उमेश त्रिवेदी
राजस्थान के सियासी संघर्ष में सचिन पायलट के ट्वीट के जरिए राजनीति में उभरे सच-झूठ के सवालों का जवाब प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कुछ नए सवाल उठाकर दिया है। वैसे भाजपा व्दारा प्रायोजित तख्ता पलट के इस खेल में नीति-अनीति और राजनीतिक आचार-व्यवहार से जुड़े मुद्दों का कोई महत्व नहीं है। वैसे भी ये सवाल तख्ता पलट के परिणामों को प्रभावित करने में कतई समर्थ नहीं है। फिर भी सार्वजनिक-विमर्श में ऐसे सवालों का अस्तित्व बना रहना चाहिए, ताकि सत्ता की कुत्सित कुटिलताओं की साजिशों में नीति-अनीति बिल्कुल ही ओझल नहीं हो जाए। सचिन पायलट ने मंगलवार को ट्वीट किया था कि ‘सत्य को परेशान किया जा सकता है, पराजित नहीं’। सचिन ने खुलासा किया है कि उनका ‘सत्य‘ उनका आत्म सम्मान आहत होने से परेशान है। हर राजनेता के ‘सत्य‘ की अपनी दलीलें होती हैं। उनकी प्रस्तुति के तरीके भिन्न होते हैं। कभी वो मखमली होते हैं तो कभी खुरदरे खादी जैसे होते हैं। खादी पसीना सोख लेती है, जबकि मखमल में पसीना साफ करने का सामर्थ्य नहीं होता है। वहां पसीना सुखाने के लिए एयर-कंडीशनर की जरूरत होती है।
सचिन की राजनीति के जवाब में अशोक गहलोत ने कहा – ‘अच्छी अंग्रेजी बोलना और हैंडसम होना ही सब कुछ नहीं होता है, राजनीति में विचारधारा और कमिटमेंट भी देखा जाता है। उनके पास ‘हार्स-ट्रेडिंग’ के सबूत हैं’। गहलोत कहते हैं- ‘जब भी हमारी मीटिंग होती है तो मैं यूथ-कांग्रेस के लिए लड़ाई लड़ता हूं। इनकी ढंग से रगड़ाई नहीं हो पाई तो ये समझ नहीं पा रहे हैं‘। आज केन्द्रीय मंत्री बन गए, पीसीसी अध्यक्ष बन गए…यदि इनकी ढंग से ‘रगड़ाई‘ हुई होती तो ये और अच्छे ढंग से काम करते‘। ‘ये लोग हमसे अच्छा काम कर सकते हैं। हमारे जमाने मे कोई कम्युनिकेशन नहीं था। आज आईटी का जमाना है…मोबाइल हैं…मीडिया है। देश का भविष्य इन पर निर्भर है। अगर ये खुद ही ‘हार्स-ट्रेडिंग’ का हिस्सा बनेंगे, उसे पसंद करेंगे, प्रमोट करेंगे, तो नई पीढ़ी के ये लोग क्या देश को बर्बाद नहीं करेंगे’? पायलट के ‘मखमली सत्य‘ के जवाब में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के सवालों में खादी जैसा खुरदुरापन, राजस्थानी-खनक और देशी अंदाज है।
गहलोत के खरे सवाल कांग्रेस आलाकमान के रूझानों पर प्रहार करते हैं। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा था कि सचिन पायलट 26 साल की उम्र मे ही सांसद, 32 साल की उम्र में केन्द्रीय मंत्री, 34 साल की उम्र मे पीसीसी-चीफ और 40 साल की उम्र में राजस्थान के उप मुख्यमंत्री बन गए थे। सचिन के सफरनामे में अशोक गहलोत का गौरतलब शब्द ‘रगड़ाई‘ नदारद है। बकौल गहलोत यदि उनकी कांग्रेस में ‘रगड़ाई‘ हुई होती तो पार्टी के प्रति उनकी प्रतिबध्दता और समर्पण असंदिग्ध होता…। गहलोत की ‘राजनीतिक-रगड़ाई’ से सिर्फ सचिन ही अछूते नहीं है, बल्कि राहुल गांधी के इर्द-गिर्द जमा जितिन प्रसाद, मिलिन्द देवड़ा, प्रिया दत्त, ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे कई नाम इस श्रेणी में शामिल हैं। इन युवा नेताओं ने विरासत के स्वर्ण रथों पर सवार होकर राजमहलों में मुकाम हासिल किया है। सवाल नेताओं की योग्यता-अयोग्यता का नहीं है। सवाल यह है कि कांग्रेस में इन्हें जो कुछ मिला, क्या वह अपर्याप्त है अथवा कांग्रेस के उन जमीनी कार्यकर्ताओं की तुलना में कमतर है, जिन्हे ताउम्र कुछ भी हांसिल नही होता है।
कांग्रेस से अलग होने वाले अधिकांश नेताओं को सचिन पायलट की तरह कांग्रेस ने बहुत कुछ दिया है। अब वो राजनीतिक फायदे के लिए कांग्रेस से अलग होने के नए-नए बहाने गढ़ रहे हैं। सिंधिया भाजपा के पाले में जा चुके हैं। वो मानते है कि मप्र में उन्हे उनका वाजिब हक नहीं मिला था। मिलिन्द देवड़ा, जतिन प्रसाद या प्रिया दत्त सचिन पायलट के साथ नगाड़ेबाजी करके जाने के बहाने तलाश रहे हैं। सभी राजनीति मे चांदी का चम्मच मुंह में ऱख कर पैदा हुए हैं। सिंधिया राजघराने के वारिस ज्योतिरादित्य अपने पिता माधवराव की राजनीतिक जमीन पर खड़े हैं। 49 साल के ज्योतिरादित्य ने सिर्फ उन्नीस साल ही कांग्रेस में गुजारे हैं। वो लगभग 18 साल तक सांसद रहे। सिंधिया तीस साल की उम्र में कांग्रेस-सांसद और 37 साल में केन्द्रीय राज्यमंत्री बन गए थे। वो कांग्रेस के महासचिव भी रह चुके हैं।
सचिन के पैरोकार 46 साल के जितिन प्रसाद वरिष्ठ कांग्रेसी नेता जितेन्द्र प्रसाद के वारिस हैं। 2001 में युवा कांग्रेस के सचिव बने जितिनप्रसाद 2004 में केन्द्र मे राज्यमंत्री बने और 2014 तक उनका मंत्रीपद बरकरार रहा। 53 साल की प्रिया दत्त मशहूर अभिनेता सांसद सुनील दत्त की बेटी के नाते उनकी संसदीय-विरासत की मालिक हैं। 43 साल के सांसद मिलिन्द देवड़ा कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रहें मुंबई के नेता मुरली देवड़ा के बेटे हैं। संघर्ष के बिना राजनीतिक उपलब्धियां अंहकार और अधीरता का सबब बनती है। राजा बने रहना इनकी तासीर का हिस्सा है। इसलिए सत्ता के बिना कुछ समय बिताना भी इन्हें भारी पड़ रहा है। वैचारिक प्रतिबद्धता की परीक्षा मुश्किल घड़ियों में ही होती है। लेकिन लगता है कि सत्ता की महत्वाकांक्षाएं इनकी वैचारिक प्रतिबद्धताअोंको तोड़ रहीं हैं।
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