छत्तीसगढ़ में इन दिनों अडानी और ईडी की चर्चा गरमाई हुई है। ईडी द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल की गिरफ्तारी और अडानी द्वारा हसदेव अरण्य के जंगलों में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई का मुद्दा जन चर्चा का विषय बना हुआ है। इन मुद्दों को लेकर प्रदेश का राजनीतिक पारा भी चढ़ा हुआ है। पक्ष-विपक्ष द्वारा आरोप-प्रत्यारोप का दौर बदस्तूर जारी है। लेकिन जनता चुप बैठी है। उसकी चुप्पी क्या गुल खिलाएगी यह भविष्य में ही पता चलेगा, लेकिन जिस तरह से ईडी ने बिना किसी नोटिस, समन और पूछताछ के आनन-फानन में चैतन्य की गिरफ्तारी की है, उससे जनता खुश नहीं है। चैतन्य के प्रति सहानुभूति बता रही है कि दांव उल्टा पड़ गया है। चैतन्य को राजनीति से कोई लेना देना नहीं है। वे युवा किसान हैं। हमेशा लाइमलाइट से दूर रहे। पिता के 5 साल तक मुख्यमंत्री रहते हुए भी वे राजनीति से दूरी बनाए रहे, वह यह बताने के लिए काफी है कि उन्हें राजनीति का उबड़-खाबड़ रास्ता पसंद नहीं है। बावजूद वे राजनीति के शिकार हो गए। लेकिन यह कहने में कोई संकोच नहीं कि अनजाने में ही सही उन्हें ईडी ने राजनीति की पिच पर उतार ही दिया । भूपेश बघेल कहते हैं कि चैतन्य की गिरफ्तारी के पीछे भाजपा का हाथ है। उन्होंने कहा कि हम रायगढ़ में पेड़ों की कटाई का विरोध कर रहे हैं, इसलिए हमारी आवाज दबाने के लिए बेटे को पकड़ा है। मैंने बेटे से कहा है कि आज तुम्हारे दादाजी होते तो खुश होते। वे कई बार अन्याय के खिलाफ आवाज उठाकर जेल गए। वह कहते अब तू भी इसमें शामिल हो गया। वहीं, एक ट्वीट में श्री बघेल ने प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री को निशाने पर लिया। उन्होंने लिखा कि मोदी-शाह सब कुछ बर्दाश्त कर सकते हैं, लेकिन कोई उनके मालिक ‘अडानी’ का विरोध करें, यह बर्दाश्त नहीं कर सकते। यह मेरे लड़के का सौभाग्य है कि प्रधानमंत्री जी और गृह मंत्री जी ने उसे अपना दुश्मन बनाया। उसे कोई नहीं जानता था, अब रातों-रात पूरा देश जान गया। भूपेश बघेल के इस ट्वीट के गहरे निहितार्थ हैं। इसे समझने की जरूरत है। राजनीति के जानकार और विश्लेषक भली-भांति जानते हैं कि भूपेश बघेल राजनीति के चाणक्य ही नहीं बल्कि जुझारू, लड़ाकू, बेहद मेहनती और कद्दावर राजनीतिज्ञ हैं। बिना किसी गॉडफादर के कांग्रेस जैसी पार्टी के शीर्ष मुकाम तक पहुंचना आसान नहीं, लेकिन उन्होंने अपनी काबिलियत के दम पर वह मुकाम हासिल किया। जिस तक पहुंचना किसी भी राजनीतिज्ञ का सपना होता है। दूसरी ओर सत्तारूढ़ भाजपा ने भूपेश बघेल के आरोपों को निराधार बताया। वन मंत्री केदार कश्यप ने कहा कि कोल आवंटन के लिए पिछली कांग्रेस सरकार ही जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि जब भूपेश बघेल मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने कोल ब्लॉक राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत को आवंटित किया था। जबकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा है कि मोदी सरकार ने राजस्थान को कोयला खनन का अधिकार 2015 में दिया। उन्होंने कहा कि राज्य की पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने हसदेव जंगल की कटाई को रोकने के लिए विधानसभा में संकल्प पास करके केंद्र सरकार को छत्तीसगढ़ में नया कोल खदान आवंटन रद्द करने की मांग की थी। दोनों पक्ष अपना-अपना तर्क दे रहे हैं। लेकिन, इस सबके बीच एक युवा किसान चैतन्य बघेल की गिरफ्तारी ने सबका ध्यान खींचा है। भले ही ईडी इसे मनी लॉन्ड्रिंग से जोड़ रही है, लेकिन इसके अपने राजनीतिक मायने भी हैं। वैसे भी इस तरह के मामले में ईडी का अपना रिकॉर्ड भी दुरुस्त नहीं है। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से ईडी की कार्यवाही हमेशा संदेह के दायरे में रही है। खासतौर से राजनेताओं के खिलाफ दर्ज किए गए मामलों में। राज्यसभा में इसी साल सरकार ने बताया था कि पिछले 10 साल में ईडी ने राजनेताओं के खिलाफ 193 मामले दर्ज किए गए थे। उनमें केवल दो ही मामलों में सजा हो सकी है। यानी यह एक प्रतिशत से भी कम है। ईडी ने चैतन्य की गिरफ्तारी जिन परिस्थितियों में की है। उससे कई सवाल उठ रहे हैं। उस दिन उनका जन्मदिन था, जो उसके परिवार के लिए विशेष दिन होता है। उस दिन छत्तीसगढ़ विधानसभा सत्र का आखिरी दिन भी था। कांग्रेस का कहना है कि विधानसभा में तमनार में कथित तौर पर अडानी के लिए काटे जा रहे जंगलों का मुद्दा उठाना चाहते थे। भाजपा इससे पिंड छुड़ाना चाहती थी, लिहाजा ईडी के सहारे चैतन्य की गिरफ्तारी की गई, ताकि मुद्दों से ध्यान भटकाया जा सके। बहरहाल, राजनीति में एक शुचिता होती है। लेकिन जब दुराग्रह या पूर्वाग्रह हावी हो जाता है तो शुचिता खत्म हो जाती है। जन चर्चा है कि चैतन्य को पूर्व मुख्यमंत्री के बेटे होने की सजा मिल रही है। यदि ऐसा है तो यह राजनीतिक शुचिता और राजधर्म के विरुद्ध राजनीति के गिरते स्तर का द्योतक है।
पूर्व मुख्यमंत्री के बेटे होने की सजा भुगतते चैतन्य
