‘ऑपरेशन कगार’ और शांति वार्ता का प्रस्ताव

प्रदेश से अब नक्सलियों का सफाया तय है। राज्य से लेकर केंद्र सरकार तक नक्सलियों के समूल नाश के संकल्प को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जता चुकी है। 31 मार्च 2026 की डेड लाइन भी तय हो चुकी है। ऐसे में नक्सलियों के हाथ-पांव फूलने लगे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि अब नक्सली बैकफुट पर आ गए हैं। उन्हें समझ आ गया है कि अब उनकी ‘दाल नहीं गलने वाली’। यही वजह है कि राज्य सरकार के सामने लगातार शांति वार्ता का प्रस्ताव दे रहे हैं। लेकिन वह हथियार छोड़ने को तैयार नहीं है। ऐसे में कैसे होगी शांति वार्ता? नक्सलियों ने सोमवार को एक और प्रेस नोट जारी कर शांति वार्ता की अपील की है। इसमें बीजापुर, तेलंगाना और महाराष्ट्र की सीमा में चल रहे ‘ऑपरेशन कगार’ को तुरंत रोकने की बात कही है। नक्सलियों की केंद्रीय कमेटी के प्रवक्ता अभय ने पत्र जारी कर लिखा है कि बीजापुर-तेलंगाना सीमा पर जारी सैन्य अभियान को तुरंत रोकना चाहिए और सरकार को शांति वार्ता के लिए आगे आना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार समयावधि बताए। युद्ध विराम करें और शांति वार्ता के लिए बातचीत करें। शांति वार्ता के लिए हमारी पार्टी तैयार है। इस बार उन्होंने संविधान की दुहाई देते हुए कहा है कि संविधान में लोगों को जीने का अधिकार दिया गया है उसे ही सरकार कुचल रही है। इससे पहले नक्सलियों ने शांति वार्ता को लेकर तीन पत्र जारी कर चुके थे। नक्सलियों ने कहा था कि सरकार की मंशा अलग दिख रही है। वह दमन व हिंसा के प्रयोग से समस्या का समाधान का प्रयास कर रही है। इसी का नतीजा है कि बीजापुर-तेलंगाना सीमा पर एक बड़ा सैन्य अभियान लॉन्च किया गया है। हमारा मानना है कि यदि नक्सली वास्तव में शांति वार्ता चाहते हैं तो वे तुरंत हथियार छोड़कर वार्ता के टेबल पर आए। राज्य सरकार ने नक्सलियों से बार-बार शांति की अपील की है। गृह मंत्री विजय शर्मा ने कहा भी है कि सरकार नक्सलियों से वार्ता के लिए हमेशा तैयार है। इसके लिए कई माध्यमों से अपील भी की गई है। बशर्ते इसमें किसी तरह की शर्त ना हो। उन्होंने कहा कि अभी जारी किए गए पर्चे की सत्यता की जांच के बाद विचार किया जाएगा। वैसे सरकार ने बंदूक छोड़कर आत्म समर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए नई पुनर्वास नीति भी बनाई है। जिसके तहत उन्हें कई सुविधाएं दिए जाने का ऐलान किया गया है। बावजूद यदि नक्सली आत्मसमर्पण के लिए आगे नहीं आ रहे हैं और सिर्फ प्रेस नोट के जरिए शांति वार्ता की बात कह रहे हैं, ऐसे में सरकार में बैठे लोगों को लग रहा है कि कहीं उनकी शांति वार्ता की अपील के पीछे षड्यंत्र-साजिश तो नहीं है? दरअसल नक्सली नहीं चाहते कि सुरक्षा बल के जवान उनके मांद (सुरक्षित पनाहगार) तक पहुंचे। इसे रोकने के लिए नक्सली लगातार कोशिश कर रहे हैं। शायद इसी कड़ी में वे प्रेस नोट जारी कर शांति वार्ता की बात कह रहे हैं। ऐसे में शांतिवार्ता की कवायद सुरक्षा बलों को चकमा देने के लिए सोची-समझी रणनीति का हिस्सा तो नहीं? मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने नक्सलियों की शांति वार्ता की अपील पर कहा था कि नक्सली अब बौखलाहट में शांति वार्ता की बात कर रहे हैं। लेकिन सरकार की नीति स्पष्ट है। जो हिंसा छोड़कर समाज की मुख्य धारा में आएंगे, उनका स्वागत है। लेकिन जो भी गोली की भाषा समझते हैं उन्हें उसी की भाषा में जवाब मिलेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि हमने सरकार में आने के बाद से ही शांति की पहल की है। कुछ लोग आए भी। उनके साथ न्याय और पुनर्वास की व्यवस्था की गई है। लेकिन जो अभी भी हिंसा पर अड़े हैं उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई जारी रहेगी। मुख्यमंत्री ने सोमवार को नक्सल उन्मूलन अभियान की समीक्षा भी की। इस दौरान उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ अब निर्णायक मोड़ पर है। उन्होंने सभी अधिकारियों से आह्वान किया कि वे पूरी निष्ठा, सजगता और प्रतिबद्धता के साथ इस ऐतिहासिक लक्ष्य को प्राप्त करने में अपनी भूमिका निभाएं। यहां यह बताना लाजिमी है कि छत्तीसगढ़-तेलंगाना की सीमा पर 800 वर्ग किलोमीटर के बड़े क्षेत्र में पिछले एक सप्ताह से नक्सल विरोधी अभियान ‘ऑपरेशन कगार’ जारी है। इसमें कर्रेगुट्टा की पहाड़ियां भी शामिल है। इस अभियान में राज्य और केंद्रीय बलों के 5 हजार से अधिक जवान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लगे हैं। ‘ऑपरेशन कगार’ का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र को नक्सलियों के नियंत्रण से मुक्त करना है। शीर्ष अधिकारियों का कहना है कि यह सुरक्षा बलों की जिम्मेदारी है कि वे इलाके को नक्सलियों से खाली कराएं। जब तक नक्सली समूहों को क्षेत्र से हटा नहीं दिया जाता, तब तक ऑपरेशन जारी रहेगा। पुलिस सूत्रों का दावा है कि पहाड़ियों में हिड़मा, दामोदर और देव जैसे मोस्ट वांटेड नक्सली कमांडरों और अन्य शीर्ष नक्सली नेताओं की मौजूदगी की खुफिया सूचना मिलने के बाद कर्रेगुट्टा पहाड़ी की घेराबंदी की गई है। अब आगे क्या होगा। यह सभी समझ रहे हैं। नक्सली भी इससे वाकिफ है। ऐसे में नक्सलियों को चाहिए कि वे हथियार छोड़ बिना शर्त शांति वार्ता के लिए आगे आएं और समाज की मुख्य धारा में शामिल हो। बहरहाल, नक्सलियों की इस ताजा शांति वार्ता के प्रस्ताव पर राज्य सरकार का रुख क्या होगा, यह अभी पता नहीं है। लेकिन हमारा मानना है कि सरकार को नक्सलियों की बिना शर्त वार्ता के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार कर उन्हें एक अंतिम मौका देना चाहिए। हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। लोकतंत्र में इसकी कोई जगह भी नहीं है। छत्तीसगढ़ शांति का टापू है। इसे हिंसा की आग में झोंकने से बचाने में ही समझदारी है। यदि नक्सली अपना हठ ना छोड़ें तब उन्हें उनकी भाषा में ही जवाब दे।