0 संजीव वर्मा
भारत की आबादी को लेकर सोशल मीडिया में चर्चाओं का बाजार गर्म है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी आंकड़ों से पता चला कि चीन को पछाड़कर भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन गया है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार चीन की 142.57 करोड़ आबादी की तुलना में भारत की जनसंख्या 142.86 करोड़ है। इसके बाद आकलन किए जा रहे हैं कि यह विशाल आबादी भारत के लिए अभिशाप साबित होगी या वरदान। लाख टके का यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या अब भारत चीन की अर्थव्यवस्था को भी पीछे छोड़ देगा? दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश भारत फिलहाल दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी बन चुका है। अधिक जनसंख्या के अपने कई फायदे हैं। भारत की अधिकांश आबादी युवा है। एक अनुमान के अनुसार लगभग एक चौथाई आबादी के 15 से 25 वर्ष के आयु वर्ग में होने के आधार पर माना जा रहा है कि यह कामकाजी आबादी भारत के लिए वरदान साबित होगी, जिससे अर्थव्यवस्था ऊंची उड़ान भरने में सफल रहेगी। इस मामले में चीन का उदाहरण दिया जा रहा है, जिसने अपनी विशाल आाबादी का उपयोग कर स्वयं को अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों में शामिल कर लिया। हालांकि जनसंख्या विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत के संदर्भ में मामला इतना सीधा नहीं है। चीन ने जिस दौर में अपनी आबादी को अर्थव्यवस्था का आधार बनाया, तब उसके सामने आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) जैसी तकनीक का खतरा नहीं था, जो एक झटके में विश्व के सभी हिस्सों में नौकरियों के खत्म होने का खतरा पैदा कर रहा था। उसने अपनी आबादी को घरेलू उपयोग के छोटे-छोटे पदार्थों के उत्पादन में लगाया जो उसकी ताकत बने। लेकिन, भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में उस तरह की नीतियों को बना कर लागू करना और उसे अंजाम तक पहुंचाना आसान नहीं है। इसके अलावा पलायन भी एक बड़ी समस्या है। हमारे देश में केवल तकनीकी दक्ष युवाओं का ही पलायन नहीं हो रहा है, बल्कि हमारी पूंजी का भी पलायन हो रहा है। एक अनुमान के मुताबिक कोरोना काल से अब तक 10 लाख से अधिक लोगों ने देश छोड़कर दूसरे देशों में नागरिकता लेने की कोशिश की है। दरअसल ऐसे लोग आर्थिक तौर पर सक्षम होते हैं। ऐसे में इनके पलायन से पूंजी का भी पलायन होता है। यदि ये लोग देश में ही पूंजी लगाते तो रोजगार के अवसर पैदा होते, लेकिन उनके विदेश चले जाने से अवसर समाप्त हो जाता है। ऐसे में सफल लोगों की आबादी के बाहर जाने से देश में गरीबों की संख्या बढ़ेगी, जो बेकारी और गरीबी को बढ़ाने में सहायक होगी। ऐसे में यह कहना कि आबादी बढ़ने से अर्थव्यवस्था में सुधार हो, यह जरूरी नहीं है। वैसे भारत के साथ अपनी आबादी का सही इस्तेमाल करने का मौका है। अधिक आबादी को अधिक रोजगार चाहिए। शक्तिशाली अर्थव्यवस्था के लिए अधिक नौकरियां देनी होगी। फिलहाल भारत का बुनियादी ढांचा पहले की तुलना में तेज गति से बेहतर हुआ है। लेकिन यह चीन से पीछे है, जो विदेशी निवेश में बाधक है। एक और बड़ी समस्या यह है कि पांच में से केवल एक भारतीय महिला औपचारिक वर्क फोर्स का हिस्सा है। देश की करोड़ों युवा महिलाओं की आकांक्षाओं को दबाने के अलावा उन्हें औपचारिक नौकरियों से बाहर रखना भी अर्थव्यवस्था पर अंकुश लगाने का काम करता है। बहरहाल, जनसंख्या के मामले में भारत भले ही चीन से आगे निकल गया है, लेकिन आर्थिक पैमाने के लिहाज से भारत, चीन से काफी पीछे है। चीन की अर्थव्यवस्था भारत से पांच गुना बड़ी है। भारत में बेरोजगारी दर 7 फीसदी के करीब है, जबकि चीन में ये 5 प्रतिशत से भी कम है। भारत के सामने बड़ी समस्या तेजी से वर्क फोर्स में शामिल युवा आबादी को रोजगार मुहैया कराने की है। लिहाजा, यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि भारत की बड़ी आबादी दोधारी तलवार के समान है। उसका फायदा उठाने के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने होंगे और उसके लिए निवेश को आकर्षित करना होगा।
