दोषी जनप्रतिनिधियों के भी चुनाव लड़ने पर लगे आजीवन रोक

0 संजीव वर्मा 
सांसदों-विधायकों के खिलाफ आपराधिक केस से जुड़े मामलों में उच्चतम न्यायालय की ओर से नियुक्त एमिकस क्यूरी यानि न्याय मित्र वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि दोषी ठहराए गए जनप्रतिनिधियों को सिर्फ 6 साल के लिए नहीं बल्कि आजीवन चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिए। चुनाव लड़ने की अयोग्यता को केवल 6 साल तक के लिए ही सीमित करना समानता के अधिकार का हनन है। रिपोर्ट के मुताबिक देश में नैतिक अधमता का अपराध करने पर लोकपाल, विजिलेंस कमिश्नर और मानवाधिकार आयोग अध्यक्ष समेत 20 संवैधानिक पदों के अधिकारी हटाए जा  सकते हैं, ऐसे में सांसदों और विधायकों को विशेष रियायत देना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लघंन है। दरअसल वर्तमान में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के अनुसार, सजा की अवधि पूरी होने के बाद दागी नेताओं के अगले 6 साल तक ही चुनाव लड़ने पर रोक है। इस लिहाज से न्याय मित्र की रिपोर्ट काबिल-ए-गौर है। इस पर विचार किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत द्वारा एमिकस क्यूरी नियुक्ति के बाद यह उनकी 19वीं रिपोर्ट है। दरअसल याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने दागी नेताओं के आजीवन चुनाव लड़ने पर पाबंदी की मांग की थी। उन्होंने 2016 में याचिका दायर कर जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी, जो एक दोषी सांसद या विधायक को सिर्फ 6 साल के लिए चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराती है। इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया था। असल में एमिकस क्यूरी किसी मामले को सुलझाने में अदालत की मदद करता है। हंसारिया ने अपनी रिपोर्ट में तर्क दिया है कि अगर वैधानिक पद पर किसी भी दोषी अधिकारी या प्राधिकारी की नियुक्ति नहीं हो सकती, तब तो यह स्पष्ट रूप से मनमाना है कि इसी तरह का दोषी व्यक्ति सजा की एक निश्चित अवधि की समाप्ति के बाद फिर से देश या राज्यों के सर्वोच्च विधायी निकाय, संसद, विधानसभा या विधानपरिषद में आकर बैठ सकता है। कानून निर्माताओं को ऐसे कानून के तहत पद संभालने वाले व्यक्तियों की तुलना में ज्यादा पवित्र और अनुल्लंघनीय होना चाहिए। यहां पर बताना भी जरूरी है कि आज देश के कुल 763 सांसदों (लोकसभा और राज्यसभा मिलाकर) में से 306 यानि 40 प्रतिशत सांसदों पर आपराधिक केस दर्ज हैं। इनमें 194 पर हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण और महिलाओं पर अत्याचार जैसे गंभीर आपराधिक मामले हैं।  इसी तरह 4001 विधायकों में से 1777 यानी 44 प्रतिशत विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें 1136 यानि 28 प्रतिशत पर हत्या, अपहरण और महिलाओं पर अत्याचार के मामले दर्ज हैं। केरल में सर्वाधिक 70 प्रतिशत विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। अदालतों में सांसदों और विधायकों पर 5 हजार से अधिक आपराधिक मामले लंबित हैं। इनमें से 40 प्रतिशत 5 साल से ज्यादा पुराने हैं। जहां तक छत्तीसगढ़ का सवाल है तो यहां 10 मामले लंबित हैं। इनमें दो मामले 5 साल से अधिक पुराने हैं। न्याय मित्र ने सुप्रीम कोर्ट को सौंपी अपनी रिपोर्ट में इन सभी मामलों के जल्द निपटारे के लिए रोज सुनवाई करने का भी सुझाव दिया है। दरअसल, न्याय मित्र की यह रिपोर्ट बेहद महत्वपूर्ण है। यदि ये सिफारिशें मान ली गई तो आरोपी नेता जीवनभर चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। यह रिपोर्ट अपराधीकरण पर लगाम लगाने की दिशा में भी कारगर साबित हो सकता है। वैसे सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2020 में अहम फैसला सुनाया था। उन्होंने कहा था कि यदि कोई राजनीतिक दल आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को उम्मीदवार बनाती है तो उसके सभी आपराधिक मामलों की जानकारी पार्टी को अपनी वेबसाइट पर डाउनलोड करनी होगी। साथ ही राजनीतिक पार्टियों को ये भी बताना होगा कि किन कारणों से आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को उम्मीदवार बनाया गया है। इसके अलावा यह जानकारी सोशल मीडिया अकाउंट और स्थानीय अखबार में भी देनी होगी। लेकिन राजनीतिक दल ये बताते हैं कि उनके उम्मीदवार पर जो आपराधिक मामले दर्ज हैं वो राजनीति से प्रेरित हैं। यानि कोर्ट का फैसला लागू होने के बावजूद जमीन पर उसका कोई असर नहीं दिखता। ऐसे में न्यायमित्र की इस हालिया रिपोर्ट को लागू करने की दिशा में सार्थक प्रयास करने की जरूरत है। इसके लिए सभी राजनीतिक दलों को आगे आना होगा, ताकि राजनीति में सुचिता दिखे।