0 संजीव वर्मा
छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव की तैयारियां जोर पकड़ रही है। राजनीतिक दलों के साथ-साथ चुनाव आयोग भी चुनावी तैयारियों को लेकर लगातार बैठकें कर रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार, चुनाव आयुक्त अनूपचंद पांडेय और अरूण गोयल ने पिछले हफ्ते राज्य के सभी जिलों के कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, संभाग आयुक्तों व पुलिस रेंजों के महानिरीक्षकों के साथ बैठक कर जिलेवार समीक्षा की। बैठक में मुख्य चुनाव आयुक्त ने कड़े तेवर दिखाते हुए राज्य में शराब, ड्रग्स, नगदी और प्रीबीज के परिवहन पर कड़ी निगरानी के निर्देश दिए। आयोग ने वर्तमान में राज्य में चल रहे मतदाता सूची के द्वितीय विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण की प्रगति की जानकारी ली और निर्वाचन नामावली को शुद्ध व त्रुटि रहित बनाने पर जोर दिया। उन्होंने मतदाता सूची का पुनरीक्षण पूरी गंभीरता, सूक्ष्मता और सावधानी से करने को कहा। साथ ही इपिक कार्ड की प्रिटिंग और वितरण की भी जानकारी ली। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने का कार्य कलेक्टर स्वयं देखें और इसमें किसी प्रकार की गलती व लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। मुख्य चुनाव आयुक्त ने जिला कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों को निष्पक्षता के साथ निर्वाचन कार्य करने व सावधानी बरतने की हिदायत भी दी। आयोग ने बैठक में मतदान केंद्रों की व्यवस्था, ईव्हीएम और वीवी पैट की उपलब्धता, भंडारण, मानव संसाधन, वाहन तथा शिकायत निवारण प्रबंधन की भी समीक्षा की। दूसरी ओर, राजनीतिक दलों की सक्रियता भी तेज हो गई। मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने 21 प्रत्याशियों की सूची जारी कर जहां कांग्रेस से आगे निकल गई है, वहीं कांग्रेस की पहली सूची अगले महीने के पहले सप्ताह में आने की संभावना है। दोनों दलों ने आक्रामकता के साथ चुनाव मैदान में उतरने के संकेत दिए हैं। दोनों दल अपने-अपने चुनाव घोषणा पत्र बनाने में जुट गए हैं। देखना होगा इस बार चुनाव घोषणा पत्र में कौन-कौन से मुद्दे सामने आते हैं। जहां तक भाजपा का सवाल है तो वह ‘दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है’ की तर्ज पर इस बार कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहती। चुनाव घोषणा पत्र समिति के चेयरमैन बनाए गए विजय बघेल प्रदेश में घूम-घूम कर लोगों से राय ले रहे हैं। उन्हें आम जनता के गुस्से का भी सामना करना पड़ रहा है। जिस तरह से भाजपा की ओर से संकेत मिल रहे है तो उससे लगता है कि उसके केंद्र में किसान के साथ-साथ युवा और महिलाएं होगी। भाजपा चाहती है कि घोषणा-पत्र ऐसा बने, जिसमें कोई भी वर्ग न छूटे और सबको साथ लेकर चले, ताकि आम जनता के बीच सबका साथ-सबका विकास का उसका मूल मंत्र परिलक्षित हो। जबकि कांग्रेस के केंद्र में पिछले 5 सालों से गांव-गरीब और किसान ही रहे हैं। सत्ताधारी पार्टी होने के नाते उसकी ज्यादा जिम्मेदारी है। देखना होगा कि वह आम जनता को कैसे साधेगी। चुनाव घोषणा पत्र समिति के चेयरमैन बनाए गए मो. अकबर के नेतृत्व में बैठकों का दौर शुरू हो गया है। मंथन जारी है। प्रारंभिक संकेत तो यही मिल रहे हैं कि कांग्रेस भी अलग-अलग वर्गों से राय मशविरा करने के बाद घोषणा पत्र तैयार करेगी। वैसे जो खबरें मिल रही है, उसके अनुसार कांग्रेस की पांच गारंटियों पर जोर रहेगी। डायरेक्ट बेनिफिट योजनाओं पर फोकस करने के साथ ही, किसान, महिला और मध्यम वर्ग उसकी प्राथमिकता होगी। यानी कांग्रेस जिन मुद्दों को लेकर चल रही है, उसे आगे बढ़ाएगी। वैसे भी वह भाजपा के गाय, गोबर और राम को पहले ही छिन चुकी है। हिन्दुत्व अब राज्य में कोई बड़ा मुद्दा नहीं रह गया है। कांग्रेस ने जिस तरह से पिछले पांच साल में काम किया है, उससे भाजपा बेचैन है। उसे कुछ सूझ नहीं रहा है। कौशिल्या माता के मंदिर से लेकर राम वन गमन पथ का निर्माण कर कांग्रेस इस मुद्दे पर भाजपा से एक कदम आगे निकल चुकी है। शायद यही वजह है कि अब वे धर्मांतरण और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे उठा रही है। ईडी-आईटी राज्य में जिस तरह से काम कर रहे हैं, वह यह बताने के लिए काफी है कि भाजपा के पास फिलहाल ऐसा कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, जिससे वह कांग्रेस का मुकाबला कर सके। अब ईडी-आईटी के बहाने वह कांग्रेस को टारगेट पर ले रही है, लेकिन राज्य की जनता सब देख व समझ रही है। ऐसे में भाजपा के लिए राह आसान नहीं है। वैसे चुनाव किसी के लिए भी आसान नहीं होता। हर पार्टी के लिए चुनौती होती है। लेकिन भाजपा की कार्यप्रणाली को देखकर लगता है कि वह अब जनता के मुद्दों के बजाए ईडी-आईटी के भरोसे चुनावी वैतरणी पार करना चाहती है। कांग्रेस का तो यह स्पष्ट आरोप ही है कि छत्तीसगढ़ में अब भाजपा नहीं ईडी-आईटी चुनाव लड़ेगी। इसमें कितनी सच्चाई है यह भाजपा ही बता सकती है, बहरहाल, भाजपा अपने उद्देश्यों में कितनी सफल हो पाती है, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन होती है। यह नहीं भूलना चाहिए।