O संजीव वर्मा
देश में भले ही दो राज्यों और एक दिल्ली नगर निगम के साथ 5 राज्यों छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, बिहार, ओडिशा और राजस्थान में उपचुनाव हुए हों, लेकिन चर्चा सिर्फ गुजरात की हो रही है। ऐसा क्यों? भाजपा ने गुजरात तो जीता है, लेकिन दो चुनाव भी हारे हैं तो फिर उनकी चर्चा क्यों नहीं। आखिर अन्य राज्यों में हुए चुनाव परिणाम पर इतना सन्नाटा क्यों? देश के बड़े-बड़े मीडिया समूह के चुनावी डिबेट भी गुजरात पर ही केंद्रित रहे हैं। चुनाव परिणाम के पहले बड़े जोर-शोर से प्रचारित और प्रसारित किए जा रहे थे, कि इस बार का चुनाव परिणाम 2024 लोकसभा की दशा और दिशा तय करेगी। तो क्या इन चुनावों से यह मान लिया जाए कि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा की स्थिति उतनी मजबूत नहीं है, जितनी पिछले लोकसभा चुनाव में थी। गुजरात चुनाव के परिणाम पर पूरे देश के परिणाम को आंकना भूल साबित होगी ,क्योंकि हिमाचल में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा और दिल्ली में तो उसे नगर निगम से भी बेदखल होना पड़ा, जहां वह 15 साल से सत्ता में थी। ऐसे में ये संकेत क्या बताते हैं। हम यह नहीं कह रहे कि गुजरात की जीत छोटी है, बल्कि यह कह रहे हैं कि 27 साल तक सत्ता में रहने के बाद प्रचंड बहुमत से जीत ऐतिहासिक है और उसे उसका श्रेय दिया जाना चाहिए। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि दूसरे छोटे राज्यों के चुनाव परिणाम की अनदेखी हो। हिमाचल में कांग्रेस की जीत को कम नहीं आंका जा सकता। भाजपा की वहां 18 सीटें ही कम नहीं हुई है बल्कि उसका वोट प्रतिशत भी घटा है। हिमाचल में कांग्रेस ने पूरा चुनाव प्रदेश के ज्वलंत मुद्दों पर लड़ा। कहीं भी राष्ट्रीय मुद्दे दिखाई नहीं दिए। खासकर पुरानी पेंशन योजना की बहाली ने कर्मचारियों को खासा प्रभावित किया। इससे पहले कांग्रेस की छत्तीसगढ़ और राजस्थान की सरकार ने इस योजना को अपने-अपने राज्यों में लागू किया था। शायद यही वजह है कि हिमाचल की जनता ने कांग्रेस के वादों पर भरोसा जताया। इसके अलावा कांग्रेस ने पूरे चुनाव के दौरान एकजुटता दिखाई। कांग्रेस की शीर्ष नेता प्रियंका गांधी और मुख्य पर्यवेक्षक बनाए गए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने वहां जमकर पसीना बहाया। उन्होंने छत्तीसगढ़ मॉडल की बात की, जिसे जनता ने सहर्ष स्वीकारा। आगामी चुनावों में यदि कांग्रेस छत्तीसगढ़ को मॉडल राज्य के रूप में पेश करे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं। वैसे भी आजकल छत्तीसगढ़ की योजनाएं जो गांव-गरीब और किसानों पर केंद्रित हैं, पूरे देश में चर्चा का विषय है। खासकर राजीव गांधी किसान न्याय योजना, राजीव गांधी भूमिहीन कृषि मजदूर न्याय योजना, गोधन न्याय योजना और सुराजी गांव योजना ने पूरे देश का ध्यान खींचा है। इन योजनाओं ने राज्य में खेती-किसानी को मजबूती दी है। बहरहाल, बात चुनाव परिणाम की हो रही है। दिल्ली नगर निगम में भी भाजपा की हार हुई है। वहां आम आदमी पार्टी ने जीत हासिल की है। उपचुनाव में भी विपक्ष को आशातीत सफलता मिली है। यानी भाजपा दो जगह सत्ता गंवाकर एक राज्य में जीत हासिल की है। यदि गुजरात की जीत का श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दिया जा रहा है, तो हिमाचल और दिल्ली की हार के लिए जिम्मेदार कौन हैं? यह बड़ा सवाल है। भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा को हिमाचल के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जो उनका गृह राज्य है। लेकिन दिल्ली तो सबकी है। राष्ट्रीय राजधानी है। दिल्ली नगर निगम चुनाव को विधानसभा चुनाव से कमतर नहीं आंका जा सकता। ऐसे में किसी न किसी को जवाबदेही तो लेनी होगी। वैसे गुजरात में कांग्रेस को भी हार से सबक लेनी होगी। राज्य में उसकी अब तक की यह सबसे बड़ी हार है। उसे नए सिरे इस इस पर आत्ममंथन करना होगा। फिलहाल देश में महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी से त्रस्त जनता को राहत की उम्मीद है। ‘चुनाव खत्म तो वादे खत्म’ के चरित्र से राजनेताओं को बाहर निकलकर जनता के हित में सार्थक कदम उठाए जाने की जरूरत है। अब अगले साल छत्तीसगढ़, मप्र और राजस्थान जैसे राज्यों में विधानसभा के चुनाव हैं। उसके बाद लोकसभा के चुनाव होने हैं। ऐसे में सभी दलों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में जनता ही भाग्य विधाता है। जब चाहे वह किसी को भी गद्दी से उतार सकती है। यह चुनाव सभी पार्टियों को जहां कुछ न कुछ दिया है तो अच्छा खासा सबक भी दे गया है।
