आपकी बात: राष्ट्रवाद की आड़ ले रहे अडानी?

 0 संजीव वर्मा
 देश में इन दिनों सबसे बड़े उद्योगपति और दुनिया के बड़े रईसों में शुमार गौतम अडानी चर्चा में हैं। चर्चा इसलिए नहीं हो रही कि उन्होंने कोई बड़े काम किए हों बल्कि चर्चा इसलिए हो रही है कि अमरीका की एक शॉर्ट सेलिंग इकाई ने उन पर फ्रॉड का आरोप लगाया है। यह ऐसा आरोप है कि एक दिन में ही अडानी अर्श से फर्श पर आ गए। इसकी गूंज भारत ही नहीं पूरी दुनिया में हो रही है। भारत में तो सड़क से लेकर सदन तक गरम है। विपक्ष सरकार पर पिल पड़ा है। यह लाजिमी भी है। अडानी पर मोदी सरकार का वरदहस्त माना जाता है। यह हम नहीं कह रहे बल्कि वर्षों से यही चर्चा में है। इसमें कितनी सच्चाई है यह तो मोदी सरकार के  नुमाइंदे या अडानी के लोग ही बता पाएंगे। लेकिन जिस तरह से हाल-फिलहाल अडानी को बचाने के लिए सरकार के लोग सामने आ रहे हैं, उससे यह साबित हो गया कि कहीं न कहीं अडानी और मोदी सरकार में सद्दी-बद्दी का खेल है। दरअसल अमरीका की फाइनेंशियल रिसर्च फर्म हिंडनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में भारतीय कारोबारी गौतम अडानी की अगुवाई वाले समूह पर ‘खुले तौर पर शेयरों में गड़बड़ी और लेखा धोखाधड़ी’ में शामिल होने का आरोप लगाया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अडानी ग्रुप के उपर बहुत ज्यादा कर्ज है, जिसके कारण उनकी कंपनियों पर संदेह की स्थिति है। आरोप ये भी है कि अडानी ग्रुप ने टैक्स हैवन कहे जाने वाले देशों का गलत तरीके से इस्तेमाल किया और शेयरों की कीमतों को मैनिपुलेट किया। यह रिपोर्ट पिछले महीने 27 जनवरी को जारी की गई। इसके बाद पूरी दुनिया में कोहराम मच गया। अडानी के शेयर धराशायी होने लगे। कहा जा रहा है कि पिछले दस-बारह दिनों में अडानी ग्रुप की कंपनियों का मार्केट कैपिटल गिरकर 217 बिलियन डॉलर से घटकर 100 से भी नीचे आ गया है। इसका मतलब यह हुआ कि अडानी समूह को 11-12 दिनों में ही करीब 120 बिलियन डॉलर का नुकसान हो चुका है। अडानी ने हिंडनबर्ग के आरोपों को भारत, उसकी संस्थाओं और विकास की गाथा पर सुनियोजित हमला बताते हुए कहा कि यह झूठ के सिवाय कुछ भी नहीं है। वहीं, हिंडनबर्ग ने अडानी समूह के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि धोखाधड़ी को राष्ट्रवाद या कुछ बढ़ा-चढ़ाकर प्रतिक्रिया से ढंका नहीं जा सकता है। हमारा भी मानना है कि इस तरह की धोखाधड़ी के आरोपों पर जांच का सामना करने के बजाए ‘राष्ट्रवाद’ के नाम पर इसे ढंकने का प्रयास उचित नहीं है। अडानी समूह को जांच का सामना करना चाहिए। समूह में आम जनता का पैसा लगा हुआ है। देश की सार्वजनिक संस्थाओं स्टेट बैंक और एलआईसी के अरबों-खरबों रुपए के डूबने की आशंका जताई जा रही है। देश की सर्वोच्च पंचायत संसद में भी इस पर हंगामा बरपा हुआ है। कार्रवाई लगातार बाधित है। सरकार चर्चा से भाग रही है। विपक्ष ने संसदीय समिति (जेपीसी) या फिर सुप्रीम कोर्ट के जजों से जांच कराए जाने की मांग की है। सरकार जांच कराने को लेकर टाल-मटोल कर रही है। यदि सरकार निष्पक्ष है तो उसे तुरंत जांच की घोषणा करनी चाहिए। वैसे भी विपक्ष पिछले कई सालों से आरोप लगा रहा है कि अडानी समूह को सरकार का गैरजरूरी समर्थन मिल रहा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार कह रहे हैं कि मोदी सरकार, अंबानी और अडानी जैसे पूंजीपति मित्रों के लिए काम करने वाली सरकार है। अब इस घटना के बाद सरकार के रवैये से राहुल की बात सच होती दिख रही है। ऊपर से अडानी की धोखाधड़ी को राष्ट्रवाद से ढंकने की कोशिश अच्छा संकेत नहीं है। कोई भी गैरकानूनी काम को राष्ट्र के नाम पर उचित नहीं ठहराया जा सकता। किसी भी रिपोर्ट का जवाब देना या उसे खारिज करना तो ठीक है। लेकिन अपने उपर लगे आरोपों को देश के खिलाफ साजिश करार देना बेहद बचकाना हरकत है। केंद्र सरकार को भी चाहिए कि वह अडानी समूह के इस बयान को संज्ञान में लेते हुए उससे दूरी बनाए और आरोपों की जांच का आदेश दे, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। राष्ट्रवाद के नाम पर देश को भ्रमित करना अपराध है। इसकी आड़ में किसी को भी मनमानी करने की छूट नहीं दी जा सकती। वैसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की 2014 में सरकार आने के बाद केंद्र सरकार ऐसी सभी रिपोर्टों को खारिज करने का रवैया अपनाती है, जिनमें भारत की रैकिंग गिर जाती है। इन रिपोर्टों में प्रेस फ्रीडम की रैकिंग, हंगर इंडेक्स और नागरिक अधिकारों के उल्लंघन को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्वतंत्र एजेंसियों, संगठनों या विदेशी संस्थाओं की रिपोर्ट शामिल है। ऐसी रिपोर्टों को खारिज करने के दौरान सरकार पहले तो आंकड़ों पर सवाल उठाती है और फिर कहती है कि यह देश की छवि को धूमिल करने का प्रयास है। सरकार ऐसी रिपोर्टों को देश के खिलाफ साजिश तक बताने से नहीं चूकती है। ठीक ऐसा ही रवैया मोदी और उनकी सरकार के करीबी गौतम अडानी ने अपनाया है।