0 डा. सूर्यकांत मिश्रा
विज्ञान के बढ़ते आविष्कारों के बीच बहुत से ऐसे उपकरण हैं एजिन्हें अब इस दुनिया ने अलविदा कह दिया है। उन्नीसवीं सदी में ऐसे ही एक उपकरण का अविष्कार करने वाले गुगलिएलमो मारकोनी ने रेडियो नामक उपकरण को दुनिया के हाथों में पकड़ाकर जो इतिहास रचा उसने 21वीं सदी में भी अपनी उपयोगिता कम नहीं होने दी है। आज हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं कि देश के प्रधानमंत्री से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक ने रेडियो की उपयोगिता को समझते हुए अपने संदेशों का प्रसारण रेडियो पर जारी रखा है। हमारे संचार माध्यम के रूप में रेडियो का आविष्कार वास्तव में 19वीं सदी की बड़ी उपलब्धि थी। रेडियो के माध्यम से देश-दुनिया की खबरों की जानकारी आसानी से प्रसारित कराने वाले मारकोनी ने 63 वर्ष की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया। 20 जुलाई 1937 को दिल का दौरा पड़ने से इस दुनिया से विदा होने से पूर्व उन्होंने 1899 में 31 मिल की दूरी तक रेडियो संदेश भेजकर खुद को अमर कर लिया, उनकी मधुर स्मृति में अब प्रतिवर्ष 20 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय रेडियो दिवस मनाते हुए पूरी दुनिया उस जाँबाज वैज्ञानिक को श्रद्धासुमन अर्पित करती आ रही है। आधुनिक युग को रेडियो संचार का आधार प्रदान करने वाले उक्त वैज्ञानिक को यह दुनिया शायद कभी न भूल पाये।
हमारे देश भारतवर्ष में रेडियो का सफर लगभग 100 वर्ष का होने जा रहा है। संगीत के विशेष कार्यक्रमों की शुरूआत भी इसी रेडियो की देन मानी जा सकती है। हमारे देश ने इस उपकरण के आते ही शौकिया रेडियो क्लबों के गठन का जो दौर देखा वह भी अविस्मरणीय है। इस संदर्भ में 23 जुलाई का दिन विशेष महत्वपूर्ण माना जा सकता है। इसी दिन इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी (आईबीसी) की स्थापना भी हुई, इसके साथ ही अप्रैल 1930 में इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग कारपोरेशन कंपनी (आईएसबीसी) का जन्म हुआ। मैं रेडियो की ऐतिहासिक यात्रा पर बहुत ज्यादा नहीं घुसना चाहता हूँ। बात करना चाहता हूँ इस अत्याधुनिक युग में रेडियो की उपयोगिता के विषय में। यह जरूर है कि रेडियो का वह दौर समाप्त हुआ है जो पचास वर्ष पूर्व दीवानगी के रूप में दिखायी पड़ा करता था। मुझे याद है खेलों का वह जमाना जब न तो टेलीविजन का जन्म हुआ था और न ही हम उसे बड़े पर्दे पर देख पाने की स्थिति में ही थे। तब एशियाई खेलों से लेकर ओलिम्पिक और विश्व कप के साथ हम स्थानीय स्तर की प्रतियोगिताओं का रोमांच मैदानों से दूर अपने घरों पर मात्र रेडियो तरंगों के माध्यम से उठा पाते थे।
आज जब विश्व रेडियो श्रोता दिवस पर मैं कुछ लिखने का प्रयास कर रहा हूँ तब मुझे मेरे अपने शहर का वह दौर याद आ रहा है जब देश की जानी-मानी अखिल भारतीय हॉकी प्रतियोगिता सर्वेश्वरदास स्कूल के चट मैदान पर खेली जाती थी। मैं उस समय अपने स्कूली जीवन का आनंद ले रहा था और सर्वेश्वरदास स्कूल में ही अध्ययनरत था। उक्त प्रतियोगिता का रोमांच इतना अधिक हुआ करता था कि मैदान के चारों तरफ बैठक व्यवस्था के साथ ही दो छोर पर अस्थायी रूप से लकड़ी की काम-चलाऊ गैलरी बनायी जाती थी, किन्तु सभी शौकीनों को मैच का आनंद लेने मैदान के आस-पास जगह नहीं मिल पाती थी। इसी समस्या का समाधान आयोजन समिति ने रनिंग कॉमेंट्री को विकल्प मानते हुए निकाला। निगम स्कूलों में पदस्थ दो शिक्षकों ने इस जिम्मेदारी का सफलता पूर्वक निर्वहन किया। रेडियो के माध्यम से मैच का रोमांच अपनी वाणी से घरों तक पहुंचाने वाले श्री जेके राय तथा नेकराम देशमुख आज भी हमारे दिलों पर राज करते हैं। इनका साथ देने वाले कुछ लोग आज भी हमारे बीच हैं, जिन्होंने सर्वेश्वरदास स्कूल की बिल्डिंग के ऊपरी माले में बनाए जाने वाले आकाशवाणी केंद्र से अपनी आवाज को रेडियो तरंगों से जोड़ा था। मैं उनके नामों का उल्लेख यहां नहीं कर रहा हूँ, कारण यह कि कहीं कोई त्रुटि के चलते कुछ नाम छूट जाएं तो मन कचोटेगा। उक्त स्वर्णिम याद के साथ मैं यही स्पष्ट करने का प्रयत्न कर रहा हूं कि रेडियो की यात्रा और उपयोगिता आज भी प्रासंगिक है।
रेडियो और रेडियो श्रोताओं का एक और दौर मुझे बरबस ही अपनी ओर आकृष्ट कर रहा है, जिसका उल्लेख भी होना चाहिए। मेरे साथ मेरे पाठक भी इस बात से सहमत होंगे कि एक समय वह भी था जब हम प्रत्येक बुधवार की रात 8 या 8.30 बजे अपने घरों की ओर दौड़ पड़ते थे और रेडियो अथवा ट्रांजिस्टर के जरिए बिनाका गीतमाला का आनंद लिया करते थे। शायद विविध भारती से प्रसारित उक्त फिल्मी गानों की प्रतियोगिता सुनने वालों की संख्या और पसंदगी के आधार पर गीतों को अंक प्रदान कर प्रथम-द्वितीय पायदान प्रदान की जाती थी। सबसे बड़ी बात बिनाका गीतमाला को अपनी जादुई और कर्णप्रिय आवाज में प्रसारित करने वाले अमीन सायानी हम सबके दिलों पर आज भी उनकी वाणी की याद आते ही उतर आते हैं। इसी तरह रेडियो के माध्यम से ही हवा-महल जैसा कार्यक्रम हमें आज के टेलीविजन में चलने वाले दृश्यश्रव्य धारावाहिकों की तरह अपनी ओर खींचा करता था। यदि हम रेडियो पर प्रसारित होने वाले ऐसे ही कार्यक्रमों की बातें करते रहे तो लेखन का यह दौर रुक पायेगा ऐसा मुझे नहीं लगता। शब्द सीमा की मर्यादा भी इसे ज्यादा लंबा करने से रोकती है।
वर्तमान समय में आम लोगों की भागीदारी बढ़ाने रेडियो की फोन इन सुविधा ने कार्यक्रमों को बेहतर बनाने में महती भूमिका का निर्वहन किया है। हमारे देश में अधिकांश रेडियो केंद्रों पर डिजिटल ब्रॉडकास्ट प्रणाली उपलब्ध है। रेडियो ऑन डिमांड तथा न्यूज इन फोन की व्यवस्था ने श्रोताओं को मनपसंद कार्यक्रम के चुनाव का विकल्प भी दिया है। यह भी जानना जरूरी है कि हमारे देश में रेडियो के माध्यम से पहला समाचार बुलेटिन 19 जनवरी 1936 को प्रसारित किया गया, तब से आज तक रेडियो की विकास यात्रा ने उपलब्धियों के चलते अनेक आयाम स्थापित किये हैं। आकाशवाणी का समाचार नेटवर्क आज विश्व के प्रमुख प्रसारणकर्ताओं में से एक है। प्रतिदिन लगभग पौने तीन सौ बुलेटिन प्रकाशित किये जाते हैं जिनकी अवधि 36 घंटे से भी अधिक गई है। इस दौर में मोबाइल के माध्यम से रेडियो एफएम ने भी अपनी उपयोगिता को बरकरार रखा है।