आपकी बात: महिला आरक्षण को लेकर चढ़ता सियासी रंग

देश में लोकसभा चुनाव को एक साल दूर है। लेकिन अभी से चुनावी चौसर सजने शुरू हो गए हैं। भाजपा एक कदम आगे निकल गई है। उसने एक ऐसा चारा डाला है, जिसे विपक्ष न निगल पा रहा है न उगल। यानी भाजपा विपक्ष को पूरी तरह घेरे में ले लिया है। उसका प्रचार तंत्र भी सक्रिय हो चुका है। संसद के पांच दिन के विशेष सत्र में भाजपा सरकार ने महिला आरक्षण को पारित कराकर ऐसा निशाना साधा है कि विपक्ष हतप्रभ है। अब भाजपा इसके प्रचार में जुट गई है। यह अलग बात है कि यह आरक्षण अभी लागू नहीं होने वाला है। फिर भी इसे भाजपा ऐसे प्रचार कर रही है, मानो वह अभी से लागू हो गया है। सरकारी विज्ञापन भी प्रसारित किए जा रहे हैं। लेकिन विज्ञापन में यह नहीं बताया जा रहा है कि यह आरक्षण कब लागू होगा? कोई भी पार्टी आरक्षण के खिलाफ नहीं है। सभी चाहते हैं कि महिलाओं को आरक्षण मिले। लेकिन भाजपा आनन-फानन में इसे पारित कराया, क्योंकि इसके भी अपने निहितार्थ हैं। दरअसल, भाजपा की नजर आधी आबादी पर है। वह महिलाओं को साधकर आगामी लोकसभा चुनाव की वैतरणी पार करना चाहती हैं। लेकिन देश की जनता सब जान-समझ रही है। वह जानती है कि भले ही संसद में महिला आरक्षण विधेयक पारित हो गया हो, लेकिन यह अभी लागू नहीं होने वाला है। विधेयक में प्रस्तावित कानून के मुताबित उसके लिए 2029 तक इंतजार करना पड़ेगा। विधेयक के कानून बन जाने के बाद परिसीमन होगा। उसके बाद ही महिला आरक्षण कोटा लागू किया जा सकता है। गौरतलब है कि परिसीमन अगली जनगणना के बाद ही होगा और जनगणना 2027 में होने के आसार है। बहरहाल, विधेयक के मुताबिक महिला आरक्षण 15 साल तक लागू रहेगा, लेकिन इसका कार्यकाल बढ़ाया जा सकता है। खास बात यह है कि परिसीमन के बाद महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों को बदल दिया जाएगा। विधेयक में कहा गया है कि लोकसभा और विधानसभाओं में एक तिहाई यानी 33 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी और उन्हें प्रत्यक्ष चुनाव से भरा जाएगा। यह कोटा राज्यसभा या राज्य विधान परिषदों पर लागू नहीं होगा। कोटे के भीतर एक तिहाई सीटें अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए होगी। लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया है। इसी मुद्दे को लेकर अब विपक्ष सरकार को घेरने में लगा हुआ है। कांगे्रस नेता राहुल गांधी ने यह मुद्दा उठाते हुए कहा है कि केन्द्र सरकार अडानी और जातीय जनगणना के मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए यह विधेयक लाई है। उन्होंने कहा कि महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण तुरंत मिलना चाहिए, क्योंकि जनगणना कराने और परिसीमन करने में कई साल लगेंगे। यह कोई जटिल मामला नहीं है, लेकिन सरकार ने जो दो शर्ते जोड़े है, उससे उसकी मंशा का पता चलता है। उन्होंने यह भी कहा कि यूपीए सरकार के समय महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा से पारित हुआ था उसमें भी ओबीसी कोटे का प्रावधान नहीं था। उसी समय इसे शामिल करना चाहिए था, लेकिन अब वे इसे करके ही दम लेंगे। राहुल गांधी ने कहा कि जिस दिन भी विपक्ष सरकार में आएगा, उसी दिन उनकी पांच गारंटी लागू हो जाएगी। जातीय जनगणना होगी जिसमें एससी-एसटी और ओबीसी की संख्या का पता चल जाएगा। फिर इन वर्गों को देश चलाने में भागीदारी मिलेगी। अब जबकि महिला आरक्षण विधेयक पारित हो चुका है तो दोनों प्रमुख राजनीतिक दल महिलाओं को साधने में लग गए हैं। भाजपा ने अपने संगठन की नीति निर्धारित इकाई में महिलाओं की संख्या बढ़ाने की तैयारी कर ली है। दरअसल भाजपा के संसदीय बोर्ड, केन्द्रीय चुनाव समिति जैसी नीति निर्धारित इकाई में महिला भागीदारी नाम मात्र है, इनमें भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जाएगी। हालांकि वह इस साल होने वाले 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में 33 प्रतिशत महिलाओं को टिकट देगी ऐसा नहीं लग रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस इस मुद्दे पर 4 सूत्रीय रणनीति तय की है। महिला विधेयक के पारित होने के बाद इसे लागू होने में करीब 10 साल लगने को लेकर पार्टी इसे महिलाओं के साथ धोखा करने के तौर पर पेश करेगी। साथ ही पिछड़े वर्ग की महिलाओं को इसके लाभ से वंचित किए जाने को लेकर भी भाजपा के खिलाफ माहौल बनाएगी। वैसे कांग्रेस महिलाओं को पहले ही साधने में लगी हुई है। कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा और गृह लक्ष्मी योजना की गारंटी से महिला वोट पाने में उसे काफी मदद मिली थी। इसी तरह की गारंटी वह आने वाले विधानसभा चुनाव में भी देने वाली है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि महिला आरक्षण विधेयक को लेकर आम जनता खासकर महिलाएं क्या सोचती हैं। क्या यह महिलाओं के साथ छल है? या फिर भाजपा वास्तव में महिलाओं को उनका अधिकार देना चाहती है, भले ही इसे लागू करने में दस साल ही क्यों न लगे। फिलहाल इन सवालों का जवाब के लिए इंतजार करना होगा। लोकतंत्र में जनता ही सब कुछ है। इसके बैगर एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। ऐसे मेें यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता किस पर अपना विश्वास जताएगी।