आपकी बात/ निकाय चुनाव: अब वादों और दावों की होगी परीक्षा

 

0 संजीव वर्मा

पिछले एक साल से चल रहे चुनाव दर चुनाव की श्रृंखला टूटने का नाम ही नहीं ले रही है। नवंबर 2018 में हुए छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के बाद इस साल लोकसभा के चुनाव हुए। उसके बाद रायपुर दक्षिण विधानसभा का उपचुनाव हुआ। अब नगरीय निकाय और पंचायत के चुनाव की गूंज सुनाई दे रही है। शासन-प्रशासन के स्तर पर चुनावी तैयारियां जोर-शोर से चल रही है। प्रदेश के 14 नगर निगमों, 48 नगर पालिक परिषदों और 122 नगर पंचायत के अलावा 27 जिला पंचायत, 146 जनपद पंचायत और 11664 ग्राम पंचायतों के चुनाव होने हैं। नगरीय निकायों में अब महापौर और पंचायतों में अध्यक्ष सीधे जनता चुनेगी। वहीं, आरक्षण की प्रक्रिया भी जारी है। संभावना व्यक्त की जा रही है कि एक सप्ताह के भीतर आरक्षण की प्रक्रिया भी पूरी कर ली जाएगी। दरअसल प्रदेश में नगरीय निकाय और त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव एक साथ करने की तैयारियां चल रही है। इस बीच नगरीय निकायों में महापौर, अध्यक्ष समेत वार्ड पार्षद तथा त्रि-स्तरीय पंचायतों में पंच, सरपंच, जनपद तथा जिला पंचायत के सदस्यों तथा अध्यक्ष पदों के आरक्षण के लिए संशोधन अध्यादेश जारी होने के बाद अब आरक्षण व निर्वाचन नियम में बदलाव किया जा रहा है। इस संबंध में पंचायत व ग्रामीण विकास विभाग ने संशोधन के लिए प्रारूप की सूचना का प्रकाशन राजपत्र में कर दिया है। दावा-आपत्ति भी मंगाई गई है। वहीं, नगरीय प्रशासन विभाग द्वारा भी आरक्षण व निर्वाचन नियम में बदलाव के लिए सूचना जारी किए जाने की तैयारी है। नियमों में बदलाव के बाद नगरीय निकाय और पंचायतों में आरक्षण की प्रक्रिया शुरू होगी। यहां यह बताना लाजिमी है कि महापौर व अध्यक्ष पदों का आरक्षण शासन तथा वार्ड पार्षदों के पदों का आरक्षण कलेक्टर के माध्यम से होगा। उधर, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने निकाय चुनाव में पिछड़े वर्ग को 50 फीसदी आरक्षण देने के सरकार के दावे पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा है कि पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण का जो प्रावधान किया है, वह घातक है। ऐसे असंतुलित प्रावधान के बाद पिछड़ा वर्ग के लिए कुछ नहीं बचेगा। उन्होंने कहा कि यदि पिछड़े वर्ग को 50 फीसदी आरक्षण मिलेगा तो कुल आरक्षण 96 फीसदी हो जाएगा। जबकि भाजपा बार-बार कह रही है कि आरक्षण की सीमा 50 फीसदी ही रखा जाए। ऐसे में समझा जा सकता है कि जिस राज्य में आधी आबादी पिछड़े वर्ग की है वहां भाजपा ही उन्हें ठग रही है। हालांकि इस पर भाजपा की कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री के बयान के बाद हल-चल तेज हो गई है। इस बीच, राजनीतिक दल निकाय और पंचायत चुनाव को लेकर सक्रिय हो गए हैं दोनों प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा में बैठकों का दौर शुरू हो गया है। खासकर कांग्रेस में संगठन ने सभी जिलों में जमीनी हकीकतों को टटोलना शुरू कर दिया है। प्रदेश की सभी जिला कांग्रेस कमेटियों की बैठकों के साथ तीनों प्रभारी सचिव अपने प्रभार वाले क्षेत्र के निकायों की रिपोर्ट भी ले रहे हैं। दरअसल प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बाद लोकसभा चुनाव और उपचुनाव में हार के बाद केंद्रीय नेतृत्व के कान खड़े हो गए हैं। शायद यही वजह है कि प्रभारी सचिव प्रदेशभर में घूम-घूम कर रिपोर्ट इकट्ठा करने में लगे हैं। यह चुनाव जहां कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती है तो भाजपा के लिए भी कड़ी परीक्षा होगी। सरकार के एक साल पूरे भी हो गए हैं। भले ही यह स्थानीय चुनाव हो, लेकिन इसे हलके में नहीं लिया जा सकता। राज्य सरकार की वास्तविक जमीनी हकीकत का पता गांवों से ही चलता है। ऐसे में यह चुनाव उसके किए गए वादों और दावों की परीक्षा तो होगी ही उसकी लोकप्रियता का भी पता चल जाएगा, कि वह कितने पानी में है।