0 संजीव वर्मा
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता के सहारे कर्नाटक की चुनावी बैतरणी पार लगाने की भाजपा की कोशिश असफल रही। कहते हैं ‘कॉठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती’ यह कहावत सही साबित हुई और भाजपा का प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर वोट मांगना महंगा सौदा साबित हुआ। इतना ही नहीं अपितु इस बार भगवान बजरंगबली को भी चुनावी मैदान में उतार दिया गया। देश में हुए पिछ्ले चुनावों पर नजर डालें तो भारतीय जनता पार्टी हिंदू, हिंदुत्व और भगवान राम के नाम पर वोट की राजनीति करती रही है, लेकिन इस बार कर्नाटक के चुनाव में कांग्रेस ने किसी खास रणनीति के तहत बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने की बात कह दी। आनन-फानन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे चुनावी मुद्दा बना लिया। उन्होंने बजरंग दल को बजरंगबली से जोड़कर कांग्रेस पर तुष्टीकरण की राजनीति करने का आरोप लगा डाला। लेकिन फौरन ही कांग्रेस ने भी इसकी काट ढूंढ ली और पूरे कर्नाटक में बजरंगबली का मंदिर बनाने का ऐलान कर भाजपा से एक कदम आगे निकल गई। इस बार बजरंगबली ने कांग्रेस को निराश नहीं किया और उसकी चुनावी नैया पार लगवा दी। अब कर्नाटक के बाद कांग्रेस की नजर इस साल छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में होने वाले चुनावों पर है। उसे लगने लगा है कि बजरंगबली वहां भी उसका बेड़ा पार करेंगे। वैसे कर्नाटक में इस बार कांग्रेस की रणनीति भाजपा पर भारी पड़ी। कांग्रेस ने पूरा चुनाव स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित रखा और उसे इसमें आशातीत सफलता भी मिली। हिंदुत्व के घोड़े पर सवार भाजपा ने पूरी तरह स्थानीय मुद्दों से किनारे कर रखा था। वह हिमाचल में इसे आजमाकर देख चुकी थी, बावजूद सीख नहीं ली। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अब भाजपा आने वाले विधानसभा चुनावों में स्थानीय मुद्दों और स्थानीय नेताओं को तवज्जों देगी। लेकिन उसने तो राज्यों के कद्दावर नेताओं का कद पहले ही छोटा करना चालू कर दिया है। भले ही उसने ऐसा कर दिया हो लेकिन अब बदले हुए हालातों में उसे पुनर्विचार करना होगा। चूंकि विधानसभा और लोकसभा के चुनावी मुद्दे अलग-अलग होते हैं। विधानसभा के चुनाव में स्थानीय और लोकसभा के चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दे हावी होते हैं। राज्यों में स्थानीय मजबूत नेतृत्व का भी होना उतना ही जरूरी होता है, जितना राष्ट्रीय स्तर पर। कर्नाटक की बात करें तो भाजपा मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही थी। लेकिन उसका पूरा फोकस हिन्दुत्व और राष्ट्रीय मुद्दे पर था। चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 19 रैलियों को संबोधित किया और 6 रोड-शो कर भाजपा के चुनाव प्रचार को आक्रामक रुप दिया। उसके अलावा पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित कई शीर्ष नेताओं को चुनाव प्रचार में लगाया था। इसके विपरीत कांग्रेस ने स्थानीय मुद्दों के साथ मुख्यमंत्री बोम्मई को निशाने पर लिया और 40 प्रतिशत कमीशन सरकार का एक ऐसा विमर्श खड़ा किया, जो आम जनता को सीधे क्लिक कर गया । साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया और प्रदेश अध्यक्ष डी के शिवकुमार के इर्द-गिर्द चुनावी प्रचार को आगे बढ़ाया। राष्ट्रीय नेताओं में राहुल-प्रियंका ने अधिकतर चुनावी सभाओं को संबोधित किया। इसके अलावा कांग्रेस की मुफ्त बिजली, चावल और बेरोजगारी भत्ता देने सहित पांच गारंटी ने भी मतदाताओं को अपनी ओर रिझाया। उसने अपनी इस रणनीति से भाजपा की कल्याणकारी योजनाओं और हिन्दुत्व की रणनीति की धार को कुंद कर दिया। साथ ही राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व को भी श्रेय दिया जाना चाहिए। कर्नाटक के गृह राज्य होने के कारण उनके उपर दोहरी जिम्मेदारी थी, जिन्हें निभाने में वे पूरी तरह सफल रहे। यह जीत इस मायने में भी अहम है कि करीब चार दशक बाद कांग्रेस के किसी राष्ट्रीय अध्यक्ष के गृह राज्य में पार्टी ने विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की है। अध्यक्ष बनने के बाद खड़गे के लिए यह चुनाव किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। इससे पहले 1985 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कांग्रेेस अध्यक्ष रहते हुए पार्टी को उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत मिली थी। बहरहाल, पिछले एक साल के अंदर ये दूसरा राज्य है, जिसकी सत्ता भाजपा के हाथ से कांग्रेस ने छीन ली है। इसका बड़ा सियासी मतलब निकाला जा रहा है। कांग्रेस की जीत न सिर्फ उसके सियासी रसूख को बढ़ाने वाली है बल्कि अगले साल होने वाले लोकसभा के चुनाव में उसकी उम्मीदों तथा विपक्षी एकजुटता की पूरी कवायद में उनकी हैसियत को ताकत देने वाली भी है। माना जा रहा है कि कांग्रेस की इस जीत से इस साल के आखिर में होने वाले 5 राज्यों छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, मिजोरम और तेलंगाना के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की संभावना को बल मिल सकता है। इसके अलावा लोकसभा चुनाव के बाद सात अन्य राज्यों में भी चुनाव होने हैं। कुल मिलाकर अगले दो सालों में लोकसभा के साथ-साथ 13 बड़े राज्यों के चुनाव होने हैं। इनमें कई दक्षिण के राज्य हैं। इसलिए भाजपा के लिए कर्नाटक की हार को बड़ा झटका माना जा रहा है। वहीं, मुश्किलों में घिरी कांग्रेस के लिए यह संजीवनी साबित हुई है।