प्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव की तस्वीर पूरी तरह साफ हो गई है। दोनों प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा ने अपने-अपने पत्ते खोल दिए हैं। खास बात यह है कि इस बार दोनों दल फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं और दोनों ने ही अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। भाजपा ने जहां इस बार सभी 10 नगर निगमों में नए प्रत्याशी उतारे हैं तो कांग्रेस ने भी आठ निगमों में नए उम्मीदवार दिए है। उसने अंबिकापुर में पूर्व महापौर अजय तिर्की और रायगढ़ में जानकी काटजू पर पुनः विश्वास जताया है। भाजपा ने पांच तो कांग्रेस ने चार महिलाओं को टिकट दिया है। यानी 20 महापौर प्रत्याशियों में से 9 महिलाओं को इस बार मौका मिला है। जहां तक राजधानी रायपुर का सवाल है तो यहां से कांग्रेस ने पूर्व महापौर प्रमोद दुबे की पत्नी दीप्ति दुबे को मौका दिया है। उनका मुकाबला रायपुर निगम में नेता प्रतिपक्ष रहीं मीनल चौबे से है। इसी तरह दोनों दलों ने प्रदेश के 49 नगर पालिकाओं और 114 नगर पंचायत के अध्यक्ष और पार्षद प्रत्याशियों के नामों का भी ऐलान कर दिया है। नामांकन की प्रक्रिया भी पूरी हो चुकी है। यानी अब चुनावी जंग में सेना और सेनापति उतर चुके हैं, लिहाजा राजनीतिक पारा धीरे-धीरे चढ़ता जा रहा है। भाजपा-कांग्रेस के बीच ही सीधा मुकाबला होगा। इस बार भाजपा ज्यादा उत्साहित है, यह लाजमी भी है। वह प्रदेश में भाजपा सत्तारूढ़ है और पिछले विधानसभा चुनाव के बाद लोकसभा और रायपुर दक्षिण उपचुनाव में फतह हासिल कर मनोवैज्ञानिक ढंग से बढ़त हासिल कर चुकी है, लिहाजा जीत को लेकर वह पूरी तरह आशान्वित नजर आ रही है। दूसरी ओर लगातार हार के चलते कांग्रेस कार्यकर्ताओं में निराशा है, लेकिन वह स्थानीय चुनाव को चुनौती मानकर न केवल पूरे मनोयोग से चुनाव लड़ने का दावा कर रही है बल्कि जीत के प्रति भी पूरी तरह आश्वस्त है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज का कहना है कि प्रदेश में भाजपा के खिलाफ माहौल है और लोग बिगड़ती कानून व्यवस्था से त्रस्त है। जबकि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष किरण देव का कहना है कि भाजपा प्रदेश सरकार के एक साल के कार्यों को लेकर जनता के बीच जाएगी। हालांकि यह दावे-प्रतिदावे हैं लेकिन जमीनी हकीकत क्या है यह तो जनता ही मतदान के जरिए बताएगी। फिलहाल यह चुनाव कई मायनों में अलग है। इस बार प्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव हो रहा है। यानी मतदाता सीधे महापौर और अध्यक्ष का चुनाव करेंगे। यह चुनाव 2014 के बाद पहली बार ईवीएम से होगा। दरअसल दलीय आधार पर चुनाव होने से मतदाताओं की मन:स्थिति को भांपना आसान हो जाता है। दलों के चुनाव चिन्ह होने से मतदाताओं में भ्रम की स्थिति ना के बराबर होती है। दलों के प्रति प्रतिबद्धता के चलते करीब आधे मतदाता सीधे अपनी पसंद की पार्टी को मतदान करते हैं, जिसे परंपरागत वोट बैंक कहा जाता है। ऐसे मतदाताओं की संख्या भी काफी होती है जो प्रत्याशियों की छवि और उनके कार्यों को आधार मानकर मतदान करते हैं। यही वजह है कि कई बार निर्दलियों को भी मौका मिल जाता है और वह चुनकर आते हैं। खासकर निकाय और पंचायत चुनाव में ऐसा देखा जाता है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बमुश्किल ऐसा एक से दो प्रतिशत होता होगा, लेकिन निकाय और पंचायत चुनाव में इसका प्रतिशत बढ़ जाता है। यह सच है कि निकाय चुनाव स्थानीय मुद्दों बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं के आधार पर लड़ा जाता है। लेकिन उम्मीदवारों की छवि और मतदाताओं से उनका व्यवहार और संपर्क भी मायने रखता है। कहीं-कहीं तो जातिवाद भी एक बड़ा मुद्दा होता है। यही वजह है कि राजनीतिक दल इसे भी टिकट देने का एक आधार मानते हैं। वहीं, सबसे बड़ी बात सत्तारूढ़ दल का होना होता है। जिस दल की राज्य में सरकार होती है उसका असर चुनाव में जरूर देखा जाता है। सरकार चुनाव के पहले कई बड़े वादे कर मतदाताओं को रिझाने में लगी रहती है। बहरहाल, राज्य में इस बार का नगरीय निकाय चुनाव दिलचस्प होने वाला है। सत्ता पक्ष अपने कार्यों का ढिंढोरा पीट रहा है, तो विपक्ष सरकार की नाकामी गिना रहा है। इस बीच आम मतदाता खामोश है। देखना होगा कि उनकी खामोशी क्या रंग दिखाती है।
निकाय चुनाव: सेना और सेनापति तैनात
