बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर देशभर में मचा बवाल अभी थमा नहीं है कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के चुनाव आयोग पर ‘वोट चोरी’ के आरोप ने आग में घी डालने का काम किया है। यही नहीं सोमवार को नई दिल्ली में संसद भवन से चुनाव आयोग कार्यालय तक विरोध मार्च के दौरान जिस तरह से 300 विपक्षी सांसदों ने एकजुटता दिखाई, वह यह बताने के लिए काफी है कि सभी विपक्षी दल एसआईआर और ‘वोट चोरी’ को लेकर एकजुट हैं। इससे पहले, राहुल गांधी ने पिछले हफ्ते प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जिस तरह से चुनाव आयोग पर भाजपा के साथ मिलकर देशभर में चुनाव में आपराधिक धोखाधड़ी करने का आरोप लगाया हुआ बेहद गंभीर और संगीन है। उन्होंने कर्नाटक की महादेवपुरा विधानसभा सीट की पड़ताल सबूत के तौर पर दिखाई। राहुल गांधी ने दावा किया कि 2024 के लोकसभा चुनाव में बेंगलुरु सेंट्रल सीट के महादेवपुरा विधानसभा खंड एक में एक लाख से ज्यादा वोटों की हेराफेरी हुई थी। साथ ही कहा कि वोट चोरी का यह मॉडल देश भर में लागू हो रहा है। निश्चित रूप से राहुल गांधी का आरोप चुनाव आयोग की विश्वसनीय पर भी सवाल खड़े करता है। हालांकि चुनाव आयोग ने राहुल के आरोप को सिरे से खारिज कर दिया है। कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने महादेवपुरा सीट में कथित गड़बड़ी की जांच का आदेश दिया है। साथ ही उन्होंने उप मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से हलफनामे के साथ सबूत पेश करने को कहा है। वहीं, भाजपा ने राहुल गांधी के आरोप को खारिज करते हुए कहा है कि वे संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ गलत भाषा का उपयोग कर झूठी जानकारी फैला रहे हैं। उधर, संसद भी इस मुद्दे पर गर्म है। एसआईआर का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। शीर्ष अदालत ने एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर मंगलवार को फिर से सुनवाई की। इस दौरान कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि वह तथ्यों और आंकड़ों के साथ तैयार रहे, क्योंकि कोर्ट प्रक्रिया से पहले मतदाताओं की संख्या, पहले और अब मृतकों की संख्या और अन्य प्रासंगिक विवरणों पर सवाल उठाएगा। इससे पहले 29 जुलाई को अदालत ने याचिकाकर्ताओं से 8 अगस्त तक अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने को कहा था। कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को चेतावनी भी दी थी कि यदि इस प्रक्रिया में कोई भी अनियमितता या गड़बड़ी पाई गई तो वह हस्तक्षेप करने से नहीं हिचकेगा। निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद मतदाता सूची का मसौदा प्रकाशित कर दिया है और इसकी प्रति सभी राजनीतिक दलों को मुहैया करा दी गई है। उसने यह भी बताया कि मसौदा मतदाता सूची को वेबसाइट पर भी अपलोड कर दिया गया है। इसके दो दिन बाद आयोग ने मतदाता सूची का प्रारूप भी प्रकाशित कर दिया और इसे आम से लेकर खास सभी वर्ग के लोग देख सकते हैं। इस पर भी बवाल कटा और राजद नेता तेजस्वी यादव ने चुनाव आयोग और एसआईआर पर सवाल उठाते हुए दावा किया कि मेरा नाम मतदाता सूची में नहीं है, मैं चुनाव कैसे लड़ूंगा? उन्होंने कहा कि एप पर ईपीआईसी नंबर को सर्च करने पर उनका नाम मतदाता सूची में नहीं आ रहा है। हालांकि निर्वाचन आयोग ने तुरंत ही तेजस्वी के दावों को सिरे से खारिज कर दिया। चुनाव आयोग ने कहा कि उनका नाम मतदाता सूची के प्रारूप में है। आयोग ने एक मतदान केंद्र की सूची जारी की, जिसमें तेजस्वी का नाम 416वें नंबर पर उनकी तस्वीर के साथ मौजूद है। यानी एसआईआर को लेकर जहां विपक्ष लगातार सवाल खड़े कर रहा है, वही आयोग उनके सवालों को लगातार खारिज करने में जुटा है। बहरहाल, विपक्ष का यह भी आरोप है कि आयोग एसआईआर की आड़ में नागरिकता की जांच कर रहा है। वे इस पर कानूनी व वैधानिक सवाल भी उठा रहे हैं। आयोग ने शीर्ष अदालत को दिए 88 पन्नों के हलफनामे में कहा है कि इस प्रक्रिया के तहत किसी की नागरिकता समाप्त करने जैसी बात नहीं है। वैसे, संविधान के अनुच्छेद 325 के अनुसार किसी भी शख्स को केवल धर्म, नस्ल, जाति या लिंग के आधार पर मतदाता सूची से बाहर नहीं किया जा सकता। कानूनन देश का प्रत्येक नागरिक, जो 18 साल या उससे अधिक है, मतदाता के तौर पर पंजीकरण करा सकता है। इसमें सिर्फ गैर-नागरिक को नाम दर्ज कराने के अयोग्य ठहराया गया है। सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले में स्पष्ट कर चुका है कि मताधिकार केवल संवैधानिक अधिकार है, मौलिक अधिकार नहीं। मगर भारतीय नागरिक होने के बावजूद उसे शर्तें पूरी करनी होती है, और आवश्यक दस्तावेज देने होते हैं। आयोग की मंशा पर उंगली उठाने वालों का आरोप है कि गणना फार्म में मांगे गए दस्तावेज में आधार, मतदाता-पत्र व राशन-कार्ड का न शामिल होना संदेह पैदा करता है। चूंकि सरकार आधार को केवल पहचान-पत्र मान रही है, इसलिए यह संशय उठा है। यदि जल्द ही आयोग इसमें सुधार कर ले तो शायद इन आरोपों-प्रत्यारोपों से बचा जा सकता है। आयोग को अपनी छवि और स्वायत्तता का विशेष ख्याल रखना होगा। भारत लोकतांत्रिक देश ही नहीं है, दुनिया के समक्ष मताधिकार की ताकत की मिसाल भी पेश करता है। खास मतदाताओं को उनके अधिकार से वंचित करने की किसी राजनीतिक दल की साजिश का हिस्सा बनने से उसे न सिर्फ बचना होगा, बल्कि अपने पूर्ववर्तियों के नक्शे-कदम पर चल कर सख्त रवैया अपनाते हुए लोकतंत्र का रक्षा कवच बनने से भी हिचकिचाना नहीं चाहिए।
एसआईआर और ‘वोट चोरी’ पर बवाल
