छत्तीसगढ़ में संपन्न विधानसभा चुनाव के नतीजे बेहद अप्रत्याशित और चौंकाने वाले रहे। आंकलन, अनुमान और संभावनाएं धरी की धरी रह गईं । एक्जिट पोल की भी पोल खुल गई। भारतीय जनता पार्टी ने छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद अब तक की सबसे बड़ी जीत हासिल की है, जो यह बताने के लिए काफी है कि मतदाताओं के मन की बात को टटोल पाना अब किसी भी राजनीतिक दल या राजनीतिक विश्लेषकों के लिए असंभव ही नहीं नामुमकिन है। शायद कांग्रेसी इसी तरह के भ्रम का शिकार हो गए। मतदाताओं ने बता दिया कि लोकतंत्र में वही असली ‘माई-बाप’ है। जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो उसके खिलाफ न तो ‘एन्टी इनकम्बेंसी’ दिख रही थी और न ही कोई ऐसा बड़ा मुद्दा भाजपा के पास था, जो कांग्रेस को नुकसान पहुंचा पाता। लेकिन हिंदुत्व और धर्मांतरण के अंडर करेंट को कोई नहीं समझ पाया और कांग्रेस इसकी आंधी में उड़ गई। भूपेश बघेल सरकार द्वारा पिछले 5 सालों में किसानों, गरीबों, ग्रामीणों, युवाओं और महिलाओं के लिए किए गए कार्यों का असर भी इसमें दबकर रह गया। दरअसल कवर्धा का झंडा विवाद, बिरनपुर की हिंसा और बस्तर में धर्मांतरण का मुद्दा अंदर ही अंदर सुलग रहा था, जिसे भांपने में कांग्रेस असफल रही और चुनाव में इसका भयंकर परिणाम सामने आया। इसमें कोई दो मत नहीं कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का चेहरा एक ब्रांड के रूप में सामने था। भाजपा के पास भी उनका विकल्प नहीं दिख रहा था। लेकिन कांग्रेस ने ऐन चुनाव के वक्त ‘भूपेश है तो भरोसा है’ की जगह ‘कांग्रेस की सरकार-भरोसे की सरकार’ का नया नारा लेकर आ गई, जिससे जनता में भ्रम की स्थिति बनी। भाजपा ने इसे मुद्दा भी बनाया। इसका भी कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इन सबके बीच भाजपा के घोषणा-पत्र में शामिल महतारी वंदना योजना ने महिलाओं को अच्छा खासा प्रभावित किया। महिलाओं को हर साल 12 हजार रुपए देने के वादा के साथ भाजपा ने कार्यकर्ताओं द्वारा पूरे प्रदेश में महतारी वंदन योजना का फार्म भरवाने का जो नुस्खा चलाया वह कामयाब हो गया। हालांकि कांग्रेस ने भी गृहलक्ष्मी योजना के तहत 15 हजार रुपए देने की घोषणा की, तब तक काफी देर हो गई थी। इसके अलावा प्रधानमंत्री आवास योजना को भी भाजपा ने मुद्दा बनाया। साथ ही पीएससी भर्ती में भ्रष्टाचार को लेकर युवाओं में आक्रोश साफ दिख रहा था। इन सबसे इतर प्रधानमंत्री मोदी का चेहरा रहा। उनकी गारंटी सब पर भारी रही। न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि राजस्थान और मध्यप्रदेश में भी मोदी का चेहरा सामने था, जिस पर मतदाताओं ने जमकर प्यार लुटाया। ‘मोदी की गारंटी की गारंटी है’ का नारा खूब चला। इसका असर सभी जगह देखा गया। वैसे छत्तीसगढ़ में भले ही कांग्रेस ही हार हुई हो, लेकिन उसका वोट शेयर बरकरार है। मात्र एक प्रतिशत वोट शेयर गिरा है। कांग्रेस को पिछले चुनाव में 43.04 प्रतिशत वोट मिले थे। इस बार 42.23 प्रतिशत वोट मिले हैं। वहीं, भाजपा का वोट प्रतिशत पिछले चुनाव के मुकाबले 14 प्रतिशत बढ़ा है। 2018 में उसे 32.97 प्रतिशत मत मिले थे। इस बार 46.27 प्रतिशत मत मिले हैं। कांग्रेस का एक प्रतिशत वोट शेयर गिरने से उसे काफी नुकसान उठाना पड़ा है। जबकि भाजपा ने उल्लेखनीय सफलता अर्जित की है। बहरहाल, छत्तीसगढ़ सहित पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में हिन्दी भाषी राज्यों में भाजपा की जीत में कई संदेश छिपे हैं। यह 4 महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव का संकेत भी है। यहां के चुनाव नतीजे में यह संकेत दिन के उजाले की तरह साफ है कि कांग्रेस को अपने आप में गहराई से चिंतन मनन कर कदम तत्काल उठाना चाहिए, ताकि वह यहां पर फिर से पूरी तरह से प्रासंगिक बनी रहे अन्यथा लोकसभा के चुनाव में भी उसे चौंकाने वाले परिणाम का सामना करना पड़ेगा। कांग्रेस को यह भी याद रखना होगा कि उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी उन दो लोकसभा की सीटों को बचाने की होगी जो उसके खाते में हैं। लाख टके का यही सवाल है कि क्या कांग्रेस ऐसा कुछ कर पाएगी।
आपकी बात: हिंदुत्व की आंधी में उड़ गई कांग्रेस
