O संजीव वर्मा
छत्तीसगढ़ भाजपा की राजनीति में इन दिनों बदलाव की बयार चल रही है। एक-एक कर प्रदेश संगठन के महत्वपूर्ण पदों पर बदलाव हो रहे है। पहले प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय बदले गए अब नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक बदल दिए गए। आगे भी संगठन में आमूलचूल परिवर्तन के संकेत मिल रहे हैं। अब ये कब होगा, यह बताना अभी संभव नहीं है। लेकिन यह तय है। दरअसल 15 साल तक सत्ता में रहने के बाद पिछले विधानसभा चुनावों में 15 सीटों पर सिमटने वाली भाजपा की फिलहाल ऐसी स्थिति नहीं बन पाई है कि वह अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में सत्ता में वापसी कर सके। वह पिछला विधानसभा चुनाव हारने के बाद से लगातार हाशिए पर है। नगरीय निकाय, पंचायतों के बाद उपचुनाव में भी उसे हार का सामना करना पड़ा था। शायद यही वजह है कि केन्द्रीय नेतृत्व ‘सब कुछ बदल डालूंगा’ की तर्ज पर ‘ऑपरेशन छत्तीसगढ़’ में लगा हुआ है। उसका नतीजा यह हुआ कि पहली गाज आदिवासी नेता विष्णुदेव साय पर गिरी। उनकी जगह साहू समाज से अरूण साव को प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया। वहीं, नए नेता प्रतिपक्ष के रूप में नारायण चंदेल की ताजपेशी हुई। इन दोनों नेताओं की नियुक्ति से लगता है कि भाजपा आलाकमान का राज्य के शीर्ष नेताओं से भरोसा उठ गया है। वह प्रदेश में भाजपा को पुन: सत्ता में लाने की जिम्मेदारी संघ की तिकड़ी राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री शिवप्रकाश, क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल के साथ भाजपा के नवनियुक्त प्रदेशाध्यक्ष अरूण साव को सौंपी है। नए नेता प्रतिपक्ष नारायण चंदेल का भी संघ से गहरा नाता है। अब भाजपा इनके भरोसे 2023 में चुनावी बैरतणी पार लगाना चाहती है। वैसे भाजपा में 2018 के चुनाव हारने के बाद से ही गुटबाजी चरम पर है। प्रदेश नेतृत्व पर लगातार ऊंगली उठती रही है। जमीनी स्तर के कार्यकर्ता भी नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। यह केन्द्रीय नेतृत्व समझ भी रहा था। यही वजह था कि एक साल पहले ही राष्ट्रीय सहसंगठन महामंत्री सौदान सिंह को हटाकर शिवप्रकाश को कमान सौंपी गई। फिर प्रदेश प्रभारी अनिल जैन की जगह डी. पुरंदेश्वारी की नियुक्ति की गई। एक सहप्रभारी नितिन नबीन को बनाया गया, ताकि स्थिति में सुधार हो सके। लेकिन यह कवायद ‘ढाक के तीन पॉत’ ही साबित हुआ। सब कुछ वैसा ही चलता रहा जैसे पहले चल रहा था। 15 साल सत्ता की मलाई खाने वाले हावी थे। नेता कई गुटों में बंटे हुए थे। इससे संगठन भी अस्त-व्यस्त दिखने लगा था। आलाकमान तक यह बात पहुंची तब ‘आमूलचूल परिवर्तन’ के फार्मूले पर काम शुरू हुआ। प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष बदले जाने के बाद अब प्रदेश संगठन में महामंत्रियों की बारी है। फिर जिला अध्यक्षों को भी बदला जा सकता है। मोर्चा-प्रकोष्ठों में भी बदलाव संभव है। बदलाव को लेकर पार्टी में मंथन जारी है। इससे प्रदेश से लेकर जिला संगठन के नेताओं में उथल-पुथल मचा हुआ है। लेकिन लाख टके का सवाल है कि क्या इस कवायद से भाजपा की सत्ता में वापसी संभव है? फिलहाल तो स्थिति विपरीत है। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के दम पर सत्ता वापसी की कोशिशें भी जारी है। कवर्धा में कुछ महीने पहले टेलर भी दिखाया गया था। लेकिन छत्तीसगढ़ की जनता जाति-धर्म, संप्रदाय से परे है। ऐसे में भाजपा की मुश्किलें कम होती नजर नहीं आ रही है। राज्य में भूपेश बघेल की सरकार जिस ढंग से काम कर रही है। भाजपा के पास हाल-फिलहाल उसका काट नहीं है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आगे वह भूपेश सरकार को घेरने क्या रणनीति अपनाती है। वैसे कांग्रेस अभी से ही चुनावी मूड में आ चुकी है। मुख्यमंत्री कह चुके हैं कि वे अपनी सरकार की उपलब्यिों के दम पर चुनाव लड़ेंगे। ऐसे में अब भाजपा को बताना होगा कि वह किसके दम पर चुनाव लड़ेगी।
आपकी बात: ‘सब कुछ बदल कर ही लूंगा दम’
