27 जुलाई तुलसीदास जयंती…
विश्व को सर्वमंगल के लक्ष्य की ओर ले जाने में अहम भूमिका……..
भारतीय संस्कृति के विश्वकोश के रूप में हम गोस्वामी तुलसीदास के साहित्य को बड़ी धरोहर मान सकते हैं । गोस्वामी जी के साहित्य में समग्र साहित्य का लौकिक तथा आध्यात्मिक दर्शन प्राप्त होता है ।आर्थिक
विपन्नता के महाकष्ट में जीवन जीने वाले तुलसीदास जी ने अपने जीवनकाल में कष्टों को वह आईना दिखाया कि संपन्नता रूपी लक्ष्मी को भी उन्हें अंगीकृत करने विवश होना पड़ा । एक ओर जहाँ समाज ने उन्हें तिरष्कृत किया वहीं दूसरी ओर उनके ज्ञान के भंडार ने उन्हें आगे चलकर सर्वोच्च सम्मान का अधिकारी भी बना दिया । गृहस्थ जीवन में कदम रखने और उसमें आखण्ड डूब जाने की लालसा के बाद वे परम विरागी संत भी बन पाए । हिंदी साहित्य और हिन्दू धर्म के इतिहास में गोस्वामी तुलसीदास जी का व्यक्तित्व अप्रतिम है । उनकी वाणी की अभिव्यक्ति भारतीय धर्म, दर्शन और कला के अद्भुत संयोजन से रची- बसी है । उनकी साहित्य की अभिव्यक्ति तथा धर्म की विवेचना को अनास्था की सरिता में आस्था का समुद्र कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । उनके द्वारा रचित समस्त ग्रंथों में स्वान्तः सुखाय का उद्देश्य स्पष्ट झलकता है ।मोह- भ्रम के निवारण के साथ ही जन- कल्याण , लोकमंगल और जनमोह का निवारण भी उनके ग्रंथ के विषय रहे हैं ।तुलसीदास जी ने कभी भी खुद की विद्वता पर गर्व नहीं किया अपितु इन शब्दों में स्वयम को अज्ञानी ही बताया है —

” कवि न होऊं नहिं बचन प्रबीनू ।
सकल कला सब विद्या हिनू ।।”
भगवान वाल्मीकि की अनूठी रचना ” रामायण ” को आधार मानकर गोस्वामी तुलसीदास जी ने लोकभाषा में रामकथा की मंदाकिनी इस प्रकार प्रवाहित की, कि आज मानव जाति उस ज्ञान मंदाकिनी में गोते लगाकर खुद को धन्य मान रही है । गोस्वामी जी का मानना है कि इंसान जिस संगति में रहेगा उसका आचरण, व्यवहार तथा व्यक्तित्व भी वैसा ही होगा ।संगत का प्रभाव देर- सबेर प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष रूप से चेतन व अचेतन मन पर अवश्य पड़ता है । यही कारण है कि वे कहा करते थे कि हमें मित्र बनाने से पूर्व काफी चिंतन और मनन की जरूरत महसूस करनी चाहिए । इस मामले में वे सत्संग की महिमा को काफी प्रभावी मानते रहे हैं । यह सर्व विदित है कि सत्संग के प्रभाव से कौआ कोयल बन जाता है तथा बगुला हंस । इसी संबंध में उन्होनें स्पष्ट करते हुए लिखा है —
” बिनु सत्संग बिबेक न होई ।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ।।
गोस्वामी जी का यह भी मानना था कि संतों का संग किये बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो पाती । यह हमें तभी मिल पता है जब ईश्वर की कृपा हम पर बनी रहे । संसार रूपी वृक्ष में यदि फल हैं तो वह सत्संग ही है । उस वृक्ष की कोई उपयोगिता नहीं जिसमें फूल तो लगते हैं , किन्तु फल नहीं । फल से ही उदर पूर्ति संभव है न कि पुष्प से । उन्होंने कहा है कि एक संत अमृत की धारा से कम नहीं है जब कि संतों के विपरीत आचरण अथवा असन्त विचारधारा वाले मदिरा की शाला के समान हैं ।
भारतवर्ष की संस्कृति ऋषि और कृषि प्रधान रही है । समग्र प्राणियों में ईश्वर के दर्शन करने तथा उनके भाव से संबंध बनाए रखने के कारण ही हमारा विश्व बंधुत्व का संदेश आज भी अजर- अमर है ।तुलसीदास जी ने रामचरित मानस के रूप में एक उच्च कोटि के काव्य की रचना की तो दूसरी ओर विनय पत्रिका, गीतावली दोहावली ,कवितावली, श्री कृष्ण गीतावली जैसे उत्कृष्ट साहित्य भी उनके द्वारा रचित रहे हैं । रामचरित मानस की कथा कहीं भी बोझिल नहीं होती न ही असम्भाव्य प्रतीत होती है । गोस्वामी तुलसीदास ने रामभक्ति के द्वारा न केवल अपना जीवन कृतार्थ किया वरन समूची मानव जाति को श्री राम के आदर्शों से जोड़ दिया । आज भारतवर्ष ही नहीं अखिल विश्व में श्री राम का चरित्र उन लोगों के लिए आदर्श बन चुका है जो समाज में मर्यादित जीवन का शंखनाद करना चाहते हैं । रामभक्ति धारा को प्रवाहित करने वाले तुलसीदास जी आज स्वयं राम भक्ति के पर्याय बन गए हैं । वास्तव में चिबतान किया जाए तो तुलसी प्रणीत रामचरित मानस भारतीय समाज को ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व को ” सत्यम, शिवम, सुंदरम ” से पूर्ण सर्वमंगल के लक्ष्य की ओर अग्रसर करने में समर्थ है । साहित्य और धर्म पर उनका योगदान इतना फलीभूत रहा कि गोस्वामी जी अपने जीवन काल में ही वाल्मीकि जी के अवतार माने जाने लगे थे ।
काव्य के विषय में गोस्वामी तुलसीदास जी का मानना है कि सच्ची कविता वही है जो कवि के हृदय से निकलकर पाठक हृदय को आल्हादित कर दे । तुलसीदास जी में व्यापक प्रतिभा और अप्रतिम काव्य दृष्टि विद्यमान थी । उनमें शक्ति , निपुणता और अभ्यास का सुंदरतम सामंजस्य देखने को मिलता है। गोस्वामी जी के समय तक संस्कृत अलंकार प्रधान चमत्कारों से बोझिल हो गयी थी और उसका दायरा समाज के उच्च वर्ग तक सिकुड़ गया था ,जिसे उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से नया जीवन प्रदान किया । यदि सारांश अथवा निष्कर्ष के तौर पर देखा जाए तो तुलसीदास जी के अंदर प्रबंध रचना की अद्भुत प्रतिभा विद्यमान थी । धार्मिकता और मजहबीपन से ऊपर तुलसीदास जी ने मर्यादावाद को अपनी लेखनी का श्रृंगार बनाया । तुलसीदास के श्री राम ने निषादराज को अपना मित्र बनाते हुए तथा शबरी के जूठे बेर को ख़ाकर उनके मर्यादावाद का स्पष्ट प्रमाण भी दे दिया । अंत में यही कहा जा सकता है कि तुलसीदास जी अपने समय के महान समन्वयवादी संत थे । वे आत्ममुग्धता की प्रवृत्ति से से आजीवन अछूते रहे । सदैव स्वान्तः सुखाए की पृष्ठभूमि में जननेता की भूमिका का उन्होंने निर्वाह किया ।
डॉ. सूर्यकान्त मिश्रा
( चंद्राश्रय कुंज )
न्यू खंडेलवाल कॉलोनी, ममता नगर राजनांदगाँव (छ. ग. )