आपकी बात: उचित नहीं समलैंगिक विवाह विवाद!

0 संजीव वर्मा
            देश की सर्वोच्च अदालत में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने को लेकर सुनवाई जारी है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने इससे जुड़ी याचिकाओं को संविधान पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है। 5 जजों की पीठ इस मामले पर अब 18 जुलाई को सुनवाई करेगी। चूंकि मामला अदालत में है, लिहाजा इस पर ज्यादा टीका-टिप्पणी उचित नहीं है। लेकिन समलैंगिक विवाह को लेकर कुछ लोगों द्वारा जिस तरह से माहौल बनाया जा रहा है, वह उचित नहीं है। निश्चित रूप से यह भारतीय संस्कृति के खिलाफ है। बहुसंख्यक आबादी इसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं करेगी। हालांकि यह भी सच है कि हमारे संविधान में किसी भी व्यक्ति को, जो वयस्क है, उन्हें अपनी स्वेच्छानुसार शादी करने की स्वतंत्रता है। उसे गैरकानूनी नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन मान्यता देकर उसे कानूनन रूप देना एक सभ्य समाज में उचित नहीं है। यह प्रकृति के भी खिलाफ है। पूरे इतिहास में समलैंगिक शादी को आदर्श के रूप में नहीं देखा जाता। सामाजिक महत्व को देखते हुए केवल महिला और पुरुष की शादी को ही मान्यता दिया जाना चाहिए। इस बीच केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय में हलफनामा दाखिल कर समलैंगिक विवाह का विरोध किया है। केंद्र ने कहा है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के जरिए इसे वैध करार दिए जाने के बावजूद, याचिकाकर्ता देश के कानूनों के तहत समलैंगिक विवाह के लिए मौलिक अधिकार का दावा नहीं कर सकते हैं। उसने कहा कि विवाह कानून की एक संस्था के रूप में, विभिन्न विधायी अधिनियमों के तहत कई वैधानिक परिणाम हैं। इसलिए ऐसे मानवीय संबंधों की किसी भी औपचारिक मान्यता को दो वयस्कों के बीच केवल गोपनीयता का मुद्दा नहीं माना जा सकता है। केंद्र ने यह भी कहा कि भारतीय लोकाचार के आधार पर ऐसी सामाजिक नैतिकता और सार्वजनिक स्वीकृति का न्याय करना और उसे लागू करना विधायिका का काम है। उसने कहा कि भारतीय संवैधानिक कानून न्यायशास्त्र में किसी भी आधार के बिना पश्चिमी निर्णयों को इस संदर्भ में आयात नहीं किया जा सकता। समलैंगिक व्यक्तियों के बीच विवाह को न तो किसी असंहिताबद्ध कानूनों या किसी संहिताबद्ध वैधानिक कानूनों में मान्यता दी जाती है और न ही इसे स्वीकार किया जाता है। दरअसल विवाह अपोजिट सेक्स के दो लोगों का मिलन है। इसे विवादित प्रावधानों के जरिए तहस-नहस नहीं किया जाना चाहिए। भारत में परिवार का मतलब महिला और पुरुष के संबंध और उनसे पैदा हुए संतानों से है। इसकी तुलना समलैंगिक संबंध और उनके साथ रहने से नहीं की जा सकती। कानून में उल्लेख के मुताबिक भी समलैंगिक विवाह को मान्यता नहीं दी जा सकती क्योंकि उसमें पति और पत्नी की परिभाषा जैविक तौर पर दी गई है। उसी के मुताबिक दोनों के कानूनी अधिकार भी है। समलैंगिक विवाह में विवाद की स्थिति में पति और पत्नी को कैसे अलग-अलग माना जा सकेगा? वैसे केंद्र सरकार ने अपने हलफनामा में यह भी कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अधीन है। इसे देश के कानूनों के तहत मान्यता प्राप्त करने के वास्ते समलैंगिक विवाह के मौलिक अधिकार को शामिल करने के लिए विस्तारित नहीं किया जा सकता है, जो वास्तव में इसके विपरीत है। बहरहाल, समलैंगिक विवाह को मान्यता देने से व्यक्तिगत कानूनों और स्वीकार्य सामाजिक मूल्यों में संतुलन भी प्रभावित होगा। अब सारा दारोमदार न्यायालय पर है। उनका निर्णय ही अंतिम और सर्वमान्य होगा। लेकिन सामान्यत: भारतीय संस्कृति और परंपरा में एक शादी के लिए पति के तौर पर पुरुष और पत्नी के तौर पर एक महिला जरूरी है और उनके बीच संबंध से पैदा हुई संतानें मिलकर परिवार कहलाते हैं और परिवार का मामला पहचान से कहीं परे की चीज है। इसका समलैंगिक संबंधों से हुई शादी के रजिस्ट्रेशन से कोई मतलब नहीं है।