0 संजीव वर्मा
देश में इन दिनों ‘एक देश -एक चुनाव’ की चर्चा है। केंद्र सरकार ने इसको लेकर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द की अध्यक्षता में 8 सदस्यीय कमेटी का गठन किया है। इसमें राजनीतिक दलों के वरिष्ठ नेताओं, राजनीतिज्ञों के साथ विधि विशेषज्ञों को भी शामिल किया गया है। इस समिति के गठन से लोकसभा चुनाव समय से पहले राज्य विधानसभा चुनावों के साथ कराए जाने की संभावना बढ़ गई है। कम से कम 10 राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल 2023 में आम चुनावों के लिए निर्धारित समय से पहले या उसके आसपास खत्म हो जाएगा। इस साल के अंत में छत्तीसगढ़ सहित पांच राज्यों मध्यप्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना और मिजोरम में चुनाव होने हैं। वहीं, आंध्रप्रदेश, अरूणाचल प्रदेश,ओडिशा, सिक्किम और झारखंड में विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ होने की संभावना है। केंद्र सरकार का मानना है कि ‘एक देश-एक चुनाव’ से समय और संसाधन दोनों की बचत होगी। बार-बार होने वाले चुनावों पर खर्च होने वाले करोड़ों रुपए देश के विकास पर खर्च होंगे। लेकिन यह इतना आसान नहीं है। संविधान में संशोधन करने के अलावा कई अन्य मुद्दों पर भी ध्यान देना होगा। सबसे पहले इससे जुड़े विधेयक को देश के कम से कम आधे राज्यों की विधानसभा में पारित कराना होगा। बाद में संविधान संशोधन संसद के दोनों सदनों से पारित कराना होगा। कम से कम आधे राज्यों की सहमति भी जरूरी है। वहीं, त्रिशंकु जनादेश की स्थिति में सरकार बनाने या सरकार गिर जाने के बाद के लिए विकल्प तलाशने होंगे। इसके लिए न सिर्फ देश के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों को साथ आना होगा, बल्कि कई राज्य सरकारों की कुर्बानी भी देनी पड़ सकती है। विपक्ष के अधिकतर और खासकर क्षेत्रीय दल इसके खिलाफ है। उन्हें डर है कि एक साथ चुनाव होने की स्थिति में राज्यों में उनकी सरकार बनने की राह कठिन हो जाएगी। लेकिन सभी राजनीतिक दलों को भी यह समझना होगा कि देश में पहले एक साथ ही चुनाव होते रहे है। 1952, 1957, 1962, और 1967 में लोकसभा और राज्य विधानसभा के चुनाव एक साथ कराए गए। बाद में जब अलग-अलग कारणों से राज्यों की सरकारें गिर गई या बर्खास्त कर दी गई तब अलग-अलग चुनाव की स्थिति बनी। वैसे ‘एक देश-एक चुनाव’ को लेकर विधि आयोग भी पूर्व में केंद्र को रिपोर्ट दे चुका है। आयोग ने एक साथ चुनाव कराने के साथ ही कई दूसरे विकल्प भी सरकार सुझाए थे। फिलहाल इसे लेकर सियासी सरगर्मी बढ़ गई है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सरकार के इस कदम को ध्यान भटकाने वाला बताया है। आम आदमी पार्टी ने कहा कि जिस तरह से 28 पार्टियां एक साथ आई और तीसरी बार बैठक की, उससे केंद्र सरकार डरी हुई है। वे चुनाव पहले कराना चाहते हैं। जबकि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के नेता और संसदीय कार्य मंत्री प्रहलाद जोशी ने कहा कि अभी एक समिति का गठन किया गया है। समिति की रिपोर्ट आएगी, जिस पर चर्चा की जाएगी। संसद परिपक्व है, जहां चर्चा होगी। इसमें किसी को भी घबराने की जरूरत नहीं है। बहरहाल, ‘एक देश-एक चुनाव’ आसान नहीं है, लेकिन कठिन भी नहीं है। इसके लिए केंद्र सरकार को रायशुमारी बनानी होगी। सभी दलों को साथ लाना होगा। हालांकि शुरूआत में ही विरोध के स्वर तेज होने लगे हैं। कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी का समिति से अलग होना बताता है कि कांग्रेस इसके लिए तैयार नहीं है। हालांकि भाजपा हर-हाल में ‘एक देश-एक चुनाव’ चाहती हैं, क्योंकि उसे इसमें अपना राजनीतिक लाभ दिखाई दे रहा है। जिस तरह से एक-एक कर राज्यों में उसका जनाधार घट रहा है वह उसके लिए चिंता का विषय है। इस समय देश के करीब 14 राज्यों में विपक्षी दलों का कब्जा है। लोकसभा चुनाव में अच्छे प्रदर्शन के बावजूद विधानसभा चुनावों में उसे हार का सामना करना पड़ रहा है। कर्नाटक और हिमाचल इसके उदाहरण हैं। यदि एक साथ चुनाव होंगे तो राष्ट्रीय मुद्दे उभरेंगे और ‘मोदी फैक्टर’ बड़ी भूमिका निभाएगा। कुछ राज्यों में क्षेत्रीय दल भी भाजपा के लिए बड़ी बाधा है, वे भाजपा से सीधे टक्कर ले रहे हैं। तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश जैसे राज्य भाजपा के लिए मुफीद नहीं है। ऐसे में ‘एक देश-एक चुनाव’ का उसका फार्मूला उसके लिए कारगर साबित हो सकता है।
‘एक देश-एक चुनाव’ भाजपा के लिए ब्रह्मास्त्र साबित होगा?
