटाने या कमजोर करने से समाज में अनावश्यक विभाजन और भ्रम पैदा करता है। यह सच है कि नए कानून में कई बड़े बदलाव हुए हैं और इसका लाभ ग्रामीणों को मिलेगा। रोजगार गारंटी 100 दिन से बढ़कर 125 दिन किया गया है, इससे गांवों में अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। राज्य सरकारें यह तय करेंगी कि किन 60 दिनों में काम को रोकना है। इससे किसानों को अपने खेतों में काम करने के लिए मजदूरों की कमी नहीं पड़ेगी। कानून में मजदूरी का भुगतान साप्ताहिक आधार पर या किसी भी स्थिति में कार्य समाप्ति के 15 दिनों के भीतर किए जाने को अनिवार्य किया गया है। देरी होने पर मुआवजा देने का भी प्रावधान है। नए कानून के मुताबिक मुख्यतः 4 क्षेत्रों जल सुरक्षा से जुड़े कार्य, मुख्य ग्रामीण अवसंरचना, आजीविका से संबंधित अवसंरचना और प्रतिकूल मौसमी घटनाओं के प्रभाव को कम करने वाले कार्य कराए जाएंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सारे कार्य गांव के स्तर पर होंगे और ग्राम सभा से मंजूरी लेनी होगी। कुल मिलाकर वीबी-जी राम जी कानून लागू होने से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की गारंटी पहले से ज्यादा मजबूत होगी। इसका मकसद गांव में रहने वाले मजदूरों, किसानों और भूमिहीन परिवारों की आय बढ़ाना और उन्हें आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना है। लेकिन इसकी आड़ में महात्मा गांधी का नाम हटाना लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर सरकार ऐसा कर क्या संदेश देना चाहती है? महात्मा गांधी का नाम रोजगार, श्रम की गरिमा, ग्राम स्वराज और आत्मनिर्भरता की सोच से जुड़ा था। मनरेगा का मूल उद्देश्य ही ग्रामीण गरीबों को काम का अधिकार, पलायन पर रोक और स्थानीय संसाधनों का विकास था, जो सीधे गांधीवादी विचारधारा से मेल खाता था। ऐसे में नाम हटाने से उस वैचारिक जुड़ाव कमजोर होगा, जिसने इस योजना को व्यापक सामाजिक स्वीकृति दिलाई। बहरहाल, लोकतंत्र में किसी भी योजना का मूल्यांकन उनके परिणामों से होता है, ना कि उनके नाम से। लेकिन महात्मा गांधी केवल नाम नहीं एक विचार है। आज के दौर में जब पूरी दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी है तब भी गांधी जी के विचार और संदेश प्रासंगिक है। पूरी दुनिया उन्हें नमन कर रही है। मनरेगा से महात्मा गांधी का नाम हटाया जाना ना तो जरूरी था और ना ही जनहित में प्राथमिकता। जरूरत इस बात की थी कि कैसे योजना को प्रभावी, पारदर्शी और मजदूर केंद्रित बनाई जाए, ताकि ग्रामीण मजदूरों की जिंदगी में सुधार आए। लेकिन इस योजना से महात्मा गांधी जी का नाम ही गायब हो गया। ऐसे में हम तो बस यही कह सकते हैं कि हे राम! ये क्या हो गया…।
हे राम! ये क्या हो गया
